अमेरिकी सीनेट ने रूस से तेल खरीद पर प्रतिबंधों को दी मंजूरी, भारत पर कब और कैसे पड़ सकता है असर?

अमेरिकी सीनेट ने रूस से ऊर्जा खरीदने वाले प्रमुख देशों से सामान आयात पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की अनुमति देने वाले विधेयक को मंजूरी दे दी है, जिससे भारत पर दबाव बढ़ सकता है। वित्त वर्ष 2026 में भारत ने अपने कच्चे तेल का 30.3% रूस से खरीदा, जिसकी कीमत 40.8 अरब डॉलर थी।

अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन सीनेट ने भारी बहुमत से ऐसे कानून को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत यदि भारत रूसी कच्चे तेल की खरीद जारी रखता है तो अमेरिका भारत से आयात पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगा सकता है। सीनेट ने संबंधित एक्ट को 7 अगस्त को 86-11 वोट से पारित किया।
 
अब यह विधेयक निचले सदन यानी प्रतिनिधि सभा में वापस जाएगा। प्रतिनिधि सभा की बैठक 31 अगस्त को प्रस्तावित है जिसमें वह सीनेट के प्रस्ताव को मंजूर, संशोधित या खारिज कर सकती है। यदि इसमें बदलाव किए जाते हैं, तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास भेजे जाने से पहले दोनों सदनों को एक समान विधेयक पर सहमत होना होगा।
 
व्हाइट हाउस इस प्रस्ताव का समर्थन कर रहा है और संकेत दे चुका है कि राष्ट्रपति ट्रंप इस पर हस्ताक्षर करेंगे। हालांकि, प्रतिनिधि सभा में विधेयक का पारित होना अभी निश्चित नहीं है। कुछ सांसदों को चिंता है कि इससे राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने की व्यापक शक्तियां मिल सकती हैं और अमेरिकी कारोबारियों तथा उपभोक्ताओं की लागत बढ़ सकती है।
 
इस कानून का नाम दक्षिण कैरोलिना के दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया है, जो रूस पर कड़े प्रतिबंधों के प्रबल समर्थक थे। उनकी बहन और सीनेट में उनकी उत्तराधिकारी डार्लिन ग्राहम ने भी विधेयक को आगे बढ़ाने में मदद की।
 
कैसे काम करेगा टैरिफ का प्रावधान?
 
यह विधेयक भारत पर स्वतः 100% टैरिफ लागू नहीं करता। इसकी धारा 113 के तहत राष्ट्रपति को ऐसे देशों से आने वाले सामान पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया है, जो कानून लागू होने के 30 दिन बाद भी रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदना जारी रखते हैं और रूसी ऊर्जा के पांच सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हैं। विधेयक के प्रस्तावकों ने चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान को रूसी कच्चे तेल के पांच सबसे बड़े खरीदारों के रूप में चिन्हित किया है।
 
ये अतिरिक्त टैरिफ पहले से लागू अमेरिकी शुल्कों के अलावा होंगे। इनमें धारा 301 और धारा 232 के तहत लगाए गए टैरिफ के साथ-साथ एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग शुल्क भी शामिल हैं। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) किसी देश द्वारा रूसी ऊर्जा की खरीद बढ़ाने, घटाने या पूरी तरह बंद करने के आधार पर टैरिफ को 100% तक बढ़ा या घटा सकता है।
 
भारत के सामने क्या हैं विकल्प
इस घटनाक्रम पर दिल्ली स्थित थिंक टैंक GTRI ने कहा, “चीन भारत से अधिक रूसी कच्चा तेल खरीदता है, लेकिन भारत को अमेरिका की ओर से अधिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है। विधेयक राष्ट्रपति ट्रंप को देश-विशिष्ट टैरिफ तय करने का व्यापक अधिकार देता है। वॉशिंगटन पहले भी चीन को छोड़कर भारत पर कार्रवाई कर चुका है। जुलाई 2025 में उसने भारतीय सामान पर रूस से संबंधित 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया था, जिसे फरवरी 2026 में हटाया गया।”
 
वित्त वर्ष 2026 में रूस ने भारत के कुल कच्चे तेल आयात में 30.3% की सप्लाई की थी। भारत ने कुल 134.7 अरब डॉलर के कच्चे तेल आयात में से 40.8 अरब डॉलर का तेल रूस से खरीदा। रियायती रूसी तेल ने भारत के आयात बिल को कम करने, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और महंगाई को नियंत्रित रखने में मदद की है। दबाव में आकर रूसी तेल खरीद बंद करने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर वास्तविक लागत बढ़ सकती है।
 
भारत अमेरिका से भी काफी मात्रा में ऊर्जा खरीद रहा है। वित्त वर्ष 2026 में अमेरिका से भारत का कच्चे तेल का आयात 6.6 अरब डॉलर से बढ़कर 9.1 अरब डॉलर हो गया, जबकि अमेरिका से कुल ऊर्जा खरीद 12.5 अरब डॉलर तक पहुंच गई। इसमें 1.4 अरब डॉलर का LNG, 89.6 करोड़ डॉलर का LPG और 86.1 करोड़ डॉलर का पेट्रो कोक शामिल था। 
 
बड़ी चिंता अमेरिका द्वारा विदेश नीति के लक्ष्यों को लागू करने के लिए व्यापार प्रतिबंधों के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर है। रेसिप्रोकल टैरिफ, धारा 301 के तहत जांच, जबरन श्रम से जुड़े उपाय, क्षेत्र-विशेष टैरिफ और अब रूस से संबंधित प्रतिबंधों ने टैरिफ को रणनीतिक दबाव के साधन में बदल दिया है।
 
GTRI ने कहा, “भारत को टैरिफ की धमकियों के दबाव में अपनी ऊर्जा नीति तय नहीं करनी चाहिए। जब तक रूसी कच्चा तेल व्यावसायिक रूप से आकर्षक बना रहता है, भारत को इसकी खरीद जारी रखनी चाहिए। वॉशिंगटन के साथ मतभेदों को दृढ़ बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए, न कि एकतरफा रियायतें देकर, जिससे भारत की ऊर्जा लागत बढ़े और उसकी रणनीतिक स्वायत्तता कमजोर हो।”