मई तक अल नीनो और अगस्त तक सुपर अल नीनो की संभावना, भारतीय मानसून होगा प्रभावित

प्रशांत महासागर में इस साल मई तक अल नीनो बनने और अगस्त तक इसके मजबूत होने के संकेत मिल रहे हैं। इसका असर भारतीय मानसून, तापमान और कृषि अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है, हालांकि सकारात्मक इंडियन ओशन डाइपोल इसकी तीव्रता को कुछ हद तक संतुलित कर सकता है।

इस साल मार्च की शुरुआत से ही गर्मी बढ़ने लगी है। अभी से देश के कई राज्यों में अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंचने लगा है, जो सामान्य से 5 से 10 डिग्री अधिक है। कमजोर पश्चिमी विक्षोभ के साथ-साथ इस वर्ष अल नीनो के सक्रिय होने की संभावना भी बढ़ रही है, जो मानसून को प्रभावित कर सकता है।

पिछले सप्ताह विश्व मौसम संगठन (WMO) ने अल नीनो (प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में वृद्धि) की थोड़ी संभावना जताई थी। अब यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट (ECMWF) का पूर्वानुमान है कि इस वर्ष मई तक प्रशांत महासागर में अल नीनो सक्रिय होने की संभावना है और अगस्त तक इसके और मजबूत होने के संकेत हैं।

ECMWF के एन्सेम्बल मॉडलों के आंकड़ों के अनुसार ‘सुपर अल नीनो’ की 22 प्रतिशत, ‘मजबूत अल नीनो’ की 80 प्रतिशत और ‘मध्यम अल नीनो’ की 98 प्रतिशत संभावना जताई गई है। इस साल मई से जुलाई के बीच अल नीनो बनने की संभावना लगभग 40 प्रतिशत बताई गई है। हालांकि ये शुरुआती अनुमान हैं और इनमें बदलाव संभव है। 

मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान ला नीना (La Niña) चरण के कमजोर पड़ने के साथ प्रशांत महासागर में तापमान बढ़ने की प्रक्रिया तेज हो रही है, जो अल नीनो के बनने का संकेत है। दो साल पहले अल नीनो के कारण दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्सों में सूखा पड़ा था और उसी अवधि में वैश्विक स्तर पर रिकॉर्ड उच्च तापमान भी दर्ज किया गया था।

‘सुपर अल नीनो’ की भी संभावना

अल नीनो आगे चलकर सुपर अल नीनो में भी तब्दील हो सकता है। ECMWF के मुताबिक प्रशांत महासागर में सामान्यतः पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली ट्रेड विंड्स इस समय कमजोर पड़ रही हैं और उनकी जगह पश्चिम से पूर्व की ओर बहने वाली हवाएं मजबूत हो रही हैं। इससे पश्चिमी प्रशांत में जमा गर्म पानी पूर्व की ओर फैलने लगा है।

अल नीनो का प्रभाव समुद्र के तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों के मेल पर निर्भर करता है। समुद्र के तापमान में बदलाव से दुनिया भर में मौसम पर अलग-अलग प्रभाव पड़ सकते हैं। उदाहरण के तौर पर दक्षिणी अमेरिका में भारी बारिश हो सकती है, जबकि प्रशांत महासागर के दूसरी ओर स्थित कई इलाकों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है।

भारतीय मानसून पर असर

अल नीनो आम तौर पर भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर करता है और कई बार सूखे जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। हालांकि यदि इसके साथ यदि इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) भी बनता है, तो यह अल नीनो के प्रभाव को काफी हद तक संतुलित कर सकता है। 1997–98 में ऐसा ही हुआ था, जब अल नीनो के बावजूद भारत में सामान्य से बेहतर मानसून दर्ज किया गया था। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार उस समय सकारात्मक IOD ने अल नीनो के प्रभाव को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।