महाराष्ट्र में बढ़ी मशीन से गन्ना कटाई, लेकिन उत्तर प्रदेश क्यों पीछे?
भारत के दो प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश, इस समस्या से जूझ रहे हैं, लेकिन समाधान की दिशा में दोनों की कोशिशों में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। जहां महाराष्ट्र ने तेजी से मशीनीकरण को अपनाते हुए गन्ना कटाई में बड़ा बदलाव किया है, वहीं उत्तर प्रदेश अब भी श्रमिकों पर निर्भर है।
गन्ना कटाई की बढ़ती लागत और श्रमिकों की समस्या ने देश के चीनी उद्योग और किसानों के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। भारत के दो प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश, इस समस्या से जूझ रहे हैं, लेकिन समाधान की दिशा में दोनों की कोशिशों में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। जहां महाराष्ट्र ने तेजी से मशीनीकरण को अपनाते हुए गन्ना कटाई में बड़ा बदलाव किया है, वहीं उत्तर प्रदेश अब भी श्रमिकों पर निर्भर है।
महाराष्ट्र के लातूर जिले की विकासरत्न विलासराव देशमुख मांजरा एसएसएसके लिमिटेड बदलाव का उल्लेखनीय उदाहरण बनकर उभरी है। चालू पेराई सत्र 2025-26 में इस मिल ने लगभग शत-प्रतिशत गन्ना कटाई शुगरकेन हार्वेस्टर के माध्यम से की है। राज्य स्तर पर भी महाराष्ट्र में मशीन से कटाई का औसत 30 प्रतिशत से अधिक हो चुका है, जबकि उत्तर प्रदेश में शुगरकेन हार्वेस्टर उपयोग लगभग नगण्य है।
चीनी उद्योग से जुड़े आंकड़े इस असमानता को स्पष्ट करते हैं। देश में इस समय लगभग 3,218 शुगरकेन हार्वेस्टर उपलब्ध हैं, जिनमें से करीब 2,200 महाराष्ट्र में हैं। इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या महज पांच बताई जाती है, जिनके उपयोग की भी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। कर्नाटक में भी मशीनीकरण को बढ़ावा मिला है और वहां लगभग 660 हार्वेस्टर उपयोग में हैं। इसके अलावा तमिलनाडु में 145, तेलंगाना में 54, मध्य प्रदेश में 52 और पंजाब में 37 हार्वेस्टर हैं, जबकि इन राज्यों में बहुत अधिक चीनी मिलें नहीं हैं।
महाराष्ट्र और यूपी में अंतर
महाराष्ट्र और कर्नाटक में गन्ना कटाई और ढुलाई की जिम्मेदारी चीनी मिलों की होती है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह जिम्मा किसानों का होता है। यही बुनियादी अंतर मशीनीकरण के मामले में फर्क पैदा कर रहा है। महाराष्ट्र में लंबे समय से गन्ना कटाई का कार्य बाहरी श्रमिकों, विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों से आने वाले मजदूरों द्वारा किया जाता रहा है। इन श्रमिकों को ठेकेदारों के माध्यम से काम पर लगाया जाता है, जो चीनी मिलों से अनुबंध करते हैं। इस व्यवस्था में श्रमिकों के शोषण, बढ़ती लागत और बिचौलियों पर अत्यधिक निर्भरता जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं।
इन्हीं चुनौतियों ने महाराष्ट्र की चीनी मिलों को मशीनीकरण की ओर तेजी से बढ़ने के लिए प्रेरित किया। लातूर स्थित विकासरत्न विलासराव देशमुख मांजरा एसएसएसके लिमिटेड इसका एक प्रमुख उदाहरण है। इस मिल ने मशीन से गन्ना कटाई को गन्ना सीजन 2021-22 में 38.38 प्रतिशत से बढ़ाकर 2025-26 में 99.74 प्रतिशत तक पहुंचने का रिकॉर्ड बनाया है।
संकट से समाधान तक
मांजरा मिल के प्रबंध निदेशक पंडित साहेबराव देसाई कहते हैं कि गन्ना कटाई के लिए श्रमिकों की कमी एक बड़ी समस्या बन चुकी है। गन्ने के रकबे में वृद्धि के कारण पेराई सत्र मई तक खिंच जाता है, जबकि मार्च से ही तापमान तेजी से बढ़ने लगता है। भीषण गर्मी में श्रमिकों के लिए काम करना मुश्किल हो जाता है, जिससे कटाई प्रभावित होती है और किसानों का गन्ना समय पर मिलों तक नहीं पहुंच पाता।
इसके अलावा, सीजन के बीच में श्रमिकों द्वारा काम छोड़ देना या अग्रिम भुगतान लेने के बावजूद वापस न लौटना जैसी समस्याएं भी बढ़ रही हैं। ऐसे में हार्वेस्टर मशीनें एक भरोसेमंद विकल्प बनकर सामने आई हैं। हालांकि, एक हार्वेस्टर मशीन की कीमत एक से सवा करोड़ रुपये तक होती है, जिससे इसका उपयोग आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो जाता है। फिर भी मांजरा मिल के चेयरमैन एवं पूर्व मंत्री दिलीपरावजी देशमुख ने इसे अपनाने का जोखिम उठाया। गन्ना सत्र 2022-23 में लातूर जिला केंद्रीय बैंक की गारंटी पर 31 हार्वेस्टर मशीनें किसानों को उपलब्ध कराई गईं।
आज स्थिति यह है कि मांजरा मिल के पास अपनी 25 मशीनें हैं और 54 मशीनें मिल की गारंटी पर संचालित हो रही हैं। हार्वेस्टर संचालक मिल के साथ गन्ना कटाई का अनुबंध करते हैं। यह मॉडल न केवल मशीनीकरण को बढ़ावा देता है, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए आजीविका के नए अवसर भी सृजित करता है।
मशीन से कटाई के फायदे
मशीन से गन्ना कटाई से श्रम लागत घटती है और श्रमिकों की कमी जैसी चुनौतियों से निपटने में मदद मिलती है। साथ ही गन्ना कटाई के काम में दक्षता भी बढ़ती है जिससे उत्पादकता में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि संभव है। मशीन से कटाई में कम समय लगता है जिससे गन्ने की गुणवत्ता बनी रहती है और शुगर रिकवरी बेहतर होती है।
किसानों के लिए भी यह बदलाव लाभकारी साबित हो रहा है। मशीनें गन्ने को जड़ से काटती हैं, जिससे अधिक सुक्रोज युक्त हिस्सा मिलों तक पहुंचता है। इससे न केवल उत्पादन बढ़ता है, बल्कि रैटून फसल की वृद्धि भी बेहतर होती है।
हालांकि, मशीन संचालन के लिए प्रशिक्षित ऑपरेटरों की आवश्यकता होती है। एक ऑपरेटर का मासिक वेतन लगभग 55,000 रुपये तक होता है, और प्रत्येक मशीन के साथ दो अतिरिक्त श्रमिकों की जरूरत होती है। इसके लिए चीनी मिलें और उपकरण निर्माता कंपनियां प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चला रही हैं।
नेशनल फेडरेशन ऑफ कोआपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज (एनएफसीएसएफ) के मैनेजिंग डायरेक्टर प्रकाश नायकनवरे ने बताया कि बेहतर रणनीति और निरंतर प्रयासों के चलते महाराष्ट्र में मशीनों से गन्ना कटाई का स्तर 40 से 45 प्रतिशत तक पहुंच गया है और आने वाले वर्षों में इसके और बढ़ने की संभावना है। मशीनी कटाई से मिलों में गन्ने की पेराई में भी तेजी आई है। कटाई के 12 से 15 घंटे के भीतर गन्ने की क्रशिंग होने से चीनी की रिकवरी बेहतर हुई है। महाराष्ट्र के लातूर, कोल्हापुर, सांगली और सोलापुर जैसे क्षेत्रों में श्रमिकों की कमी के चलते मशीनों को प्राथमिकता दी जा रही है।
निजी क्षेत्र की भूमिका
गन्ना कटाई में मशीनीकरण को बढ़ावा देने में निजी कंपनियां भी अहम भूमिका निभा रही हैं। राजकोट स्थित तीरथ एग्रो टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड का ‘शक्तिमान तेजस अल्ट्रा हार्वेस्टर’ इस क्षेत्र में तेजी से लोकप्रिय हुआ है और विदेशों में भी निर्यात हो रहा है। कंपनी के अनुसार, यह मशीन भारतीय परिस्थितियों और छोटे खेतों की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित की गई है। इससे किसानों को लागत कम करने और आय बढ़ाने में मदद मिल रही है।
उत्तर प्रदेश क्यों पिछड़ा?
उत्तर प्रदेश में गन्ना कटाई का काम पूरी तरह श्रमिकों पर निर्भर है, जिस पर किसानों को प्रति क्विंटल 55 से 60 रुपये तक का खर्च खुद उठाना पड़ता है। राज्य में गन्ना आपूर्ति की ‘पर्ची प्रणाली’ लागू है, जिसके तहत किसानों को निर्धारित समय और मात्रा में गन्ना मिलों को देना होता है। उत्तर प्रदेश में लगभग 45 लाख गन्ना किसान हैं, जिनमें अधिकांश छोटे और सीमांत किसान हैं। छोटी जोत और बिखरे हुए खेतों के कारण बड़े हार्वेस्टर का उपयोग व्यवहार्य नहीं हो पा रहा है।
यूपी के एक चीनी मिल अधिकारी का कहना है कि मौजूदा हार्वेस्टर बहुत बड़े होते हैं और गन्ने को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट देते हैं, जिससे यदि पेराई में देरी हो जाए तो शुगर रिकवरी घट सकती है। इसलिए उत्तर प्रदेश के लिए ऐसे हार्वेस्टर की जरूरत है जो पूरे गन्ने को काट सकें और छोटे खेतों में भी आसानी से काम कर सकें।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में मशीनीकरण को बढ़ावा देने के लिए नीतिगत समर्थन और बदलाव आवश्यक हैं। रूरल वॉयस द्वारा आयोजित ‘नेशनल कंसल्टेशन ऑन सस्टेनेबल शुगरकेन इकोनॉमी’ में भी किसानों ने छोटे हार्वेस्टर की जरूरत पर जोर दिया था।
यदि सरकार, चीनी मिलें और निजी क्षेत्र मिलकर काम करें, तो उत्तर प्रदेश में भी मशीनीकरण को बढ़ावा दिया जा सकता है। इसके लिए वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण कार्यक्रम और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तकनीकी समाधान जरूरी होंगे।

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