पीएम-किसान को कृषि कैलेंडर से जोड़ा जाए तो किसानों को होगा ज्यादा फायदा

पीएम-किसान योजना को 2030-31 तक पांच वर्षों के लिए जारी रखने से निश्चित आय सहायता को समयबद्ध और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप कृषि सलाह से जोड़ने का अवसर मिला है। प्रत्येक किस्त को जिला स्तर के कृषि कैलेंडर से जोड़कर किसानों को फसल, पशुपालन, बागवानी और कृषि निवेश की बेहतर योजना बनाने में मदद की जा सकती है, जबकि राशि के उपयोग की पूरी स्वतंत्रता किसान के पास बनी रहेगी।

पीएम-किसान को कृषि कैलेंडर से जोड़ा जाए तो किसानों को होगा ज्यादा फायदा

किसी किसान परिवार के लिए साल के अलग-अलग समय में 2,000 रुपये की अलग-अलग उपयोगिता हो सकती है। बुवाई से पहले यह राशि बीज या उर्वरक खरीदने में मदद कर सकती है। किसी अन्य मौसम में इसका उपयोग चारे, पशु चिकित्सा या बागवानी संबंधी इनपुट खरीदने के लिए किया जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में, जहां खेती का कैलेंडर छोटा और अधिक चुनौतीपूर्ण होता है, यह राशि सर्दियों से पहले परिवार के लिए जरूरी सामान जुटाने में मदद कर सकती है। राशि भले ही समान रहती है, लेकिन उसकी उपयोगिता समय के साथ बदलती रहती है।

31 जुलाई 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) को अगले पांच वर्षों तक जारी रखने का फैसला किया है। योजना वर्ष 2030-31 तक जारी रहेगी और इसके लिए 3,15,614 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। पात्र किसान परिवारों को पहले की तरह सालाना 6,000 रुपये मिलते रहेंगे, जो 2,000 रुपये की तीन किस्तों में उनके खातों में हस्तांतरित किए जाएंगे।

योजना के इस विस्तार से किसान परिवारों को निश्चित आय का एक महत्वपूर्ण आधार मिलता है। पीएम-किसान ने एक सरल और भरोसेमंद व्यवस्था विकसित की है, जिसके तहत सहायता सीधे किसान के बैंक खाते में पहुंचती है और परिवार यह तय करता है कि उसका सबसे बेहतर उपयोग कैसे किया जाए।

योजना का अगला चरण इस मजबूत आधार को और आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है। प्रत्येक किस्त के साथ उस मौसम के दौरान कृषि, बागवानी, पशुपालन और संबंधित उपलब्ध सेवाओं से जुड़ी संक्षिप्त एवं स्थानीय जरूरतों के अनुरूप जानकारी भी दी जा सकती है। इसका उद्देश्य किसान के सामने उपलब्ध विकल्पों को बढ़ाना होगा। आर्थिक सहायता का उपयोग पूरी तरह किसान की इच्छा पर निर्भर रहेगा, लेकिन समय पर उपलब्ध उपयोगी जानकारी परिवारों को अपनी कृषि और आजीविका संबंधी जरूरतों की बेहतर योजना बनाने में मदद कर सकती है।

एक इकाई के रूप में किसान परिवार

मेरी शैक्षणिक पृष्ठभूमि पशु चिकित्सा विज्ञान की है और मेरे प्रशासनिक अनुभव का एक बड़ा हिस्सा जम्मू-कश्मीर के ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में रहा है। इस अनुभव से मिली एक महत्वपूर्ण सीख यह है कि ग्रामीण परिवार अपनी आजीविका को समग्र रूप से संचालित करता है। कृषि, पशुपालन, बागवानी, मजदूरी और घरेलू खर्च एक-दूसरे से गहराई से जुड़े होते हैं।

एक परिवार थोड़ी-सी जमीन पर खेती कर सकता है, बाग संभाल सकता है, गाय, भेड़ या बकरियां पाल सकता है और मौसमी मजदूरी पर भी निर्भर हो सकता है। एक गतिविधि से होने वाली आय अक्सर दूसरी गतिविधि को सहारा देती है। फसल से होने वाली आमदनी का इस्तेमाल पशुओं के चारे के लिए किया जा सकता है। दूध से होने वाली आय बीज की लागत पूरी कर सकती है। पशुधन दो कृषि मौसमों के बीच नियमित नकदी प्रवाह उपलब्ध करा सकता है।

ऐसे माहौल में एक छोटी लेकिन नियमित आर्थिक सहायता भी बेहतर योजना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसका महत्व तब और बढ़ सकता है, जब इस सहायता के साथ परिवार को वर्ष के उस समय से संबंधित उपयोगी जानकारी भी मिले।

भारत का कृषि कैलेंडर अलग-अलग क्षेत्रों में काफी भिन्न है। मैदानी इलाकों में धान उगाने वाले किसान की जरूरतें पहाड़ों में सेब की खेती करने वाले किसान से अलग होती हैं। पशुधन रखने वाले परिवार के लिए किसी खास समय पर टीकाकरण, चारा संरक्षण या कृमिनाशक दवाओं की जरूरत अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में किसानों के पास खेती के लिए अपेक्षाकृत कम अवधि होती है और वे सर्दियों से काफी पहले कृषि इनपुट की योजना बनाते हैं।

इसलिए राष्ट्रीय स्तर की आय सहायता योजना को जिला स्तर के कृषि कैलेंडर के साथ जोड़ा जा सकता है, जिसमें स्थानीय फसलों, पशुपालन प्रणालियों, मौसम की परिस्थितियों और मौसमी आजीविका की जरूरतों को ध्यान में रखा जाए।

मौसम संबंधी संक्षिप्त सलाह

जिला प्रशासन पीएम-किसान की प्रत्येक किस्त के साथ कृषि और पशुपालन से जुड़ी एक संक्षिप्त मौसमी सलाह तैयार कर सकता है। जरूरी नहीं कि यह कोई लंबा दस्तावेज हो। स्थानीय भाषा में एक छोटा सा संदेश आगामी मौसम से जुड़े दो-तीन व्यावहारिक बिंदुओं की जानकारी दे सकता है। इसमें किसानों को निम्नलिखित विषयों के बारे में जानकारी दी जा सकती है:

क) आगामी बुवाई का समय;
ख) प्रमाणित बीज की उपलब्धता;
ग) मिट्टी जांच की सेवाएं;
घ) बागवानी संबंधी कार्य;
ङ) पशु टीकाकरण  कार्यक्रम;
च) फसल बीमा की समय-सीमा;
छ) पशु चिकित्सा शिविर; या
ज) स्थानीय प्रशिक्षण कार्यक्रम।

यह सलाह कृषि, बागवानी, पशुपालन और संबंधित विभाग संयुक्त रूप से तैयार कर सकते हैं। इसमें कृषि विज्ञान केंद्रों, पंचायतों, सहकारी समितियों, कॉमन सर्विस सेंटर और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) का सहयोग लिया जा सकता है। पीएम-किसान की किस्त जारी होने का चक्र इस जानकारी के समन्वय के लिए एक सुविधाजनक माध्यम बन सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र में बुवाई शुरू होने से पहले किस्त मिलती है, तो उसके साथ बीज की उपलब्धता, मिट्टी की जांच और फसल बीमा की जानकारी दी जा सकती है। पशुपालन पर अधिक निर्भर क्षेत्रों में सलाह का केंद्र टीकाकरण, चारा संरक्षण और पशु चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच हो सकता है। इसी तरह, बागवानी वाले क्षेत्रों में छंटाई, पौध संरक्षण, ग्रेडिंग या कटाई के बाद के प्रबंधन से संबंधित जानकारी दी जा सकती है।

इस दृष्टिकोण की सबसे बड़ी ताकत इसकी सरलता है। आर्थिक सहायता पहले की तरह जारी रहेगी, जबकि किसान को उसी समय उपयोगी जानकारी भी मिलेगी, जब वह खेती से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेने की तैयारी कर रहा हो।

मजबूत वितरण प्रणाली का लाभ उठाना

पीएम-किसान भारत की सबसे बड़ी प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) योजनाओं में से एक बन चुकी है। जून 2026 में जारी 23वीं किस्त के तहत 9.44 करोड़ से अधिक किसानों को 18,880 करोड़ रुपये से अधिक की राशि हस्तांतरित की गई, जिसमें 2.18 करोड़ महिला किसान शामिल थीं। योजना शुरू होने के बाद से अब तक 4.46 लाख करोड़ से अधिक की राशि हस्तांतरित की जा चुकी है।

इतने बड़े स्तर पर संचालन से पीएम-किसान के तहत विकसित डिजिटल और प्रशासनिक व्यवस्था की मजबूती का पता चलता है। लाभार्थियों का सत्यापन, आधार आधारित प्रक्रियाएं, बैंक खातों में सीधे हस्तांतरण, भुगतान की स्थिति पर नजर रखने और शिकायत निवारण जैसी सुविधाओं ने इस व्यवस्था को देशभर में सुलभ बनाया है। अब इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल स्थानीय जरूरतों और समय के अनुरूप कृषि सलाह पहुंचाने के लिए किया जा सकता है।

तकनीक व्यापक पहुंच उपलब्ध करा सकती है, जबकि स्थानीय संस्थाएं उस जानकारी को स्थानीय संदर्भ प्रदान कर सकती हैं। बहुत से किसान अपने मोबाइल फोन पर संदेश प्राप्त करने के बाद कृषि विस्तार अधिकारी, पशु चिकित्सा सहायक, पंचायत प्रतिनिधि या अपने क्षेत्र के परिचित अधिकारी से उस पर चर्चा कर सकते हैं। डिजिटल पहुंच और स्थानीय मार्गदर्शन का यह संयोजन मौसमी सलाह को किसानों के लिए अधिक उपयोगी और प्रभावी बना सकता है।

कृषि योजना के हिस्से के रूप में पशुपालन

छोटे और सीमांत किसान परिवारों के लिए पशुधन आर्थिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण आधार होता है। दूध से नियमित नकद आय होती है। भेड़ और बकरियां उत्पादक संपत्ति के रूप में काम करती हैं। गोबर से मिलने वाली जैविक खाद खेती में उपयोगी होती है। पशुधन परिवारों को अलग-अलग कृषि मौसमों के बीच आय का संतुलन बनाए रखने में भी मदद करता है।

पशु चिकित्सा और फील्ड के अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि पशु स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च अक्सर समयबद्ध होता है। टीकाकरण, उपचार, चारा संरक्षण और मौसमी प्रबंधन का परिवार की आय पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है।

इसलिए पीएम-किसान की किस्तों के साथ जुड़ी जिला स्तरीय सलाह में, जहां स्थानीय अर्थव्यवस्था में पशुपालन महत्वपूर्ण है, वहां पशुधन से जुड़ी जरूरतों को भी शामिल किया जा सकता है। यह व्यवस्था विशेष रूप से चरवाहा समुदायों, पर्वतीय और जनजातीय क्षेत्रों के लिए प्रासंगिक है, जहां खेती और पशुपालन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।

स्थानीय स्तर पर तैयार किया गया कृषि-पशुपालन कैलेंडर यह निर्धारित कर सकता है कि किन महीनों में टीकाकरण, कृमिनाशक दवा, चारा भंडारण, प्रजनन संबंधी सहायता या पशु चिकित्सा सेवाओं की सबसे अधिक जरूरत होती है। इसके बाद किसानों को उचित समय पर निकटतम उपलब्ध सेवा की जानकारी दी जा सकती है।

महिला लाभार्थियों तक पहुंच मजबूत करना

नई किस्त के लाभार्थियों में 2.18 करोड़ से अधिक महिलाओं की मौजूदगी महत्वपूर्ण है। महिलाएं पशुओं की देखभाल, चारा जुटाने, बुवाई, निराई-गुड़ाई, कटाई के बाद के कार्यों और परिवार के वित्तीय प्रबंधन में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। स्थानीय जरूरतों और समय के अनुरूप तैयार की गई सलाह महिला लाभार्थियों को स्वयं सहायता समूहों, उत्पादक संगठनों, पशु चिकित्सा सेवाओं, कृषि विस्तार सेवाओं और प्रशिक्षण के अवसरों से जोड़ सकती है।

यह जानकारी सरल और स्थानीय भाषा में तैयार की जा सकती है तथा महिला समूहों, पंचायत बैठकों, कृषि विस्तार नेटवर्क और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से साझा की जा सकती है। इससे सूचना तक महिलाओं की पहुंच बढ़ेगी, और आर्थिक सहायता के उपयोग पर लाभार्थी का पूरा अधिकार भी बना रहेगा।

परिणामों से सीखने का अवसर

पीएम-किसान का अगला चरण इस बात का समय-समय पर अध्ययन करने का अवसर भी प्रदान करता है कि नियमित और निश्चित आर्थिक सहायता किसान परिवारों को बेहतर योजना बनाने में किस तरह मदद करती है। यह देखा जा सकता है कि क्या परिवार कृषि इनपुट अधिक सुविधाजनक तरीके से खरीद पा रहे हैं, पशु चिकित्सा या कृषि विस्तार सेवाओं तक पहुंच बना पा रहे हैं, फसल बीमा में भाग ले रहे हैं, मिट्टी की जांच करा रहे हैं या समय पर कृषि निवेश कर पा रहे हैं।

ऐसे अध्ययन क्षेत्रीय स्तर पर सामने आने वाले रुझानों को समझने और स्थानीय सलाह की गुणवत्ता सुधारने में मदद कर सकते हैं। इसका केंद्र किसान परिवारों के अनुभवों से सीखने और योजना के आसपास उपलब्ध सहायता तंत्र को बेहतर बनाने पर रखा जा सकता है।

बेहतर योजना की ओर

पीएम-किसान को पांच वर्षों तक जारी रखने का निर्णय एक स्थिर नीतिगत अवसर प्रदान करता है। योजना की पहले से ही देशव्यापी पहुंच, भरोसेमंद वितरण प्रणाली और किसान परिवारों के साथ मजबूत जुड़ाव है। अगले चरण में इस निश्चितता को समय पर उपलब्ध स्थानीय जानकारी के साथ जोड़ा जा सकता है। आर्थिक सहायता किसान के हाथ में पूरी तरह स्वतंत्र बनी रह सकती है। इसके साथ जिला प्रशासन और स्थानीय संस्थाएं संबंधित सेवाओं को किसानों के लिए समझना और उन तक पहुंचना आसान बना सकती हैं।

किसान परिवार के लिए समय का विशेष महत्व होता है। जब निश्चित आर्थिक सहायता के साथ फसलों, पशुधन और स्थानीय सेवाओं से जुड़ी उपयोगी जानकारी समय पर मिलती है, तो परिवार आने वाले मौसम के लिए बेहतर योजना बना सकता है।

इसलिए अगले पांच वर्षों में पीएम-किसान को उसकी मूल प्रकृति बदले बिना और मजबूत किया जा सकता है। इसके लिए योजना की सबसे बड़ी खूबियों - सरलता, निश्चितता, सीधे हस्तांतरण और किसानों को अपनी जरूरत के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता - को और मजबूत करने की जरूरत है।

(डॉ. अब्दुल खबीर जम्मू-कश्मीर प्रशासनिक सेवा के सदस्य हैं। पशु चिकित्सा विज्ञान में स्नातक डॉ. खबीर ने जम्मू-कश्मीर में ग्रामीण विकास, जनजातीय कल्याण और लोक प्रशासन के क्षेत्र में काम किया है। उन्हें किसानों और चरवाहा समुदायों के साथ काम करने का भी अनुभव है। लेख में व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत हैं।)

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