व्यापार समझौतों पर अनिश्चितता के बीच अमेरिका ने भारत सहित 16 देशों के खिलाफ धारा 301 के तहत जांच शुरू की

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) ने भारत सहित 16 देशों की व्यापार और औद्योगिक नीतियों की जांच के लिए 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत नई जांच शुरू की है। इस जांच में सब्सिडी, बाजार तक पहुंच में बाधाएं और औद्योगिक क्षेत्र में अत्यधिक उत्पादन क्षमता जैसे मुद्दों की पड़ताल की जाएगी। यह कदम अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले के बाद उठाया गया है, जिसमें ट्रंप प्रशासन की रेसिप्रोकल टैरिफ नीति को निरस्त कर दिया गया था।

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) ने भारत सहित 16 देशों की नीतियों को निशाना बनाते हुए धारा 301 के तहत जांच शुरू की है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में वाशिंगटन की रेसिप्रोकल टैरिफ रणनीति को अवैध ठहरा दिया। यूएसटीआर की जांच के दायरे में शामिल देशों में भारत, चीन, यूरोपीय यूनियन, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, इंडोनेशिया, मलेशिया, कंबोडिया, थाईलैंड, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, ताइवान, बांग्लादेश, मेक्सिको और जापान शामिल हैं। इस्पात, एल्युमिनियम, ऑटोमोबाइल, बैटरियां, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन, मशीनरी, सेमीकंडक्र और सौर मॉड्यूल जैसे क्षेत्रों को जांच के दायरे में रखा गया है।

भारत पर संभावित प्रभाव

अमेरिकी जांच में भारत के कई ऐसे क्षेत्रों की पहचान की गई है जहां अतिरिक्त उत्पादन क्षमता या निर्यात सरप्लस की संभावना बताई गई है। इनमें सौर मॉड्यूल, पेट्रोकेमिकल, इस्पात, टेक्सटाइल, स्वास्थ्य संबंधी वस्तुएं, निर्माण सामग्री और वाहन उद्योग से जुड़े उत्पाद शामिल हैं। 

अमेरिकी सूचना के अनुसार भारत में सौर मॉड्यूल निर्माण क्षमता पहले ही घरेलू मांग से लगभग तीन गुना अधिक हो चुकी है, जिससे निर्यात आधारित उत्पादन सरप्लस की संभावना बनती है। इसी तरह पेट्रोकेमिकल और इस्पात क्षेत्रों में तेजी से बढ़ती उत्पादन क्षमता को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है।

सब्सिडी और बाजार एक्सेस में बाधाओं की जांच

1974 के अमेरिकी व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत अमेरिकी सरकार यह जांच कर सकती है कि क्या किसी देश की व्यापार नीतियां अनुचित या भेदभावपूर्ण हैं और क्या उनसे अमेरिकी बिजनेस को नुकसान पहुंच रहा है। जांच में यह परखा जाएगा कि औद्योगिक सब्सिडी, सरकार समर्थित मैन्युफैक्चरिंग विस्तार, सरकारी स्वामित्व वाले उद्यमों की गतिविधियां, मार्केट एक्सेस में बाधा, करेंसी संबंधी नीतियां या घरेलू मांग जैसी नीतियों ने मैन्युफैक्चरिंग में अतिरिक्त क्षमता पैदा की है या नहीं, जिससे अमेरिकी व्यापार पर बोझ पड़ता है। यदि ऐसे आचरण की पुष्टि होती है तो वाशिंगटन अतिरिक्त आयात शुल्क, मात्रात्मक प्रतिबंध या अन्य व्यापारिक बाधा जैसे कदम उठा सकता है।

यह जांच एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेगी। लिखित प्रस्तुतियों के लिए सार्वजनिक अभिलेख (पब्लिक डॉकेट) सत्र 17 मार्च 2026 से खोले जाएंगे, जिससे कंपनियों, व्यापार संगठनों और सरकारों को अपनी टिप्पणियां प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा। लिखित प्रस्तुतियां और सुनवाई में भाग लेने के अनुरोध 15 अप्रैल तक दाखिल करने होंगे। सार्वजनिक सुनवाई 5 मई से 8 मई के बीच वाशिंगटन स्थित अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग में आयोजित की जाएगी। सुनवाई समाप्त होने के सात दिनों के भीतर प्रत्युत्तर प्रस्तुतियां दाखिल करनी होंगी। संबंधित सरकारों के साथ परामर्श के बाद अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय यह तय करेगा कि जांच के दायरे में आए इन व्यवहारों पर प्रतिशोधात्मक कार्रवाई की आवश्यकता है या नहीं।

कोर्ट के झटके के बाद नया कदम

सेक्शन 301 के तहत इस जांच की शुरुआत ट्रंप प्रशासन की व्यापार रणनीति को लगे एक बड़े कानूनी झटके के केवल 20 दिन बाद हुई है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी 2026 को प्रशासन की तथाकथित “पारस्परिक शुल्क” नीति के कानूनी आधार को खारिज कर दिया था। इस नीति का उपयोग व्यापार वार्ताओं में साझेदार देशों पर रियायतें देने के लिए दबाव बनाने में किया जा रहा था। हालांकि कोर्ट के फैसले के कुछ ही घंटों के भीतर ट्रंप ने 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 के तहत सभी देशों पर समान रूप से 10 प्रतिशत का शुल्क लागू कर दिया।

हालांकि इस बदलाव ने नई दुविधा पैदा कर दी। पहले की शुल्क व्यवस्था के तहत कई देशों ने वाशिंगटन के साथ व्यापार संबंधी समझौते किए थे। इन समझौतों में अपेक्षाकृत अधिक निर्धारित शुल्क स्तर शामिल थे- यूरोपीय यूनियन, जापान और दक्षिण कोरिया के लिए लगभग 15 प्रतिशत, वियतनाम और ताइवान के लिए लगभग 20 प्रतिशत तथा इंडोनेशिया और थाईलैंड के लिए करीब 19 प्रतिशत।

जब ट्रंप प्रशासन ने सभी देशों पर समान 10 प्रतिशत शुल्क लागू किया तो इन देशों को पहले वार्ता के तहत मिले लाभ समाप्त हो गए। इससे कुछ सरकारों ने अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौतों के महत्व पर पुनर्विचार करना शुरू कर दिया। हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप ने साझेदार देशों को इन व्यवस्थाओं पर दोबारा बातचीत की कोशिश न करने की चेतावनी दी है।

जिन देशों पर अब धारा 301 के तहत जांच हो रही है, उनमें कई ने अप्रैल 2025 के बाद अमेरिका के साथ किसी न किसी रूप में व्यापार समझौता या इसकी रूपरेखा की व्यवस्था कर ली थी। इनमें यूरोपीय यूनियन, इंडोनेशिया, जापान, मलेशिया, कंबोडिया, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, ताइवान और बांग्लादेश शामिल हैं। चीन फिलहाल अस्थायी शुल्क व्यवस्था के तहत काम कर रहा है, जबकि सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, थाईलैंड, मेक्सिको और भारत के साथ बातचीत जारी है।

भारत ने 6 फरवरी 2026 को अमेरिका के साथ एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत कई वस्तुओं पर शुल्क घटाने, अगले पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर से अधिक के अमेरिकी उत्पादों की खरीद करने, अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों को प्रभावित करने वाले डिजिटल नियमों को सरल बनाने तथा अमेरिकी निर्यात के लिए कुछ नियामकीय बाधाओं को कम करने पर सहमति व्यक्त की गई थी।

कार्रवाई के लिए प्रमाण आवश्यक

थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के अजय श्रीवास्तव का कहना है कि धारा 301 भले ही अमेरिका का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक उपकरण है, लेकिन यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निरस्त किए गए रेसिप्रोकल टैरिफ की तुलना में धीमी और अधिक कानूनी सीमाओं से बंधी हुई प्रक्रिया है। धारा 301 के तहत जांच के लिए नुकसान के ठोस प्रमाण आवश्यक होते हैं और इन्हें विशिष्ट व्यापारिक नीतियों से जोड़ा जाना जरूरी होता है।

अमेरिका 1962 के ट्रेड एक्सपैंशन एक्ट की धारा 232 के तहत भी शुल्क लगाने पर विचार कर सकता है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाने की अनुमति देती है। इस प्रावधान का उपयोग पहले इस्पात और एल्युमिनियम पर ऊंचे शुल्क लगाने के लिए किया जा चुका है और भविष्य में इसे अन्य क्षेत्रों तक भी बढ़ाया जा सकता है।