ईरान युद्ध से उर्वरक व ऊर्जा क्षेत्र को झटका, एशिया की कृषि व अर्थव्यवस्था के लिए बढ़ा जोखिम: एडीबी
एडीबी की रिपोर्ट के अनुसार इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध (Iran war) से उर्वरक और ऊर्जा आपूर्ति बाधित हो रही है। एशियाई देशों में एग्री इनपुट की लागत और खाद्य मुद्रास्फीति का खतरा बढ़ा है। यूरिया व अमोनिया निर्यात प्रभावित होने से किसानों पर लागत का दबाव बढ़ने की आशंका है।
इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध (Iran war) एशिया और प्रशांत क्षेत्र में कृषि और आर्थिक स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। एशियाई विकास बैंक (ADB) की एक रिपोर्ट के अनुसार ऊर्जा, उर्वरक और अन्य कृषि इनपुट की कीमतों में तेज वृद्धि से खेती की लागत बढ़ रही है और खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ऊर्जा आपूर्ति शृंखला और प्रमुख कृषि इनपुट, खासकर उर्वरकों, में व्यवधान का असर अब वैश्विक बाजारों में साफ दिख रहा है। मध्य पूर्व वैश्विक यूरिया निर्यात में लगभग आधा और अमोनिया आपूर्ति में करीब 30% हिस्सा रखता है। ये दोनों फसल उत्पादन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। आपूर्ति बाधित होने से उर्वरकों की उपलब्धता घटने और कीमतें तेजी से बढ़ने की आशंका है।
इस संकट का एक प्रमुख कारण कतर में उत्पादन में कमी है, जहां दुनिया की बड़ी उर्वरक कंपनियों में से एक QAFCO ने गैस संयंत्र पर हमले के बाद उत्पादन रोक दिया। इससे वैश्विक स्तर पर उर्वरक कीमतों में तेज उछाल आया है।
उर्वरकों के अलावा इस संकट का असर सल्फर और पेट्रोकेमिकल्स जैसे अन्य कृषि-संबंधित इनपुट पर भी पड़ा है। ये कृषि रसायनों के उत्पादन के लिए जरूरी हैं। वैश्विक सल्फर निर्यात का लगभग 45% खाड़ी देशों से आता है, जबकि कतर दुनिया की लगभग एक-तिहाई हीलियम आपूर्ति करता है, जो उर्वरक और औद्योगिक उत्पादन में उपयोगी है।
ऊर्जा कीमतों में उछाल ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। कच्चे तेल की कीमतें फरवरी के अंत में युद्ध शुरू होने से पहले लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थीं, जो बढ़कर तनाव के चरम पर 120 डॉलर तक पहुंच गई थीं। अब भी ये 100 डॉलर से ऊपर बनी हुई हैं। प्राकृतिक गैस की कीमतों में भी तेज वृद्धि हुई है, जिससे कृषि उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ गई है।
एडीबी ने चेतावनी दी है कि इन बढ़ती लागतों का असर खाद्य महंगाई के रूप में सामने आ सकता है। उर्वरक महंगे होने से किसान इनके उपयोग में कमी कर सकते हैं, जिससे पैदावार घट सकती है। साथ ही परिवहन और प्रसंस्करण लागत बढ़ने से खाद्य आपूर्ति शृंखला पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। एशिया-प्रशांत क्षेत्र इस स्थिति से खास तौर पर प्रभावित है, क्योंकि यहां ऊर्जा और कृषि इनपुट का आयात अधिक होता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों के यातायात में आई बाधा ने अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है। इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट आई है, जबकि माल भाड़ा और बीमा लागत बढ़ गई है। इससे भी कृषि इनपुट का आयात महंगा हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार आपूर्ति शृंखला में व्यवधान से उर्वरक और कृषि रसायनों की समय पर आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे बुवाई चक्र और उत्पादन पर असर पड़ेगा।
व्यापक स्तर पर भी इसका असर गंभीर हो सकता है। एडीबी का अनुमान है कि यदि संघर्ष लंबा चलता है, तो विकासशील एशिया की आर्थिक वृद्धि में 1.3 प्रतिशत अंक तक कमी आ सकती है, जबकि मुद्रास्फीति 3.2 प्रतिशत अंक तक बढ़ सकती है। खाद्य महंगाई खास तौर से बढ़ेगी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आयातित इनपुट पर निर्भर अर्थव्यवस्थाएं सबसे अधिक प्रभावित होंगी। किसानों की आय घट सकती है और उन पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है, जबकि सरकारों को खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए सब्सिडी का बोझ बढ़ाना पड़ सकता है।

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