दुनिया के प्रमुख कृषि क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर तथा एक साथ होने वाली पानी की कमी से वैश्विक स्तर पर गेहूं की कीमतें काफी प्रभावित हो सकती हैं। यदि वैश्विक औसत तापमान 20वीं सदी के मध्य के स्तर से 3°C बढ़ जाता है, तो गेहूं की कीमतें 2010 के मुकाबले तीन गुना हो सकती हैं। Earth’s Future पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में यह चेतावनी दी गई है।
इस अध्ययन का शीर्षक Climate-Induced Severe Water Scarcity Events as Harbingers of Global Wheat Price अर्थात जलवायु-प्रेरित गंभीर जल संकट की घटनाएं वैश्विक गेहूं कीमतों में बढ़ोतरी का संकेत है। अध्ययन में गंभीर सूखे की भौगोलिक व्यापकता और फसल के महत्वपूर्ण विकास चरणों के दौरान वैश्विक जिंस कीमतों में उछाल के बीच मजबूत संबंध पाया गया है।
चेक अकादमी ऑफ साइंसेज के ग्लोबल चेंज रिसर्च इंस्टीट्यूट (CzechGlobe) के प्रोफेसर मिरोस्लाव ट्रंका के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में आरहूस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर यॉर्गेन ई. ओलेसन सहित कई अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ता शामिल थे। अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन सूखे को स्थानीय कृषि समस्याओं से बदल रहा है।
प्रमुख निष्कर्ष और अनुमान
कीमत तीन गुना बढ़ने का अनुमान: 1951-1980 के औसत तापमान को आधार मानते हुए 3°C तापमान वृद्धि की स्थिति में वैश्विक गेहूं की कीमत औसतन करीब 364 डॉलर प्रति मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। यह 2010 में दर्ज मुद्रास्फीति-समायोजित वैश्विक गेहूं कीमत से लगभग तीन गुना है।
तापमान में मध्यम वृद्धि का प्रभाव: तापमान वृद्धि के 2°C तक सीमित रहने की स्थिति में गेहूं की अनुमानित औसत कीमत बढ़कर 273 डॉलर प्रति टन हो सकती है।
कीमतों में बढ़ोतरी का प्रमुख कारण सूखा: शोधकर्ताओं ने गंभीर जल संकट (Severe Water Scarcity - SWS) नामक एक इंडिकेटर विकसित किया है, जो फसल कटाई से पहले के महत्वपूर्ण चार महीनों के दौरान नमी की कमी को मापता है। 2000 से 2021 के बीच वैश्विक गेहूं की कीमतों में सालाना उतार-चढ़ाव का करीब 74% हिस्सा अकेले SWS की व्यापकता से समझा जा सकता है।
एक साथ कई क्षेत्रों में फसल नुकसानः आमतौर पर स्थानीय स्तर पर पड़ने वाले सूखे का असर वैश्विक अनाज भंडार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के जरिए कम किया जा सकता है। लेकिन जब कई प्रमुख गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में एक साथ सूखा पड़ता है, तो बाजार की सुरक्षा व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ता है और कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।
प्रमुख खाद्यान्नों में गेहूं सबसे अधिक संवेदनशील
शोध टीम ने तीन प्रमुख वैश्विक खाद्य फसलों - गेहूं, मक्का और चावल - का विश्लेषण किया। इसमें पाया गया कि गंभीर जल संकट से उत्पन्न वैश्विक बाजार झटकों के प्रति गेहूं असामान्य रूप से अधिक संवेदनशील है। मक्का की कीमतों और एक साथ पड़ने वाले सूखे की व्यापकता के बीच संबंध काफी कमजोर पाया गया, जबकि चावल की कीमतों में ऐसा कोई समान सांख्यिकीय संबंध नहीं मिला।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इसका कारण गेहूं का विशिष्ट भौगोलिक विस्तार, कुल उत्पादन की तुलना में इसका अपेक्षाकृत अधिक व्यापार और फूल आने तथा दाना भरने जैसे संवेदनशील विकास चरणों के दौरान वर्षा पर इसकी निर्भरता है।
ऐतिहासिक रूप से किसी भी वर्ष में गंभीर जल संकट से दुनिया के औसतन 5% गेहूं उत्पादक क्षेत्र प्रभावित हुए। हालांकि 2000, 2010, 2012 और 2020 जैसे बड़े संकट वाले वर्षों में यह आंकड़ा 15% से अधिक रहा। 31 वैश्विक जलवायु मॉडलों के इस्तेमाल से किए गए सिमुलेशन से संकेत मिलता है कि वैश्विक तापमान बढ़ने के साथ व्यापक स्तर पर होने वाली ऐसी घटनाएं दुर्लभ सांख्यिकीय घटनाओं से बदलकर बार-बार होने वाली घटनाओं में तब्दील हो सकती हैं।
प्रणालीगत जोखिम और नीतिगत प्रभाव
शोधकर्ताओं ने जोर दिया कि सूखा अकेले काम नहीं करता। ऊर्जा की कीमतें, उर्वरक लागत, मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव, अनाज के भंडार और भू-राजनीतिक व्यवधान, जैसे व्यापार प्रतिबंध या युद्ध भी उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई जाने वाली अंतिम कीमत निर्धारित करते हैं।
सह-लेखक यॉर्गेन ई. ओलेसन ने लिखा कि गेहूं दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसलों में से एक है, इसलिए जलवायु संबंधी उत्पादन समस्याओं के तेजी से वैश्विक परिणाम सामने आ सकते हैं। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि सूखे को अलग-अलग स्थानीय घटनाओं की श्रृंखला के बजाय एक अंतरराष्ट्रीय चुनौती के रूप में देखने की जरूरत है। कम आय वाले परिवार अपनी आय का अपेक्षाकृत बड़ा हिस्सा आवश्यक खाद्य पदार्थों पर खर्च करते हैं। ऐसे में कीमतों में तेज बढ़ोतरी से मानवीय और आर्थिक जोखिम काफी बढ़ सकते हैं।
इन परस्पर जुड़े जोखिमों से निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने वैश्विक कृषि की क्षमता और लचीलापन बढ़ाने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाने की जरूरत बताई है। इसमें गर्मी और सूखा सहने वाली फसल किस्मों के विकास में तेजी, सिंचाई प्रणालियों का आधुनिकीकरण, कमजोर कृषि क्षेत्रों में मिट्टी की नमी बनाए रखने की क्षमता बढ़ाना तथा रणनीतिक अनाज भंडार और व्यापार समझौतों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समन्वय मजबूत करना शामिल हैं, ताकि एक साथ आने वाले जलवायु झटकों के दौरान बाजार में घबराहट को रोका जा सके।