होर्मुज संकट पर FAO की चेतावनी, उर्वरकों की कमी से अगले सीजन की फसलों और खाद्य आपूर्ति पर पड़ेगा असर

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने चेतावनी दी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान के कारण पैदा हुई उर्वरकों की कमी से फसलों की पैदावार घट सकती है। इससे 2026 तथा 2027 में वैश्विक खाद्य आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। FAO के महानिदेशक क्यू डोंग्यू ने कहा कि बुवाई के महत्वपूर्ण सीजन के दौरान उर्वरकों की आपूर्ति में देरी खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकती है, विशेष रूप से एशिया, अफ्रीका और मध्य-पूर्व के देशों में।

होर्मुज संकट पर FAO की चेतावनी, उर्वरकों की कमी से अगले सीजन की फसलों और खाद्य आपूर्ति पर पड़ेगा असर

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के महानिदेशक क्यू डोंग्यू (QU Dongyu) ने कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते जहाजों के आवागमन में व्यवधान के कारण जो वैश्विक उर्वरक संकट उत्पन्न हुआ है, उससे 2026 के आने वाले महीनों और 2027 में कृषि उत्पादन में गिरावट आ सकती है। इससे खाद्य आपूर्ति पर दबाव बढ़ेगा। उन्होंने यह बात “खाद्य सुरक्षा और उर्वरकों तक पहुंच को समर्थन” विषय पर आयोजित MED9++ (नौ भूमध्यसागरीय और दक्षिण यूरोपीय देश) की मंत्रिस्तरीय बैठक में कही। बैठक की सह-अध्यक्षता एफएओ, इटली और क्रोएशिया ने की।

रोम में एकत्रित मंत्रियों और प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए एफएओ महानिदेशक ने कहा कि मौजूदा संकट अब केवल भू-राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया में खाद्य उत्पादन, व्यापार, कृषि आदानों और खाद्य पहुंच को प्रभावित कर रहा है। हम एक अत्यंत गंभीर दबाव वाले समय में मिल रहे हैं। यह केवल भू-राजनीतिक संकट नहीं है, बल्कि वैश्विक कृषि-खाद्य प्रणाली के मूल ढांचे में उत्पन्न व्यवधान है।

क्यू ने होर्मुज जलडमरूमध्य के रणनीतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सामान्य परिस्थितियों में यह मार्ग वैश्विक स्तर पर व्यापार होने वाले तेल, एलएनजी, सल्फर और उर्वरकों के बड़े हिस्से के परिवहन का माध्यम है। उन्होंने चेतावनी दी कि इसमें व्यवधान उर्वरक बाजारों को प्रभावित कर रहा है और ऊर्जा लागत बढ़ा रहा है। इसके कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

उन्होंने कहा, “कृषि एक फसल चक्र के तहत काम करती है जिसे टाला नहीं जा सकता। फसल चक्र के विशेष चरणों में उर्वरकों का उपयोग करना अनिवार्य होता है। यदि उर्वरक समय पर नहीं पहुंचते, तो बाद में स्थिति चाहे जो भी हो, पैदावार घट जाती है।”

क्यू ने कहा कि कुछ सप्ताह की देरी भी किसानों को उर्वरकों के उपयोग में कटौती करने या पूरी तरह से उनका प्रयोग छोड़ने के लिए मजबूर कर देती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आज जो प्रभाव दिखाई दे रहे हैं, वे केवल मौजूदा कीमतों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका असर आगे आने वाली फसलों तक होगा, जिससे 2026 के उत्तरार्ध और 2027 में खाद्य आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

एफएओ महानिदेशक ने कहा, यह स्थिति इसलिए विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि इसका असर प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों में बुवाई और उर्वरक उपयोग के महत्वपूर्ण समय के साथ पड़ रहा है। अफ्रीका, एशिया और मध्य पूर्व के कुछ हिस्सों के वे देश, जो आयात पर निर्भर हैं, इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित होने की आशंका है। उन्होंने कहा कि कोई भी देश इस संकट से अछूता नहीं है।

तात्कालिक कदमों के तहत उन्होंने वैकल्पिक व्यापार मार्गों को सुगम बनाकर आपूर्ति शृंखलाओं को सुचारु बनाए रखने, निर्यात प्रतिबंधों से बचने, कृषि इनपुट तक किसानों की पहुंच सुनिश्चित करने तथा मानवीय सहायता आपूर्ति शृंखलाओं की सुरक्षा पर विशेष जोर दिया। मध्यम अवधि में मजबूत क्षेत्रीय सहयोग, उर्वरक और ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण और सबसे अधिक प्रभावित होने वाले देशों को लक्षित मदद की जरूरत है।

दीर्घकाल के लिए क्यू ने इस बात पर जोर दिया कि आपूर्ति मार्गों और जीवाश्म ईंधन आधारित इनपुट पर निर्भरता कम करने के लिए संरचनात्मक परिवर्तन आवश्यक हैं। इसके लिए सतत कृषि, नवीकरणीय ऊर्जा, इनोवेटिव उर्वरक समाधान तथा मजबूत भंडारण और लॉजिस्टिक्स प्रणालियों में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है।

इस मंत्रिस्तरीय बैठक में 40 से अधिक भूमध्यसागरीय और साझेदार देशों एवं संगठनों के मंत्रियों तथा वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक में वैश्विक ऊर्जा, उर्वरक और खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं में उत्पन्न व्यवधानों के प्रभावों पर चर्चा की गई तथा खाद्य सुरक्षा और कृषि-खाद्य प्रणाली की मजबूती के लिए क्षेत्रीय सहयोग को सुदृढ़ करने पर जोर दिया गया।

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