रूस-ईरान प्रतिबंध कानून पर ट्रंप ने किए हस्ताक्षर, मिला भारत पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान पर प्रतिबंधों से जुड़े कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जिससे रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार अमेरिका को मिल गया है। हालांकि, कानून पर हस्ताक्षर का अर्थ भारत पर स्वतः 100% टैरिफ लगना नहीं है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान पर प्रतिबंधों से जुड़े उस कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जो उनके प्रशासन को रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। दुनिया में रूसी कच्चे तेल के बड़े खरीदारों में शामिल भारत भी इस नए टैरिफ ढांचे के दायरे में आ सकता है। इससे भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों और भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है।

हालांकि, एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ट्रंप के कानून पर हस्ताक्षर करने का मतलब यह नहीं है कि भारत पर 100% टैरिफ लगा दिया गया है। कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकतम 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। वास्तविक टैरिफ इससे काफी कम भी हो सकता है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी प्रशासन किन देशों को कानून के दायरे में रखता है, उनके लिए कितनी टैरिफ दर तय करता है और इसे किस तरह लागू किया जाता है। इसलिए फिलहाल इसे भारत पर 100% टैरिफ लगने के बजाय इसके संभावित जोखिम के रूप में देखा जाना चाहिए।

सीनेटर लिंडसे ग्राहम की तरफ से पेश किए गए इस एक्ट को अमेरिकी सीनेट ने 7 अगस्त को 86-11 मतों से और प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर को 262-159 मतों से पारित किया था। ट्रंप ने 18 सितंबर को इस पर हस्ताक्षर किए। कानून रूस के ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों, रूसी अधिकारियों तथा वित्तीय संस्थानों पर प्रतिबंधों का विस्तार करता है। इसके अलावा प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाली संस्थाओं और रूस के तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ में शामिल तेल टैंकरों को भी निशाना बनाया गया है।

भारत सहित कई देश टैरिफ जोखिम के दायरे में

कानून के तहत रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े खरीदार देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाया जा सकता है। इसके अलावा, कानून लागू होने के बाद रूस से जानबूझकर नई ऊर्जा खरीद करने वाले देशों तथा रूस को प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले प्रमुख देशों पर भी कार्रवाई का प्रावधान है।

भारत और चीन रूस के कच्चे तेल के बड़े खरीदार हैं, इसलिए दोनों इस प्रावधान के संभावित दायरे में हैं। इसके अलावा ब्राजील, जापान और यूरोपीय संघ के कुछ देश भी अमेरिकी प्रशासन की व्याख्या और संबंधित सूची तैयार करने के तरीके के आधार पर जांच के दायरे में आ सकते हैं।

हालांकि, कानून में अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि किन देशों को अंतिम रूप से निशाना बनाया जाएगा और उनके लिए कितनी टैरिफ दर तय होगी। इसलिए भारत के संभावित टैरिफ प्रभाव का आकलन अभी निश्चित रूप से नहीं किया जा सकता।

रूसी प्राकृतिक गैस के मामले में कुछ देशों को छूट का प्रावधान भी है। जिन देशों के लिए संबंधित अवधि में रूस से होने वाला गैस आयात रूस के कुल गैस निर्यात का 15% से कम रहा है और जिन्होंने रूसी गैस पर निर्भरता कम करने के लिए ‘महत्वपूर्ण कदम’ उठाए हैं, वे इस प्रावधान के तहत छूट के पात्र हो सकते हैं।

रूसी तेल पर भारत की बढ़ती निर्भरता

यह मामला भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 88% से अधिक आयात करता है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के विश्लेषण के अनुसार, जुलाई 2026 में भारत ने रूस से 7.27 अरब डॉलर मूल्य का कच्चा तेल आयात किया, जो उस महीने भारत के कुल 14.21 अरब डॉलर के कच्चे तेल आयात का 51.1% था।

जुलाई में भारत के कच्चे तेल आयात में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की हिस्सेदारी 10.8%, सऊदी अरब की 9.6%, वेनेजुएला की 6.3%, ब्राजील की 5.5%, ओमान की 5.3% और अमेरिका की 2.9% थी। इस तरह GTRI के अनुसार, रूस अकेले इन छह देशों से भारत के संयुक्त आयात से अधिक कच्चा तेल उपलब्ध करा रहा था।

भारत के कच्चे तेल आयात का स्रोत पिछले कुछ वर्षों में काफी बदला है। 2022 से पहले खाड़ी देशों की भारत के कच्चे तेल आयात में हिस्सेदारी 55% से अधिक थी, जबकि रूस की हिस्सेदारी 15% से कम थी। इसके बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में बदलाव और रूसी कच्चे तेल की व्यावसायिक प्रतिस्पर्धात्मकता के कारण भारत ने रूस से खरीद काफी बढ़ाई।

व्यापार समझौते और ऊर्जा सुरक्षा पर असर

GTRI का आकलन है कि नया अमेरिकी कानून भारत के साथ व्यापार वार्ता में वाशिंगटन को अतिरिक्त दबाव का साधन दे सकता है। GTRI के अनुसार, अमेरिका रूसी तेल की खरीद कम करने के लिए भारत पर दबाव डाल सकता है और इसके साथ द्विपक्षीय व्यापार वार्ता में रियायतें मांग सकता है।

नए कानून से अमेरिकी प्रशासन को टैरिफ कार्रवाई के लिए कांग्रेस द्वारा स्वीकृत कानूनी आधार भी मिलता है। इससे यह व्यवस्था उन कुछ पूर्ववर्ती टैरिफ उपायों से अलग हो सकती है, जिनका आधार मुख्य रूप से राष्ट्रपति के कार्यकारी अधिकार रहे हैं। कानून के तहत अमेरिकी प्रशासन को किन देशों को लक्षित किया जाएगा, इसकी पहचान और टैरिफ दर तय करने में व्यापक अधिकार प्राप्त हैं।

भारत के लिए फिलहाल वास्तविक आर्थिक प्रभाव कई आगामी फैसलों पर निर्भर करेगा - क्या भारत को औपचारिक रूप से लक्षित देशों की सूची में शामिल किया जाता है, टैरिफ की वास्तविक दर क्या तय होती है, किन उत्पादों पर इसे लागू किया जाता है और इसे कब लागू किया जाता है।