दुनियाभर में फसलों पर अल नीनो का असर अब तक सीमित, वैश्विक आपूर्ति परिदृश्य फिलहाल स्थिर

अल नीनो का ग्रीष्मकालीन फसलों पर अब तक प्रभाव आशंका से कम रहा है। भारत, चीन और अमेरिका में उत्पादन की अनुकूल संभावनाएं यूरोप और एशिया के सूखा प्रभावित हिस्सों में हुए नुकसान की भरपाई कर रही हैं। हालांकि अल नीनो के वर्ष के अंत में चरम पर पहुंचने तक जोखिम बना रहेगा, लेकिन वैश्विक अनाज या तिलहन संकट की संभावना फिलहाल कम है।

दुनिया भर में कृषि पर मौजूदा अल नीनो मौसम घटना के जिस गंभीर असर की आशंका जताई जा रही थी, वह अब तक अपेक्षाकृत कम रहा है। भारत, चीन और अमेरिका जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में फसलों की अनुकूल स्थिति ने कुछ सूखा प्रभावित क्षेत्रों में हुए नुकसान की भरपाई करने में मदद की है।

अल नीनो ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मौसम के मिजाज को प्रभावित किया है, लेकिन अनाज और तिलहन उत्पादन पर इसका असर 1982, 1997 और 2015 जैसी प्रमुख अल नीनो घटनाओं की तुलना में अब तक सीमित रहा है। उत्तरी गोलार्ध में गर्मियों के दौरान मौसम की स्थिति आदर्श नहीं रही, लेकिन मौजूदा उत्पादन संभावनाओं से संकेत मिलता है कि वैश्विक स्तर पर बड़ी आपूर्ति कमी की संभावना नहीं है।

अल नीनो आमतौर पर एशिया के कुछ हिस्सों में शुष्क मौसम लेकर आता है। इसका प्रभाव विशेष रूप से भारत से लेकर वियतनाम और आगे फिलीपींस, इंडोनेशिया तथा मलेशिया तक देखा जाता है। हालांकि, अब तक इस क्षेत्र में इंडोनेशिया ही ऐसा प्रमुख इलाका रहा है, जहां गंभीर सूखे की स्थिति बनी है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया की फसलों पर इसका असर पिछले मजबूत अल नीनो वर्षों की तुलना में काफी कम गंभीर रहा है।

भारत में बुवाई में सुधार, चीन में भी स्थिति अनुकूल

कमजोर मानसून की शुरुआत के बाद भारत में खरीफ फसलों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। जुलाई में बारिश की मात्रा और समयबद्धता, दोनों में सुधार हुआ और अब अधिकांश प्रमुख अनाज तथा तिलहन उत्पादक क्षेत्रों में मिट्टी में पर्याप्त नमी उपलब्ध है। हालांकि दक्षिण भारत में अभी भी अपेक्षाकृत शुष्क स्थिति बनी हुई है, जिससे धान, गन्ना, कॉफी और कुछ अन्य अनाज तथा तिलहन फसलों पर असर पड़ रहा है। 

चीन के कुछ हिस्सों में सूखे, अत्यधिक बारिश और बाढ़ की घटनाओं के बावजूद ग्रीष्मकालीन फसल का मौसम कुल मिलाकर अनुकूल रहा है। वहां भी मौसम संबंधी घटनाओं से कुल कृषि उत्पादन पर बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है।

अमेरिका में भी फसल स्थिति बेहतर

अमेरिका में समय पर हुई बारिश ने उत्तर-पश्चिमी मक्का और सोयाबीन बेल्ट में गर्मी तथा शुष्क मौसम के दौर का सामना करने में फसलों की मदद की। कुछ क्षेत्रों में पैदावार में कमी की आशंका है, लेकिन यह कमी इतनी बड़ी नहीं होगी कि कुल आपूर्ति प्रभावित हो। अमेरिका के अधिकांश मिडवेस्ट में फसल उत्पादन औसत से लेकर औसत से थोड़ा बेहतर रहने की उम्मीद है।

पश्चिमी यूरोप अपवाद

पश्चिमी यूरोप इसका एक प्रमुख अपवाद है। फ्रांस, ब्रिटेन, बेल्जियम और जर्मनी के कुछ हिस्सों में लंबे समय तक जारी गर्मी और शुष्क मौसम के कारण पैदावार में उल्लेखनीय गिरावट आने की आशंका है। दक्षिण-पूर्वी यूरोप के कुछ हिस्से भी हाल में गर्म और शुष्क हुए हैं। यदि यह स्थिति जारी रहती है तो वहां पैदावार में और कमी की चिंता बढ़ सकती है।

इन क्षेत्रीय समस्याओं के बावजूद, फिलहाल वैश्विक फसल उत्पादन संकट जैसी स्थिति नहीं है। प्रमुख अनाज और तिलहन उत्पादक देशों में मौजूदा भंडार और अपेक्षाकृत अच्छा उत्पादन वैश्विक स्तर पर कमी की भरपाई कर सकता है।

आगे बढ़ सकता है अल नीनो का असर 

अल नीनो का प्रभाव अभी आगे बढ़ सकता है। इसके नवंबर या दिसंबर की शुरुआत के आसपास चरम पर पहुंचने का अनुमान है। इसका मतलब है कि मौसम की स्थिति बिगड़ने के लिए अभी कई महीने बाकी हैं। धान, गन्ना, कॉफी, कोको, पाम ऑयल, नारियल और रबर जैसी फसलें विशेष रूप से संवेदनशील बनी हुई हैं। फिर भी, वैश्विक अनाज और तिलहन उत्पादन के नजरिए से देखें तो अल नीनो का असर अब तक उस गंभीरता तक नहीं पहुंचा है, जिसकी पहले व्यापक रूप से आशंका जताई गई थी।

भारत में मानसून

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, 27 अगस्त 2026 तक देश में मानसूनी बारिश सामान्य से 13 प्रतिशत कम रही। हालांकि, राष्ट्रीय स्तर के इस आंकड़े के पीछे क्षेत्रीय स्तर पर बारिश की स्थिति में काफी अंतर है। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हैं।

पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में बारिश की कमी 27 प्रतिशत रही, जबकि दक्षिण प्रायद्वीपीय क्षेत्र में यह कमी 22 प्रतिशत रही। इसके मुकाबले मध्य भारत में बारिश सामान्य से केवल 2 प्रतिशत कम और उत्तर-पश्चिम भारत में 10 प्रतिशत कम रही।

कई राज्यों में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। 1 जून से 27 अगस्त 2026 के दौरान पंजाब में सामान्य से 34 प्रतिशत कम बारिश हुई, जबकि राजस्थान में यह कमी 21 प्रतिशत रही। दक्षिण भारत में कर्नाटक और केरल में क्रमशः 22 प्रतिशत और 20 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई। बारिश की कमी वाले प्रमुख राज्यों में आंध्र प्रदेश में 40 प्रतिशत और बिहार में 42 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। पूर्वोत्तर क्षेत्र की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक बनी हुई है। त्रिपुरा और नगालैंड को छोड़कर लगभग सभी राज्यों में बारिश की उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। कुछ राज्यों में यह कमी 58 प्रतिशत तक पहुंच गई है।