संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने भूमि, मिट्टी और जल संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन के लिए एकीकृत भूमि उपयोग योजना को अधिक सहभागी और साक्ष्य आधारित बनाने पर जोर दिया है। संगठन के संशोधित दिशा-निर्देशों में भूमि उपयोग से जुड़े फैसलों में किसानों, स्थानीय समुदायों और अन्य हितधारकों की भागीदारी सुनिश्चित करने की सिफारिश की गई है। इसका उद्देश्य कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा की जरूरतों को पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और ग्रामीण आजीविका के साथ संतुलित करना है।
FAO के अनुसार, वर्ष 2050 तक कृषि क्षेत्र को 2012 की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत अधिक खाद्य पदार्थ, पशु चारा और फाइबर पैदा करने की जरूरत होगी। दूसरी ओर, मानव गतिविधियों के कारण कृषि भूमि के 60 प्रतिशत से अधिक हिस्से का क्षरण हो रहा है। ऐसे में भूमि और जल संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर बेहतर प्लानिंग की जरूरत बढ़ गई है।
1993 के दिशा-निर्देशों का संशोधित स्वरूप
FAO के नए दिशा-निर्देश वर्ष 1993 में जारी संगठन के पहले भूमि उपयोग प्लानिंग संबंधी दिशा-निर्देशों के तीन दशक से अधिक के अनुभव पर आधारित हैं। संशोधित रूपरेखा में भूमि उपयोग की पारंपरिक केंद्रीकृत और ऊपर से नीचे की ओर लागू होने वाली प्रक्रिया के स्थान पर सहभागी और समावेशी दृष्टिकोण अपनाने की बात कही गई है।
यह दिशा-निर्देश देशों को अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों, प्राथमिकताओं, कानूनी ढांचे और संस्थागत व्यवस्थाओं के अनुसार भूमि उपयोग की योजना तैयार करने में मदद करने के लिए बनाए गए हैं। ये स्वैच्छिक और गैर-बाध्यकारी हैं तथा मौजूदा राष्ट्रीय नीतियों और नियोजन प्रणालियों का विकल्प बनने के बजाय उन्हें मजबूत करने का उद्देश्य रखते हैं।
नौ चरणों में भूमि उपयोग की प्लानिंग
दिशा-निर्देशों में एकीकृत भूमि उपयोग योजना के लिए नौ चरणों की प्रक्रिया प्रस्तावित की गई है। इसमें सबसे पहले नियोजन प्रक्रिया शुरू करना और संबंधित हितधारकों की पहचान करना शामिल है। इसके बाद विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों की एक कार्यदल टीम गठित करने तथा भूमि, उसके मौजूदा उपयोग और उपयोगकर्ताओं की स्थिति का आकलन करने की सिफारिश की गई है। अगले चरणों में भूमि उपयोग के विभिन्न विकल्पों का एकीकृत विश्लेषण, उपयुक्त विकल्पों पर हितधारकों से परामर्श और निर्णय, योजना तैयार करना, उसका क्रियान्वयन तथा निगरानी और मूल्यांकन शामिल हैं।
FAO का मानना है कि इस प्रक्रिया में किसानों, पशुपालकों, मछुआरों, वन-आश्रित समुदायों, महिलाओं, युवाओं, आदिवासी समुदायों और कमजोर वर्गों की सार्थक भागीदारी जरूरी है। स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और अनुभव को भी प्लानिंग का हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया है। भूमि अधिकारों की सुरक्षा और महिलाओं तथा आदिवासी समुदायों के अधिकारों को मान्यता देना भी इस दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जलवायु परिवर्तन और भूमि क्षरण पर विशेष ध्यान
संशोधित दिशा-निर्देशों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों, भूमि क्षरण को रोकने, क्षतिग्रस्त भूमि की बहाली, जैव विविधता संरक्षण और जल संकट जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी गई है। इसके साथ ही शहरीकरण तथा शहरों के आसपास कृषि और वानिकी की भूमिका को भी भूमि उपयोग नियोजन से जोड़ने की बात कही गई है।
FAO ने भू-स्थानिक तकनीक, डिजिटल सूचना प्रणालियों, भूमि मूल्यांकन और विभिन्न विकल्पों के तुलनात्मक विश्लेषण जैसे आधुनिक उपकरणों के उपयोग को भी महत्वपूर्ण बताया है। इन तकनीकों के साथ मिट्टी से जुड़े आंकड़ों, मैपिंग, निगरानी और स्थानीय ज्ञान को जोड़कर बेहतर निर्णय लेने में मदद मिल सकती है।
संगठन के अनुसार, भूमि उपयोग की योजना तभी प्रभावी हो सकती है जब राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर तैयार योजनाओं के बीच तालमेल हो। स्थानीय स्तर पर लोगों की जरूरतों और प्राथमिकताओं को समझना तथा उन्हें क्रियान्वयन में शामिल करना आवश्यक है।
ये दिशा-निर्देश FAO के रणनीतिक ढांचे 2022-31 और सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप हैं। संगठन इनके प्रभावी उपयोग के लिए सदस्य देशों की क्षमता बढ़ाने और व्यावहारिक उपकरण विकसित करने में सहयोग जारी रखेगा। इसके पूरक के रूप में नौ चरणों की प्रक्रिया को लागू करने के लिए एक विस्तृत प्रैक्टिशनर्स गाइड भी तैयार की जा रही है।