फीड लागत में 25% उछाल से पोल्ट्री और अंडा क्षेत्र की बढ़ी मुश्किलें
मक्का, डीओआरबी और अन्य प्रमुख फीड सामग्री महंगी होने से भारत के बढ़ते पोल्ट्री क्षेत्र पर लागत का दबाव बढ़ रहा है। अंडे की खपत और लेयर प्लेसमेंट बढ़ने के साथ फीड की उपलब्धता बड़ी चुनौती बन सकती है। बता रहे हैं पोल्ट्री फेडरेशन ऑफ इंडिया के संयुक्त सचिव रिकी थापर।
भारत दुनिया में अंडों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। देश में सालाना 146 अरब अंडों का उत्पादन होता है। हर साल करीब 40 करोड़ लेयर मुर्गियों का प्लेसमेंट (अंडों के लिए) होता है। लेकिन यूरोप और अमेरिका जैसे विकसित देशों की तुलना में भारत में प्रति व्यक्ति अंडे की खपत अभी काफी कम है। भारत में प्रति व्यक्ति सालाना खपत केवल 106 अंडे है।
अंडा उत्पादन की कुल लागत में फीड की हिस्सेदारी सबसे अधिक है, जो लगभग 65-70 प्रतिशत है। फीड में मुख्य रूप से मक्का, सोयाबीन मील, डी-ऑयल्ड राइस ब्रान (DORB) और DDGS (डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विथ सॉल्यूबल्स) के साथ विटामिन और अमीनो एसिड का इस्तेमाल होता है। वर्तमान में लेयर फीड की लागत लगभग 30,000-32,000 रुपये प्रति मीट्रिक टन है, जबकि अप्रैल 2026 में यह करीब 24,000 रुपये प्रति मीट्रिक टन थी। यानी केवल चार महीनों में इसकी लागत 20-25 प्रतिशत बढ़ गई है।
फीड सामग्री की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण फीड महंगा हुआ है। मक्का की कीमत अप्रैल 2026 के 21,000 रुपये प्रति मीट्रिक टन से बढ़कर अगस्त में 26,500-27,000 रुपये प्रति मीट्रिक टन हो गई। एथनॉल उद्योग की बढ़ती मांग के कारण मक्का की कीमतों में आगे भी बढ़ोतरी हो सकती है। खाद्य, फीड और ईंधन को एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करने के बजाय साथ-साथ बढ़ना चाहिए।
डी-ऑयल्ड राइस ब्रान (DORB) की लागत भी अप्रैल 2026 में 14,000 रुपये प्रति मीट्रिक टन से बढ़कर अगस्त में 22,000 रुपये प्रति मीट्रिक टन हो गई। इसी तरह अन्य फीड सामग्री की लागत भी बढ़ रही है।
पोल्ट्री उद्योग सालाना 7-8 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, जबकि कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर केवल 1-2 प्रतिशत है। ऐसे में आने वाले वर्षों में फीड सामग्री की उपलब्धता एक बड़ी समस्या बन सकती है। इसलिए फीड सुरक्षा को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा का हिस्सा माना जाना चाहिए।
पोल्ट्री फीड में इस्तेमाल होने वाले अधिकांश विटामिन और अमीनो एसिड यूरोप से आयात किए जाते हैं। ईरान संघर्ष के बाद समुद्री रास्ते से माल ढुलाई की दरों में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। इसके कारण लाइसिन, मेथियोनिन और अन्य अमीनो एसिड तथा विटामिन की कीमतों में भी वृद्धि हुई है।
पिछले 5-6 वर्षों में हर साल औसतन 5 प्रतिशत की महंगाई रही है। हालांकि, पिछले पांच वर्षों में अंडों की कीमतों में उतनी वृद्धि नहीं हुई है। अंडों की खपत और लेयर प्लेसमेंट दोनों 7-8 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रहे हैं। उम्मीद है कि अंडों की कीमतों में आगे बढ़ोतरी होगी, क्योंकि मौजूदा कीमतों पर उत्पादन लागत बढ़ने और बिजली तथा श्रम जैसी अन्य लागतों में वृद्धि के कारण किसान को ज्यादा लाभ नहीं हो रहा है।
वर्तमान में अंडे की थोक कीमत एक्स-फार्म स्तर पर 6.50 रुपये है, जबकि खुदरा कीमत अलग-अलग जगहों पर 8-9 रुपये प्रति अंडा है। आगामी सर्दियों के मौसम में अंडों की मांग और बढ़ने की संभावना है। ऐसे में मौजूदा स्तर से बढ़कर खुदरा कीमत कम से कम 10-11 रुपये प्रति अंडा पहुंच सकती है। घरेलू मांग के अलावा, मध्य पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ देशों से भी अंडों की निर्यात मांग भी है।
1.4 अरब आबादी वाले देश के लिए प्रोटीन सुरक्षा खाद्य और पोषण सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किफायती अंडे, चिकन, दूध, मांस और अन्य पशु-आधारित खाद्य पदार्थ उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन की बढ़ती मांग को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन प्रोटीन सुरक्षा की शुरुआत फीड सुरक्षा से होती है। मक्का और सोयाबीन मील जैसी प्रमुख फीड सामग्री की उपलब्धता, किफायती कीमत और टिकाऊ आपूर्ति भारत के पोल्ट्री और पशुधन क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धात्मकता और मजबूती को तेजी से प्रभावित करेगी। इसलिए फीड सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में महत्वपूर्ण स्थान देना जरूरी है।
भारत का पशुपालन क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। बढ़ती आय, शहरीकरण और पोषण के प्रति बढ़ती जागरूकता से गुणवत्तापूर्ण पशु-आधारित प्रोटीन की मांग बढ़ रही है। इस मांग को टिकाऊ तरीके से पूरा करने के लिए हमें फीड सुरक्षा - प्रोटीन सुरक्षा - पोषण सुरक्षा - सतत विकास पर ध्यान देना होगा। इसके लिए कुशल आपूर्ति श्रृंखला, तकनीक आधारित खेती, उत्पादकता में वृद्धि, नीतिगत स्थिरता तथा सरकार, उद्योग, किसानों, शोधकर्ताओं और वैश्विक साझेदारों के बीच बेहतर सहयोग जरूरी है।
भारत में पशुपालन का भविष्य केवल अधिक उत्पादन करने तक सीमित नहीं है। लक्ष्य हर भारतीय के लिए किफायती, सुरक्षित, पौष्टिक और टिकाऊ प्रोटीन उपलब्ध कराना होना चाहिए। भारत की पशुधन खेती प्रोटीन सुरक्षा, फीड सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका और टिकाऊ आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
भारतीय पशुपालन को अधिक प्रतिस्पर्धी, मजबूत और वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक बनाने के लिए सरकार और उद्योग के बीच मजबूत साझेदारी, विज्ञान आधारित नीतियां, तकनीक का इस्तेमाल, फीड सामग्री की भरोसेमंद उपलब्धता और उद्योग की एकजुट आवाज जरूरी होगी।
(लेखक पोल्ट्री फेडरेशन ऑफ इंडिया के संयुक्त सचिव हैं)

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