नीतिगत फैसलों की खामियां और रिसर्च की कमी का नतीजा है मौजूदा चीनी संकट

देश में चीनी की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रही हैं, लेकिन इस संकट की जड़ केवल कमजोर स्टॉक नहीं है। गलत उत्पादन अनुमान, निर्यात से जुड़े फैसलों और बेहतर किस्मों के अभाव ने स्थिति को गंभीर बना दिया है। नतीजतन, एक दशक बाद भारत को फिर से चीनी का आयात करना पड़ रहा है

नीतिगत फैसलों की खामियां और रिसर्च की कमी का नतीजा है मौजूदा चीनी संकट

पिछले करीब डेढ़ माह में जिस तरह देश में चीनी की कीमतें बढ़ी हैं, अब बात केवल चीनी की कीमतों के नए रिकॉर्ड बनने की रह गई है। बढ़ोतरी पर बहस करने का समय बीत चुका है। अहम बात यह है कि देश में चीनी के कमजोर स्टॉक और उत्पादन में गिरावट में किसानों की कहीं कोई गलती नहीं है। इस पूरे संकट की जिम्मेदारी लेने में सरकार को संकोच नहीं करना चाहिए।

देश के सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश के गन्ना किसान पिछले करीब पांच साल से बेहतर गन्ना प्रजाति के इंतजार में नुकसान उठाते जा रहे हैं। वहीं, देश का कृषि मंत्रालय गन्ना उत्पादन के रिकॉर्ड बनाने वाले आंकड़े जारी कर रहा है। दूसरी ओर, चीनी से संबंधित फैसले लेने वाला खाद्य मंत्रालय इस बात से पूरी तरह अनजान रहा कि देश में चीनी उत्पादन गिर रहा है और उसके पास आ रहे अनुमान जमीनी हकीकत से बहुत दूर हैं। यही वजह है कि 13 मई, 2026 को चीनी निर्यात पर प्रतिबंध लगाने से पहले उसके सारे फैसले देश में जरूरत से अधिक चीनी उत्पादन के अनुमान के आधार पर ही हो रहे थे।

उत्पादन अनुमान और हकीकत का अंतर

अब कुछ आंकड़ों पर नजर डालते हैं। चालू पेराई सीजन 2025-26 (1 अक्तूबर, 2025 से 30 सितंबर, 2026) के दौरान चीनी उद्योग ने बंपर उत्पादन के अनुमान जारी किए। इसके मुताबिक देश में 349 लाख टन सकल चीनी उत्पादन, यानी एथेनॉल के लिए डायवर्जन समेत, का अनुमान लगाया गया था। जाहिर है, इसके पीछे कृषि मंत्रालय द्वारा गन्ने के क्षेत्रफल और फसल उत्पादन के अनुमान भी एक बड़ी वजह रहे होंगे।

निजी चीनी मिलों के संगठन इस्मा का अनुमान था कि 34 लाख टन चीनी का इस्तेमाल एथेनॉल के लिए करने के बाद भी देश में 315 लाख टन चीनी उपलब्ध होगी। यह मात्रा घरेलू खपत से करीब 30 लाख टन अधिक थी। इसके अलावा 2024-25 पेराई सीजन का 50 लाख टन चीनी का बकाया स्टॉक भी था। ऐसे में कागजों पर सब कुछ सामान्य दिख रहा था।

लेकिन हकीकत इन अनुमानों से काफी अलग थी। हालांकि खाद्य मंत्रालय का चीनी निदेशालय और खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग इन्हें सही मानकर चल रहा था। यही वजह है कि चालू सीजन में 7 नवंबर, 2025 को 15 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दे दी गई।

निर्यात और एथेनॉल ने बढ़ाई मुश्किलें 

जनवरी, 2026 में ही देश में गन्ने की कमजोर फसल के चलते चीनी उत्पादन अनुमान से काफी कम रहने की स्थिति बन गई थी। रूरल वॉयस द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट्स लगातार इस ओर इशारा करती रही थीं। वहीं, फरवरी के अंत में जब कम गन्ना उत्पादन के चलते महाराष्ट्र में चीनी मिलें बंद होने लगीं, उसी दौरान 13 फरवरी, 2026 को सरकार ने पांच लाख टन अतिरिक्त चीनी निर्यात की अनुमति दे दी और निर्यात कोटा बढ़ाकर 20 लाख टन कर दिया।

जाहिर सी बात है कि जब बेहतर उत्पादन के अनुमान ही नीतिगत फैसलों का आधार थे, तो गन्ने के रस और बी-हैवी मोलेसेज से एथेनॉल का उत्पादन भी जारी रहा। हालांकि चीनी की बेहतर कीमतों का फायदा मिलने के चलते कई चीनी मिलें एथेनॉल उत्पादन को लेकर सुस्त रहीं। यही वजह है कि 34 लाख टन के शुरुआती अनुमान के मुकाबले करीब 30 लाख टन चीनी का ही उपयोग एथेनॉल के लिए हुआ।

अब बात वास्तविक उत्पादन की। 315 लाख टन चीनी उत्पादन के अनुमान के मुकाबले वास्तविक उत्पादन 279 लाख टन पर अटक गया। पूरे आंकड़ों को इस तरह समझा जा सकता है। मसलन, चीनी उत्पादन 279 लाख टन रहा और पिछले साल का बकाया स्टॉक 50 लाख टन था, लेकिन इसमें उपयोग के लायक केवल 48 लाख टन चीनी ही थी। यानी पूरे सीजन के लिए कुल 327 लाख टन चीनी उपलब्ध थी।

इसमें से आठ लाख टन चीनी निर्यात हो गई। 20 लाख टन के निर्यात कोटे के बावजूद वास्तविक निर्यात कम रहने की वजह वैश्विक बाजार में कीमतों का अधिक फायदेमंद नहीं होना था। सोचिए, अगर पूरा 20 लाख टन चीनी निर्यात कोटा इस्तेमाल हो जाता तो स्थिति क्या होती।

सरकार ने 13 मई को चीनी निर्यात पर रोक लगाई। यानी उत्पादन में अनुमान के मुकाबले भारी गिरावट साफ होने के करीब एक माह बाद निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया। यह घटनाक्रम साबित करता है कि खाद्य मंत्रालय के पास उत्पादन के आंकड़ों की निगरानी का कोई पुख्ता और भरोसेमंद तंत्र नहीं था।

रिकॉर्ड निचले स्तर पर चीनी स्टॉक

अब 327 लाख टन में से आठ लाख टन निर्यात के बाद 319 लाख टन चीनी बची। घरेलू खपत करीब 285 लाख टन है। यानी चालू सीजन के अंत में बकाया स्टॉक करीब 34 लाख टन रह जाएगा, जो पिछले कई दशकों का सबसे निचला स्तर है। उद्योग और व्यापार, दोनों को इस बात का अंदाजा था कि चीनी का स्टॉक रिकॉर्ड स्तर तक नीचे जाने वाला है। उद्योग सूत्रों का अनुमान था कि जून के बाद कीमतों में तेजी आएगी। मई-जून में जो एक्स-मिल कीमतें 3,900 रुपये से 4,200 रुपये प्रति क्विंटल के बीच थीं, उनमें जुलाई से उफान आना शुरू हो गया। नतीजा सामने है कि एक्स-मिल दाम 5,700 रुपये प्रति क्विंटल को पार कर गए हैं।

रॉ शुगर आयात से कितनी राहत?

इस बीच खाद्य मंत्रालय सक्रिय हुआ। चीनी पर स्टॉक लिमिट लगाई गई और अब 20 अगस्त को 10 लाख टन रॉ शुगर के शुल्क-मुक्त आयात का फैसला लिया गया। लेकिन इसके साथ भी कई व्यावहारिक चुनौतियां हैं।

कांडला में जो रिफाइनरी है, वह मुख्य रूप से निर्यात के लिए है। उसे घरेलू बाजार में चीनी बेचने की अनुमति देनी पड़ेगी। वहीं, चीनी मिलों द्वारा रिफाइनरी चलाना भी बहुत व्यवहारिक विकल्प नहीं दिखता। इस आयात का फायदा तभी मिलेगा जब आयातक हाई-सी पर चीनी खरीदें। अन्यथा ब्राजील से चीनी आने में लगने वाले ट्रांजिट टाइम को देखते हुए यह आयात त्योहारी सीजन के दौरान बाजार तक पहुंचना मुश्किल है। इसलिए खुदरा कीमतों के नए रिकॉर्ड बनने की संभावना काफी मजबूत है।

गन्ना उत्पादन में गिरावट

लेकिन इस संकट की जड़ गन्ना उत्पादन में गिरावट है और सरकार इस सच को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिखती। महाराष्ट्र और कर्नाटक में इस साल बेहतर चीनी उत्पादन का अनुमान था, लेकिन सितंबर-अक्तूबर, 2025 में हुई भारी बारिश के चलते करीब एक माह तक गन्ने की फसल में पानी खड़ा रहा। फसल को पर्याप्त धूप नहीं मिली और प्रकाश संश्लेषण प्रभावित होने से उत्पादन पर बड़ा असर पड़ा।

पिछले साल की तरह इस साल भी जनवरी में फसल में फ्लावरिंग होने लगी, जिससे सुक्रोज कंटेंट में कमी आ गई। जब महाराष्ट्र की चीनी मिलें तेजी से बंद होने लगीं और सरकारी आंकड़ों के आधार पर अनुमानित गन्ना उत्पादन का 60 फीसदी भी मिलों तक पेराई के लिए नहीं पहुंचा, तब भी सरकार ने स्थिति की गंभीरता को नहीं समझा।

किसानों को उन्नत किस्म का इंतजार

जहां तक उत्तर प्रदेश की बात है, वहां करीब एक दशक तक बंपर उत्पादन देने वाली सीओ 0238 किस्म लगातार रोग की चपेट में रही है। इसके बावजूद पिछले पांच-छह साल में सरकार किसानों को इसका कोई कामयाब विकल्प नहीं दे पाई। न ही कोई इस तकनीकी और अनुसंधान संबंधी नाकामी की जिम्मेदारी लेने को तैयार है।

इसका सीधा खामियाजा किसानों ने कमजोर उत्पादन और आर्थिक नुकसान के रूप में भुगता। नतीजतन, उत्तर प्रदेश में गन्ने के क्षेत्रफल में गिरावट आई और किसानों ने दूसरी फसलों की ओर रुख किया, जिनमें मक्का और पॉपलर प्लांटेशन प्रमुख हैं।

साथ ही, चालू सीजन में उत्तर प्रदेश में दो साल बाद गन्ने का दाम बढ़ाया गया, जबकि इस दौरान किसानों की लागत लगातार बढ़ती रही। इसका भी असर गन्ने से किसानों के मोहभंग के रूप में सामने आया। ये सारी वजहें सरकार और नीति-निर्धारकों से छिपी नहीं हैं।

एक दशक बाद चीनी आयात 

यही वजह है कि खाद्य तेलों, दालों और कपास में आयात निर्भरता बढ़ने के बाद अब एक दशक बाद देश को चीनी का आयात करना पड़ रहा है। यह आयात भी मौजूदा घरेलू कीमतों के आसपास ही पड़ेगा, जबकि रिफाइंड चीनी का आयात इससे भी महंगा पड़ता। शायद यही वजह है कि सरकार ने रॉ शुगर के आयात का विकल्प चुना है।

सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्यों में शामिल महाराष्ट्र में भी उत्पादन में बढ़ोतरी अनुमान से काफी कम रही। चालू चीनी वर्ष 2025-26 में उत्तर प्रदेश में चीनी उत्पादन घटकर 89.70 लाख टन रह गया, जो पिछले एक दशक का सबसे निचला स्तर है। चालू सीजन में उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों में लगभग 73 लाख टन कम गन्ने की पेराई हुई, जबकि महाराष्ट्र का कुल चीनी उत्पादन 99.20 लाख टन रहा।

आगे अल नीनो का खतरा

वहीं, अगर अल नीनो के असर के चलते मानसून कमजोर रहता है तो आगामी सीजन 2026-27 में भी चीनी उत्पादन को झटका लग सकता है। उद्योग के जानकारों का कहना है कि गन्ने के बुवाई क्षेत्र, फसल की स्थिति और मानसून को देखते हुए अगले साल देश में चीनी का सकल उत्पादन करीब 310 लाख टन रह सकता है। इसमें से करीब 25 लाख टन चीनी का एथेनॉल के लिए डायवर्जन होने पर शुद्ध चीनी उत्पादन करीब 285 लाख टन रह सकता है।

हालांकि मौजूदा परिस्थितियों में अगले सीजन में एथेनॉल के लिए चीनी के डायवर्जन की संभावना अब लगभग समाप्त हो गई है।

सवाल सिर्फ यह नहीं है कि चीनी की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक क्यों पहुंचीं। बड़ा सवाल यह है कि उत्पादन, स्टॉक और गन्ने की फसल से जुड़े स्पष्ट संकेतों के बावजूद नीति-निर्माता समय रहते क्यों नहीं चेते। अगर गन्ना अनुसंधान की कमजोरियों को दूर नहीं किया गया और उत्पादन के वास्तविक आंकड़ों की समय पर निगरानी के लिए भरोसेमंद तंत्र नहीं बनाया गया, तो यह संकट केवल एक साल की समस्या बनकर नहीं रहेगा।

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