सरकार ने माना, शुरुआती अनुमान से काफी कम है चीनी उत्पादन
केंद्र सरकार ने माना है कि चालू सीजन में भारत का चीनी उत्पादन शुरुआती अनुमान 343 लाख टन के मुकाबले घटकर करीब 306 लाख टन रहेगा। इसका कारण रेड रॉट तथा टॉप बोरर बीमारियों और जलभराव को बताया गया है। हालांकि सरकार ने कहा कि चीनी का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है और मिलों को 15 अक्टूबर से पेराई शुरू करने की सलाह दी गई है। इस बीच NFCSF ने चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य को बढ़ाकर 43 रुपये प्रति किलोग्राम करने की मांग की है।
केंद्र सरकार ने माना है कि चालू सीजन में वास्तविक चीनी उत्पादन शुरुआती अनुमान की तुलना में काफी कम रहने वाला है। उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने शुक्रवार को एक स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा कि चालू सीजन में चीनी उत्पादन करीब 306 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि शुरुआती अनुमान करीब 343 लाख टन का था।
मंत्रालय के अनुसार, गन्ने की फसल में रेड रॉट और टॉप बोरर रोग के साथ-साथ अत्यधिक बारिश के कारण हुए जलभराव से उत्पादन प्रभावित हुआ है। हालांकि, अनुमान से कम उत्पादन के बावजूद देश में पर्याप्त चीनी स्टॉक उपलब्ध है, जो अक्टूबर में नए पेराई सीजन के शुरू होने तक घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त होगा।
स्पष्टीकरण के अनुसार, राज्यों और चीनी मिलों को 15 अक्टूबर 2026 से पेराई शुरू करने की सलाह दी गई है। इससे अक्टूबर में चीनी उत्पादन सामान्य 3-4 लाख टन से बढ़कर 10 लाख टन से अधिक होने की उम्मीद है। इससे त्योहारी सीजन के दौरान चीनी की उपलब्धता में और सुधार होगा।
हालांकि, अधिकांश स्थानों पर चीनी की कीमत 60 रुपये प्रति किलोग्राम से अधिक हो गई है, लेकिन मंत्रालय ने कहा कि 20 अगस्त 2026 को चीनी की औसत कीमत 55.70 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई, जो एक महीने पहले 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम थी।
यह भी पढ़ेंः नीतिगत फैसलों की खामियां और रिसर्च की कमी का नतीजा है मौजूदा चीनी संकट
मंत्रालय ने कहा, “चीनी की मौजूदा कीमतों में बढ़ोतरी कई कारकों का परिणाम है, जिनमें घरेलू उत्पादन का उम्मीद से कम रहना, त्योहारी सीजन से पहले मांग में वृद्धि, मौसम से गन्ने की फसल को हुआ नुकसान, वैश्विक स्तर पर चीनी की आपूर्ति में कमी तथा उद्योग के कुछ वर्गों द्वारा सट्टेबाजी और जमाखोरी शामिल हैं।”
मंत्रालय ने यह भी कहा कि हाल में चीनी की कीमतों में हुई वृद्धि को एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन से जोड़ना गलत है। वास्तव में, एथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट की जाने वाली चीनी की हिस्सेदारी 2022-23 के 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में करीब 9 प्रतिशत रह गई है। इसके अलावा, देश में उत्पादित एथेनॉल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, विशेष रूप से मक्का, से आता है।
मंत्रालय ने कहा कि एथेनॉल कार्यक्रम से किसानों को लाभ हुआ है और चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति मजबूत हुई है। भारत में सामान्य तौर पर हर साल करीब 320-340 लाख टन चीनी का उत्पादन होता है, जबकि घरेलू खपत करीब 280-290 लाख टन रहती है।
मंत्रालय ने कहा, “अधिक उत्पादन वाले वर्षों में अतिरिक्त स्टॉक से चीनी मिलों की पूंजी रुक जाती है और गन्ना किसानों को भुगतान में देरी होती है। अतिरिक्त चीनी को एथेनॉल की ओर डायवर्ट करने से इस समस्या से निपटने में मदद मिली है और चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति में सुधार हुआ है। इसके परिणाम स्पष्ट हैं। 20 अगस्त 2026 तक 2025-26 चीनी सीजन के गन्ना बकाये का 97 प्रतिशत किसानों को पहले ही भुगतान किया जा चुका है।”
नेशनल कोऑपरेटिव शुगर फेडरेशन ने न्यूनतम बिक्री मूल्य बढ़ाने की मांग की
एक बयान में नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्टरीज (NFCSF) के अध्यक्ष हर्षवर्धन पाटिल ने कहा, “नेशनल शुगर फेडरेशन उपरोक्त फैसलों के सुचारू और प्रभावी क्रियान्वयन में भारत सरकार के साथ मजबूती से खड़ा रहा है और आगे भी रहेगा।”
उन्होंने सरकार से चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य (MSP) को मौजूदा 31 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़ाकर 43 रुपये प्रति किलोग्राम करने का भी अनुरोध किया। उन्होंने कहा, “पूरे सीजन का औसत रियलाइजेशन अभी करीब 40 रुपये प्रति किलोग्राम है, जो 43 रुपये प्रति किलोग्राम की उत्पादन लागत से कम है।”
उन्होंने आगे कहा कि सहकारी चीनी क्षेत्र 15 अक्टूबर 2026 तक पेराई सीजन शुरू करने के लिए हर संभव प्रयास करेगा, बशर्ते संबंधित राज्य सरकारें इसकी अनुमति दें। उन्होंने कहा कि इससे सीजन के शुरुआती दौर में उत्पादित चीनी को त्योहारी मांग में अपेक्षित वृद्धि को पूरा करने के लिए उपलब्ध कराया जा सकेगा।

Join the RuralVoice whatsapp group


















