अनाज से डेयरी तक- हीटवेव और सूखे से यूरोप में फसलों का उत्पादन 60% तक घटने के आसार

हीटवेव और बढ़ते सूखे ने यूरोप के कृषि क्षेत्र को गंभीर संकट में डाल दिया है। फ्रांस, इटली और स्पेन में फसलों को भारी नुकसान की खबरें हैं। घटती पैदावार, पशुओं पर बढ़ता गर्मी का दबाव और आपदाओं की बढ़ती लागत ने सरकारों पर भी दबाव बढ़ा दिया है।

अनाज से डेयरी तक- हीटवेव और सूखे से यूरोप में फसलों का उत्पादन 60% तक घटने के आसार

यूरोप का कृषि क्षेत्र भीषण गर्मी और लंबे समय से जारी सूखे का सामना कर रहा है। इसका असर फसलों और पशुधन पर दिखाई देने लगा है। प्रमुख कृषि क्षेत्रों में सब्जी, अनाज, डेयरी और वाइन उत्पादक उत्पादन में भारी गिरावट की जानकारी दे रहे हैं। वहीं, बार-बार आने वाली जलवायु आपदाओं ने भविष्य में होने वाले नुकसान की भरपाई को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है।

यूरोप के सबसे बड़े कृषि उत्पादकों में शामिल फ्रांस इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित देशों में है। सब्जी किसानों ने लेट्यूस में 35% और ब्रोकोली में 60% तक उत्पादन की कमी बताई है। कुछ क्षेत्रों में आर्टिचोक (हाथीचक) का नुकसान 50% से 100% तक रहने का अनुमान है। एक साथ कई उत्पादन क्षेत्रों में नुकसान होने से स्थिति और गंभीर हो गई है, क्योंकि पहले किसी एक क्षेत्र में बेहतर उत्पादन के जरिए दूसरे क्षेत्र के नुकसान की भरपाई हो जाती ती।

भीषण गर्मी का असर अनाज उत्पादन पर भी पड़ा है। फ्रांस में मक्का उत्पादन करीब 90 लाख टन रहने का अनुमान है, जो पिछले साल की तुलना में लगभग 35% कम और करीब 1980 के बाद का सबसे निचला स्तर होगा। हालांकि, उत्पादन में गिरावट किसानों द्वारा अन्य फसलों का रुख करने की वजह से भी है।

पशुधन क्षेत्र भी गर्मी के असर से अछूता नहीं है। डेयरी गायों में अपेक्षाकृत सामान्य तापमान पर भी हीट स्ट्रेस शुरू हो जाता है। फ्रांस के किसानों ने दूध उत्पादन में 10-15% की गिरावट की सूचना दी है। वहीं, सर्दियों के लिए पशु चारे के रूप में इस्तेमाल होने वाले घास का उत्पादन दीर्घकालिक औसत से करीब 30% कम रहने का अनुमान है। इससे आने वाले महीनों में चारे की उपलब्धता और लागत को लेकर चिंता बढ़ गई है। उससे भी दूध उत्पादन पर असर पड़ सकता है। पोल्ट्री उत्पादन भी प्रभावित हुआ है और गर्मी से होने वाली मुर्गियों की मौतों के कारण अंडों का उत्पादन सामान्य स्तर की तुलना में करीब 10 लाख अंडे प्रतिदिन कम हो गया है।

इटली भी इसी तरह गंभीर स्थिति का सामना कर रहा है। अनुमान है कि उसके करीब 60% कृषि क्षेत्र में हल्के से लेकर गंभीर स्तर तक सूखे का असर है। मक्का, चावल, सोयाबीन, फल और सब्जियों का उत्पादन प्रभावित हुआ है, जबकि दूध उत्पादन में करीब 20% की गिरावट आई है। जंगल की आग और तेज तूफानों से हुए नुकसान सहित कृषि क्षेत्र को कुल आर्थिक नुकसान 3 अरब यूरो से अधिक रहने का अनुमान है।

इटली की कृषि का केंद्र माने जाने वाली पो घाटी में पो नदी में पानी की उपलब्धता घटने के कारण जोखिम और बढ़ गया है। देश के कुल चावल उत्पादन में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 80% है। सिंचाई के लिए पानी की कमी को देखते हुए चावल किसानों ने असामान्य उपाय अपनाए हैं। इनमें खेतों की सिंचाई एक सप्ताह छोड़कर करने जैसी व्यवस्था भी शामिल है।

स्पेन में भी कृषि क्षेत्र को भारी नुकसान हो रहा है। कई क्षेत्रों में अनाज उत्पादन में तेज गिरावट आई है। कास्तिया-ला मांचा क्षेत्र में उत्पादन 35%, मैड्रिड में 49% और एंडालूसिया में 24% तक घट गया है। भेड़ और बकरी के दूध का उत्पादन भी कम हुआ है। वाइन उद्योग को 2026 में उत्पादन करीब 20% घटने की आशंका है। अत्यधिक गर्मी और नमी की कमी के कारण अंगूर का आकार छोटा हो रहा है।

कृषि संकट के साथ जलवायु संबंधी आपदाओं की लागत लगातार बढ़ रही है। यूरोपीय संघ के आंकड़ों के अनुसार, 1980 से 2024 के बीच मौसम और जलवायु संबंधी चरम घटनाओं से अनुमानित 822 अरब यूरो का आर्थिक नुकसान हुआ। इसमें करीब एक-चौथाई नुकसान पिछले चार वर्षों में हुआ है। वित्तीय बोझ इसलिए भी चिंता का विषय है क्योंकि यूरोपीय संघ में जलवायु संबंधी आपदाओं से होने वाले नुकसान का केवल करीब एक-चौथाई हिस्सा ही बीमित है। कई देशों में बीमा कवरेज 5% से भी कम है। 

यूरोपीय सरकारों के लिए यह स्थिति एक बड़ी चुनौती बन रही है। बार-बार आने वाले सूखे, बाढ़, जंगल की आग और हीटवेव भविष्य में ऐसी आपातकालीन लागत को बढ़ा सकते हैं। इसीलिए सरकारें अब अधिक स्थायी समाधान पर विचार कर रही हैं। इनमें जलवायु-लचीले बुनियादी ढांचे को मजबूत करना, बीमा कवरेज बढ़ाना, सार्वजनिक-निजी पुनर्बीमा व्यवस्था और आपदा बांड जैसे उपाय शामिल हैं। यूरोपीय संघ भी जलवायु अनुकूलन और आपदा जोखिम प्रबंधन को लेकर प्रस्ताव तैयार कर रहा है।

हालांकि किसानों के लिए तत्काल चुनौती उत्पादन और आय को बचाना है। फ्रांस ने 14.5 करोड़ यूरो की आपात सहायता की घोषणा की है, लेकिन जलवायु संबंधी झटकों की बढ़ती तीव्रता और आवृत्ति को देखते हुए केवल अल्पकालिक राहत पर्याप्त नहीं हो सकती। 

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