ट्रंप के 10% वैश्विक आयात शुल्क को भी अमेरिकी कोर्ट ने खारिज किया, अमेरिका फिर WTO के MFN टैरिफ ढांचे की ओर

अमेरिकी व्यापार अदालत ने ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा लगाए गए 10% वैश्विक आयात शुल्क को अवैध ठहरा दिया है। इससे पहले रेसिप्रोकल टैरिफ को भी अदालत खारिज कर चुका है। इस फैसले के बाद अमेरिका फिर से WTO के मोस्ट-फेवर्ड-नेशन (MFN) टैरिफ ढांचे की ओर लौटता दिख रहा है।

अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय व्यापार न्यायालय ने 7 मई को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत लगाए गए 10% वैश्विक आयात शुल्क को रद्द कर दिया। ये शुल्क 20 फरवरी को लागू किए गए थे और लागू होने के 50 दिनों से भी कम समय में अदालत ने इन्हें खारिज कर दिया। अब रेसिप्रोकल टैरिफ और धारा 122 के तहत लगाए गए शुल्क, दोनों कोर्ट द्वारा अमान्य घोषित किए जाने के बाद अमेरिकी टैरिफ व्यवस्था काफी हद तक विश्व व्यापार संगठन (WTO) के मानक ‘मोस्ट-फेवर्ड-नेशन’ (MFN) शुल्क ढांचे पर आधारित पुराने स्वरूप की ओर लौट रही है।

धारा 122 राष्ट्रपति को गंभीर भुगतान संतुलन (Balance of Payments) संकट से निपटने के लिए कांग्रेस की मंजूरी के बिना अधिकतम 150 दिनों तक 15% तक आयात शुल्क लगाने की अनुमति देती है। ये शुल्क 20 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रेसिप्रोकल टैरिफ निरस्त करने के कुछ घंटे बाद ही लगाए गए थे।

अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय व्यापार न्यायालय ने 2-1 के फैसले में कहा कि ट्रंप प्रशासन ने 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत कांग्रेस द्वारा दिए गए अधिकारों से आगे बढ़कर कार्रवाई की। अदालत ने इन टैरिफ को “अवैध” और “कानून द्वारा अधिकृत नहीं” बताया। अदालत ने कहा कि यह कानून भुगतान संतुलन से जुड़ी आपात स्थितियों के लिए बनाया गया था, न कि व्यापार घाटा कम करने के उद्देश्य से व्यापक टैरिफ लगाने के लिए।

हालांकि, यह फैसला फिलहाल केवल उन पक्षों पर लागू होगा जिन्होंने यह मामला दायर किया था। इनमें वाशिंगटन राज्य, मसाला आयातक बर्लैप एंड बैरल और खिलौना निर्माता बेसिक फन शामिल हैं। अमेरिकी सरकार द्वारा फैसले के खिलाफ अपील किए जाने तक अन्य आयातकों पर ये टैरिफ जारी रहेंगे। अदालत ने इस स्तर पर पूरे देश में टैरिफ पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने राहत केवल याचिकाकर्ताओं तक सीमित रखी। कार्यपालिका के अधिकारों से जुड़े राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में अमेरिकी अदालतें कभी-कभी ऐसा रुख अपनाती हैं।

इस फैसले के खिलाफ ट्रंप प्रशासन के अमेरिका के कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फेडरल सर्किट में अपील करने की संभावना है, जबकि याचिकाकर्ता इस निर्णय को पूरे देश में लागू कराने की मांग कर सकते हैं। यह मामला अंततः फिर से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकता है, जिससे प्रशासन की व्यापार रणनीति को लेकर अनिश्चितता और लंबी खिंच सकती है।

धारा 122 के तहत लगाए गए टैरिफ का कानूनी आधार कमजोर 

धारा 122 के तहत लगाए गए टैरिफ का कानूनी आधार कमजोर माना गया, क्योंकि यह कानून मूल रूप से गंभीर भुगतान संतुलन संकट और डॉलर के लगातार बाहरी प्रवाह से निपटने के लिए बनाया गया था। हालांकि, 1973 से अमेरिका मुक्त-परिवर्तनीय (फ्री-फ्लोटिंग) डॉलर प्रणाली के तहत काम कर रहा है, जहां व्यापार असंतुलन को आयात प्रतिबंधों के बजाय विनिमय दरों और वैश्विक पूंजी प्रवाह के माध्यम से संतुलित किया जाता है। अमेरिका का व्यापार घाटा काफी बड़ा है, इसके बावजूद वह भारी विदेशी निवेश आकर्षित करता है, क्योंकि डॉलर अब भी दुनिया की प्रमुख आरक्षित मुद्रा बना हुआ है।

अमेरिका के लिए भविष्य के व्यापारिक उपाय

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अजय श्रीवास्तव का कहना है कि IEEPA के तहत लगाए गए रेसिप्रोकल टैरिफ और बाद में लगाए गए सेक्शन 122 शुल्क, दोनों ही कानूनी रूप से कमजोर आधार पर टिके हुए थे। अमेरिकी प्रशासन ने व्यापक शुल्क लगाने के लिए एक कानूनी प्रावधान का इस्तेमाल किया, और जब अदालत ने उसे रोक दिया, तो वह दूसरे कानूनी प्रावधान का सहारा लेने लगा। दुनिया के सबसे बड़े बाजार में इस तरह की अनिश्चित शुल्क व्यवस्था कारोबार के लिए अस्थिरता पैदा करती है, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित करती है और निर्माताओं तथा उपभोक्ताओं दोनों की लागत बढ़ाती है।

श्रीवास्तव के अनुसार, अदालतों द्वारा रेसिप्रोकल शुल्क और सेक्शन 122 शुल्क दोनों को खारिज किए जाने के बाद अब ट्रंप प्रशासन सेक्शन 301 जांच और सेक्शन 232 राष्ट्रीय सुरक्षा शुल्क जैसे लक्षित व्यापारिक उपायों पर अधिक निर्भर हो सकता है। इन उपायों का इस्तेमाल इस्पात, सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स और महत्वपूर्ण खनिज जैसे क्षेत्रों में साझेदार देशों के खिलाफ किया जा सकता है।

अमेरिकी टैरिफ को लेकर कानूनी अनिश्चितता का असर व्यापार वार्ताओं पर भी पड़ रहा है। मलेशिया पहले ही अमेरिका के साथ अपने व्यापार समझौते से पीछे हट चुका है, जबकि कई अन्य देश भी अमेरिका के साथ व्यापार समझौतों पर पुनर्विचार कर रहे हैं।

क्या करे भारत

श्रीवास्तव का सुझाव है कि भारत को द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) को अंतिम रूप देने से पहले तब तक इंतजार करना चाहिए, जब तक अमेरिका अधिक स्थिर और कानूनी रूप से विश्वसनीय व्यापार प्रणाली विकसित नहीं कर लेता। GTRI के अनुसार, वर्तमान में अमेरिका अपने मानक ‘मोस्ट-फेवर्ड-नेशन’ (MFN) टैरिफ को कम करने के लिए तैयार नहीं है, जबकि वह भारत से अधिकांश क्षेत्रों में अपने MFN शुल्क घटाने या समाप्त करने की अपेक्षा कर रहा है। ऐसी परिस्थितियों में कोई भी व्यापार समझौता एकतरफा हो सकता है, जहां भारत स्थायी बाजार पहुंच रियायतें दे दे, लेकिन बदले में उसे कोई सार्थक टैरिफ लाभ प्राप्त न हो।