ईरान युद्ध से पाम ऑयल निर्यात में आया उछाल, वैश्विक आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी
ईरान युद्ध के चलते वैश्विक स्तर पर पाम ऑयल की मांग में तेज उछाल आया है, जिससे इंडोनेशिया और मलेशिया से इसका निर्यात कई महीनों के उच्च स्तर पर पहुंच गया है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, आपूर्ति में बाधाएं और जलवायु जोखिम कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं।
ईरान युद्ध के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव से कच्चे पाम ऑयल (CPO) की वैश्विक मांग में तेज उछाल देखने को मिला है। इससे दक्षिण-पूर्व एशिया से इसका निर्यात बढ़ा है और कीमतें कई महीनों के उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं। आपूर्ति बाधित होने की आशंका के बीच विभिन्न देश तेजी से इसका भंडार बढ़ा रहे हैं, जिससे वैश्विक उपलब्धता का संकट होता नजर आ रहा है।
मलेशिया और इंडोनेशिया मिलकर वैश्विक पाम ऑयल उत्पादन में लगभग 85% हिस्सा रखते हैं। इन दोनों देशों से निर्यात में मजबूत बढ़ोतरी देखी गई है। मलेशिया का CPO निर्यात मार्च में महीने-दर-महीने 41% बढ़कर 16 लाख मीट्रिक टन पहुंच गया, जो अक्टूबर 2025 के बाद सबसे अधिक है। वहीं, इंडोनेशिया ने जनवरी-फरवरी के दौरान निर्यात में साल-दर-साल 36.26% की बढ़ोतरी दर्ज करते हुए 45.4 लाख लियन टन का आंकड़ा छू लिया।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण भी पाम ऑयल की मांग में उछाल देखने को मिल रहा है। इसका इस्तेमाल केवल खाद्य उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि कच्चे तेल के दाम बढ़ने से यह बायोफ्यूल के कच्चे माल के रूप में भी अधिक आकर्षक बन गया है। इंडोनेशिया 1 जुलाई से B50 बायोडीजल अनिवार्यता लागू करने जा रहा है, जिससे वहां इसकी घरेलू खपत बढ़ेगी। इससे करीब 15 लाख टन कच्चे पाम ऑयल का निर्यात घट सकता है।
मौजूदा हालात में वैश्विक व्यापार पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं। मलेशिया का मध्य पूर्व को निर्यात 547.2% बढ़कर 2.8 लाख मीट्रिक टन पहुंच गया। चीन को निर्यात 132.6% और अमेरिका को 210.5% बढ़ा है। यूरोपीय संघ सबसे बड़ा खरीदार रहा जहां वर्ष 2026 की शुरुआत में कुल निर्यात का 23.4% हिस्सा गया।
इन बातों का असर अब कीमतों पर साफ दिखाई देने लगा है। मलेशियाई पाम ऑयल फ्यूचर्स अप्रैल में दिसंबर 2024 के बाद के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गए। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, मार्च में वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक बढ़कर 128.5 अंक हो गया, जबकि वनस्पति तेल की कीमतें माह-दर-माह 5.1% और सालाना आधार पर 13.2% बढ़ीं।
एक तरफ मांग बढ़ रही है तो दूसरी तरफ आपूर्ति का परिदृश्य अब भी अनिश्चित बना हुआ है। भू-राजनीतिक व्यवधानों के कारण उर्वरकों की कीमतों में लगभग 50% तक की बढ़ोतरी हुई है, जिससे उत्पादन में अहम भूमिका निभाने वाले छोटे किसान री-प्लांटिंग से पीछे हट रहे हैं। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान भी उत्पादन को प्रभावित कर रहे हैं, और अनुमान है कि 2026 के अंत में संभावित अल नीनो के चलते उत्पादन में 14% तक की कमी आ सकती है।
विश्लेषकों का कहना है कि भले ही मांग तेजी से बढ़ रही हो, लेकिन उत्पादन से जुड़ी चुनौतियां लंबे समय तक आपूर्ति में कमी का कारण बन सकती हैं। उन्होंने वैश्विक स्तर पर खाद्य तेल की कीमतों में 20% तक बढ़ोतरी की आशंका जताई है। इससे महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।

Join the RuralVoice whatsapp group















