यूरोपीय संघ (ईयू) और भारत के बीच घोषित हुए मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) से यूरोपीय किसान और कृषि-खाद्य उत्पादक प्रमुख लाभार्थियों में शामिल होंगे। ब्रसेल्स और नई दिल्ली से जारी आधिकारिक बयानों के अनुसार, यह समझौता भारतीय बाजार में कृषि पर लगने वाले कुछ सबसे ऊंचे शुल्कों को समाप्त करता है, जबकि ईयू ने अपने संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को कड़े तौर पर सुरक्षित रखा है।
यह समझौता भारत में ईयू के कृषि और खाद्य निर्यात के लिए बाजार पहुंच को काफी बेहतर बनाने वाला है। भारत में कृषि उत्पादों के आयात पर औसत शुल्क अक्सर 36% से अधिक हैं, जो लंबे समय से यूरोपीय उत्पादकों के लिए एक बड़ी बाधा रहे हैं। यूरोपीय आयोग का अनुमान है कि एफटीए के पूरी तरह लागू होने पर ईयू निर्यातकों को सालाना लगभग 4 अरब यूरो तक के शुल्क की बचत हो सकती है। इससे दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते उपभोक्ता बाजारों में यूरोपीय खाद्य उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत होगी।
समझौते के तहत भारत ईयू के कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों की एक व्यापक सूची पर शुल्क घटाएगा या पूरी तरह समाप्त करेगा। जैतून का तेल, मार्जरीन और अन्य वनस्पति तेलों पर अभी तक 45% तक शुल्क लगता है, इसे शून्य कर दिया जाएगा। फलों के रस और नॉन-अल्कोहलिक बीयर पर 55% तक के शुल्क भी समाप्त होंगे। इसके अलावा, ईयू से भेड़ और मेमने के मांस के निर्यात को मौजूदा 33% शुल्क से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाएगा।
ब्रेड, बिस्कुट, पास्ता, चॉकलेट और पालतू पशु आहार जैसे प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद, जिन पर 50% तक शुल्क लगता है, अब भारत में बिना किसी शुल्क के आयात किये जा सकेंगे। यूरोप के लिए शराब एक महत्वपूर्ण निर्यात उत्पाद है , उसके ऊपर शुल्क में चरणबद्ध कटौती कर उसके आयात को आसान बनाया जाएगा। प्रीमियम वाइन पर 150% शुल्क घटाकर 20% और मध्यम श्रेणी की वाइन पर 30% किया जाएगा, जबकि स्पिरिट्स पर शुल्क 150% तक के स्तर से घटकर 40% रह जाएगा।
ईयू अधिकारियों का कहना है कि इन रियायतों से भारत में यूरोप के कृषि-खाद्य उत्पादों की मौजूदगी काफी बढ़ सकती है, जहां फिलहाल ईयू का निर्यात चीन या अमेरिका जैसे बाजारों की तुलना में कम है। भारत को होने वाला ईयू का कृषि-खाद्य निर्यात पहले ही पूरे यूरोपीय संघ में लगभग 8 लाख नौकरियों के मौके पैदा करने वाला है। ईयू को उम्मीद है कि व्यापार बढ़ने के साथ यह संख्या और बढ़ेगी।
संवेदनशील कृषि क्षेत्रों पर ईयू की सख्त सीमा
साथ ही, ईयू ने अपने संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से अलग रखा है। चीनी और एथनॉल, चावल और सॉफ्ट गेहूं, बीफ और पोल्ट्री, मिल्क पाउडर, केले और शहद पर भारत को कोई शुल्क रियायत नहीं दी जाएगी। टेबल अंगूर और खीरे जैसे उत्पाद, जिनमें भारतीय निर्यातक प्रतिस्पर्धी हैं, उनके लिए सीमित मात्रा के साथ कड़े टैरिफ-रेट कोटा प्रावधान लागू होंगे, जिससे ईयू बाजार में आने वाली मात्रा नियंत्रित रहेगी।
ईयू ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसके उच्च स्वास्थ्य और पादप (एसपीएस) मानक पूरी तरह बरकरार रहेंगे। एफटीए के एसपीएस अध्याय के तहत पशु और पौध स्वास्थ्य तथा खाद्य सुरक्षा से जुड़े ईयू के कड़े नियम बिना किसी छूट के लागू रहेंगे। पारदर्शिता और सूचना साझा करने के लिए सहयोग तंत्र मजबूत किए जाएंगे, लेकिन नियामकीय मानकों में कोई ढील नहीं दी जाएगी।
व्यापार विश्लेषकों के अनुसार, ये सुरक्षा उपाय यूरोपीय किसान संगठनों का राजनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए अहम थे, जो पहले से ही अस्थिर वैश्विक खाद्य बाजारों के बीच आयात प्रतिस्पर्धा को लेकर सतर्क रहे हैं।
भारत को क्या मिलेगा: सीमित लेकिन रणनीतिक लाभ
भारत के लिए कृषि क्षेत्र में लाभ अपेक्षाकृत सीमित हैं, लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, ईयू भारत के चाय, कॉफी, मसाले, टेबल अंगूर, गर्किंस और खीरे, सूखे प्याज, ताजे फल-सब्जियां और कुछ प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों को प्राथमिक बाजार पहुंच देगा।
अधिकारियों का कहना है कि कम शुल्क और स्थिर नियम भारतीय किसानों और कृषि निर्यातकों को मूल्य श्रृंखला में ऊपर जाने में मदद करेंगे और यूरोप के प्रीमियम बाजार तक पहुंच बनाएंगे, जहां ट्रेस करने योग्य और टिकाऊ तरीके से उत्पादित खाद्य पदार्थों की मांग है। हालांकि कृषि का भारत-ईयू कुल वस्तु व्यापार में हिस्सा अभी छोटा है। 2024-25 में भारत ईयूय व्यापार लगभग 136.5 अरब डॉलर का था — फिर भी नीति-निर्माता उच्च-मूल्य वाले क्षेत्रों में पर्याप्त वृद्धि की संभावना देखते हैं।
सबसे अहम बात यह है कि भारत ने अपने सबसे संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को समझौते के बाहर रखा है। डेयरी, खाद्यान्न, पोल्ट्री, सोयामील और कई फल-सब्जियों को शुल्क में कटौती से बाहर रखा गया है। ग्रामीण आजीविका और खाद्य सुरक्षा को लेकर घरेलू चिंताओं के चलते ऐसा किया गया है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक है, और इस क्षेत्र पर करोड़ों छोटे किसान निर्भर हैं, इसलिए डेयरी व्यापार वार्ताओं में एक राजनीतिक ‘रेड लाइन’ रही है।
मानक और संरचना
समझौते में कड़े ‘रूल्स ऑफ ओरिजिन’ भी शामिल हैं, ताकि केवल वही उत्पाद शुल्क रियायतों का लाभ ले सकें जो भारत या ईयू में पर्याप्त रूप से उत्पादित या प्रसंस्कृत हों। इससे तीसरे देशों के जरिए माल भेजने के जोखिम को कम किया जाएगा। एसपीएस और तकनीकी बाधाओं से जुड़े प्रावधानों का उद्देश्य नियामकीय निगरानी को कमजोर किए बिना देरी और अनुपालन लागत को घटाना है।
एफटीए के लागू होने से पहले कानूनी जांच और यूरोपीय संसद तथा भारत की संबंधित संस्थाओं की मंजूरी जरूरी होगी। इसके लागू होने के बाद, दोनों पक्षों के अधिकारी मानते हैं कि यह कृषि व्यापार के प्रवाह को नया आकार देगा — यूरोपीय किसानों को भारतीय बाजार में बड़ी पहुंच मिलेगी, जबकि भारतीय कृषि को दुनिया के सबसे कड़े रूप से विनियमित खाद्य बाजारों में सीमित लेकिन सुनियोजित प्रवेश मिलेगा।