जलवायु संकट के बीच बीज उद्योग का भारत की कृषि जैव विविधता को मजबूत करने पर जोर
एफएसआईआई ने जलवायु परिवर्तन और वैश्विक आपूर्ति संकट के बीच भारत की कृषि जैव विविधता को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। संगठन ने कहा कि बीज विविधता, बायोटेक्नोलॉजी और जलवायु के प्रति सहनशील किस्में खाद्य सुरक्षा, किसानों की बेहतरी और वैश्विक बीज बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए जरूरी हैं।
भूराजनैतिक तनाव, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच भारतीय बीज उद्योग फेडरेशन (FSII) ने भारत की कृषि जैव विविधता को संरक्षित और मजबूत करने पर ध्यान देने की बात कही है। फेडरेशन का कहना है कि बीज विविधता और मजबूत फसल आनुवांशिकी दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा, किसानों की बेहतरी और आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
एफएसआईआई के चेयरमैन और सवाना सीड्स के सीईओ एवं एमडी अजय राणा ने कहा कि जैव विविधता अब केवल पर्यावरण से जुड़ा विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह आर्थिक मजबूती, खाद्य सुरक्षा और राष्ट्रीय तैयारी से सीधे जुड़ चुका है। उन्होंने कहा कि विविध बीज प्रणाली जलवायु आपदाओं, भूराजनैतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान जैसे संकटों के दौरान सुरक्षा कवच का काम करती है।
राणा ने कहा कि भारत की विशाल कृषि जैव विविधता उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकतों में से एक है। देश में हजारों पारंपरिक धान किस्में, विविध मोटे अनाज, दलहन, तिलहन और क्षेत्र विशेष के अनुरूप विकसित फसल प्रणालियां मौजूद हैं, जो विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में टिकाऊ साबित हुई हैं। एफएसआईआई के अनुसार, वैश्विक अनिश्चितता के दौर में ऐसी स्थानीय और अनुकूल बीज प्रणालियां कृषि उत्पादन को स्थिर रखने और आपूर्ति व्यवधान के जोखिम को कम करने में मदद करती हैं।
फेडरेशन ने आधुनिक प्रजनन तकनीक, बायोटेक्नोलॉजी और जीनोम एडिटिंग की बढ़ती भूमिका पर भी जोर दिया। राणा ने बताया कि 2014 से 2025 के बीच राष्ट्रीय प्रजनन कार्यक्रमों के तहत लगभग 3,000 जलवायु-सहनशील फसल किस्में विकसित की गईं, जिनमें सूखा-रोधी, बाढ़-रोधी, गर्मी-रोधी और पोषक तत्वों के बेहतर उपयोग वाली किस्में शामिल हैं।
एफएसआईआई के डायरेक्टर जनरल डॉ. परेश वर्मा ने कहा कि भविष्य में कृषि की मजबूती पारंपरिक जैव विविधता और आधुनिक विज्ञान के संयोजन पर निर्भर करेगी। उन्होंने कहा कि प्रिसिजन ब्रीडिंग, बायोटेक्नोलॉजी और जीनोम एडिटिंग जैसी तकनीकें ऐसी फसल किस्मों के विकास में मदद कर रही हैं जो गर्मी, सूखा, कीटों और बदलती जलवायु परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम हैं, जबकि उत्पादकता भी बनी रहती है।
एफएसआईआई के अनुसार भारत में वर्तमान में 30,000 से अधिक पंजीकृत बीज किस्में हैं और घरेलू बीज बाजार का आकार लगभग 30,000 करोड़ रुपये का है। फेडरेशन का अनुमान है कि नीतिगत सुधारों, अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहन और रेगुलेटरी सहूलियतों के जरिए भारत वैश्विक बीज निर्यात में अपनी हिस्सेदारी मौजूदा करीब 1 प्रतिशत से बढ़ाकर 2035 तक 10 प्रतिशत कर सकता है। इससे भारत एक प्रमुख वैश्विक बीज केंद्र के रूप में उभर सकता है।
एफएसआईआई ने कहा कि कृषि जैव विविधता को केवल संरक्षण के नजरिए से नहीं बल्कि आर्थिक स्थिरता, किसान कल्याण और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के रणनीतिक स्तंभ के रूप में देखा जाना चाहिए। फेडरेशन ने बीज अनुसंधान, फसल सुधार, स्वदेशी जर्मप्लाज्म संरक्षण और विज्ञान आधारित कृषि विकास को बढ़ावा देने वाली नीतियों के निरंतर समर्थन की मांग की।

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