चार साल बाद गोवंश में फिर लंपी का कहर, जंगली जानवरों तक पहुंचा प्रकोप; 28 राज्यों के लिए अलर्ट जारी

देश में एक बार फिर गोवंश में लंपी रोग का खतरा बढ़ रहा है। कई राज्यों में संदिग्ध या पुष्ट मामले सामने आ रहे हैं, जबकि बीमारी का प्रकोप जंगली जानवरों तक पहुंचने से भी रोकथाम की चुनौती बढ़ गई है।

प्रतीकात्मक/फाइल फोटो

देश के विभिन्न राज्यों में गोवंश में लंपी स्किन डिजीज (LSD) का प्रकोप पशुपालकों के लिए मुसीबत बनता जा रहा है। यह खतरा अब केवल राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे कुछ राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अधिकांश राज्यों तक पहुंच रहा है। राष्ट्रीय पशु रोग रेफरल विशेषज्ञ प्रणाली (NADRES) के तहत सितंबर 2026 के लिए देश के 28 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लंपी रोग के जोखिम का अलर्ट जारी किया गया है।

लंपी बीमारी गोवंश में 2019 में फैली थी। उसके बाद वर्ष 2022 में बड़े पैमाने पर लंपी के प्रकोप से लाखों पशुओं की मौत हुई थी और पशुपालकों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा था। इसके साथ ही दुग्ध उत्पादन में भी गिरावट आ गई थी। अब चार साल बाद फिर से वैसा ही खतरा मंडरा रहा है। चिंताजनक बात यह है कि केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर इस खतरे को लेकर पर्याप्त तैयारियों और रोकथाम के उपायों में कमी दिख रही है। इस बार लंपी रोग से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग भी कम हो रही है। लेकिन जिस तरह से रोग फैल रहा है उसके चलते पशुपालक किसानों को आर्थिक नुकसान के साथ ही दूध उत्पादन पर भी प्रतिकूल असर पड़ना तय है।

पशुचिकित्सा अनुसंधान से जुड़े एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने रूरल वॉयस को बताया कि लंपी रोग का प्रकोप गोवंश के अलावा ऊंट, घोड़े और खच्चर समेत 13 पशु प्रजातियों तक पहुंच गया है। उक्त विशेषज्ञ का कहना है कि लंपी वायरस वाइल्ड लाइफ में भी पहुंच गया है, जिसके चलते बीमारी की रोकथाम की चुनौतियां बढ़ गई हैं। 2022 में लंपी महामारी के बाद सरकार ने वन हेल्थ पर काफी जोर दिया था, लेकिन टीकाकरण अभियान और लंपी रोग की रोकथाम के उपायों में कुछ ढील रही, जिससे यह बीमारी फिर से बड़े स्तर पर फैल रही है।

उत्तराखंड के छह जिलों में लंपी रोग के 180 संदिग्ध मामले सामने आने के बाद राज्य के सभी जिलों में निगरानी बढ़ा दी गई है और प्रभावित पशुओं के नमूने जांच के लिए ICAR-भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI), बरेली भेजे गए हैं। लंपी रोग के खतरे को देखते हुए उत्तराखंड सरकार ने पशुओं की अंतरराज्यीय और अंतर-जिला आवाजाही पर अस्थायी रोक लगा दी है। राज्य में सबसे अधिक संदिग्ध मामले पौड़ी में बताए गए हैं, जबकि हरिद्वार, नैनीताल, ऊधमसिंह नगर और रुद्रप्रयाग से भी मामले सामने आए हैं। प्रदेश भर में गोवंशीय पशुओं का टीकाकरण अभियान तेज कर दिया गया है।

उत्तर प्रदेश के मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर, शामली और सहारनपुर सहित कई जिलों के कई गांवों में लंपी रोग से पशुओं के बीमार होने की खबरें आ रही हैं। पशुओं में बुखार, त्वचा पर गांठें और कमजोरी जैसे लक्षण बताए गए हैं। बीमारी के खतरे को देखते हुए पशुपालन विभाग ने कई जगह साप्ताहिक पशु पैठ भी बंद करा दी हैं। पशु चिकित्सकों और फील्ड कर्मचारियों को गांव-गांव जाकर निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।

हरियाणा के कुरुक्षेत्र, पंचकूला, रेवाड़ी और यमुनानगर में लंपी रोग के कुल 1,356 संदिग्ध मामले सामने आए हैं। बीमारी की पुष्टि के लिए भिवानी, हिसार, झज्जर, कुरुक्षेत्र, पंचकूला, रेवाड़ी, रोहतक और सिरसा जिलों से सैंपल जांच के लिए लाला लाजपतराय पशुचिकित्सा एवं पशुविज्ञान विश्वविद्यालय (LUVAS), हिसार भेजे गए हैं।

हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर और सोलन जिलों में दर्जनों पशुओं के संक्रमित होने और कई पशुओं की मौत के बाद पशुपालन विभाग ने प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी और टीकाकरण तेज कर दिया है। पंजाब और हरियाणा से लगते सीमावर्ती इलाकों में पशुओं की आवाजाही को देखते हुए लंपी रोग की रोकथाम पर जोर दिया जा रहा है।

219 जिलों में लंपी रोग का खतरा

ICAR-NIVEDI के राष्ट्रीय पशु रोग रेफरल विशेषज्ञ प्रणाली (NADRES) के सितंबर 2026 के वेट-अलर्ट में लंपी स्किन डिजीज के जोखिम वाले क्षेत्रों में केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, सिक्किम, ओडिशा, बिहार, असम, झारखंड, कर्नाटक, गुजरात, छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, हरियाणा, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, आंध्र प्रदेश, पंजाब, लक्षद्वीप, पुडुचेरी, अरुणाचल प्रदेश, दिल्ली, गोवा और तेलंगाना शामिल हैं।

NADRES ने सितंबर के लिए 219 जोखिम वाले जिलों की पहचान की है और अपने मॉडल की LSD जोखिम पूर्वानुमान सटीकता 98.9 प्रतिशत बताई है। यह अलर्ट रोग के संभावित प्रसार के जोखिम का पूर्वानुमान है।

रोग के लक्षण और बचाव

लंपी त्वचा रोग गोवंश में होने वाली एक संक्रामक बीमारी है, जो मुख्य रूप से मक्खियों, मच्छरों और किलनी के काटने से फैलती है। पशुओं में तेज बुखार, त्वचा पर कठोर गांठें, दूध उत्पादन में गिरावट तथा आंख व नाक से स्राव इसके प्रमुख लक्षण हैं। बचाव के लिए समय पर टीकाकरण कराने और बाड़े में कीटनाशकों का छिड़काव करने की सलाह दी गई है। पशुओं में लंपी स्किन डिजीज (LSD) के लक्षण दिखाई देने पर तत्काल संबंधित पशु चिकित्सों को सूचना दें और संक्रमित पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग रखें।

प्राथमिक लक्षण

  • बुखार: 40–41°C तक तापमान, जो 4–14 दिनों तक रह सकता है।

  • त्वचा पर गांठें: सिर, गर्दन, पैरों, थन और जननांगों के आसपास 2–5 सेंटीमीटर व्यास की गांठें उभरना।

  • सूजन और एडिमा: पैरों, छाती के निचले हिस्से (ब्रिस्केट) और जननांगों में सूजन।

द्वितीयक लक्षण

  • नाक और आंखों से स्राव तथा अत्यधिक लार आना।

  • लिम्फ नोड्स में सूजन: विशेष रूप से सबस्कैपुलर और प्रीक्रूरल लिम्फ नोड्स का बढ़ना।

  • दूध उत्पादन में कमी: दूध देने वाली गायों में दूध की मात्रा कम हो जाना।

बचाव के उपाय

टीकाकरण

  • लाइव-अटेन्यूएटेड वैक्सीन (LSDV के Neethling strain पर आधारित)।
  • Sheeppox/Goatpox virus आधारित वैक्सीन भी कई क्षेत्रों में इस्तेमाल की जाती हैं।
  • ऐसी वैक्सीन का इस्तेमाल विशेष रूप से उन क्षेत्रों में किया जाता है, जहां बीमारी स्थानिक (endemic) है।

रोग फैलाने वाले कीटों पर नियंत्रण

  • मच्छरों, मक्खियों और किलनी जैसे काटने वाले कीटों पर नियंत्रण।
  • कीटनाशकों और कीट-प्रतिरोधी दवाओं (repellents) का इस्तेमाल।
  • पशु परिसर और आसपास के वातावरण की उचित साफ-सफाई एवं प्रबंधन।

क्वारंटीन और पशुओं की आवाजाही पर नियंत्रण

  • संक्रमित पशुओं की आवाजाही प्रतिबंधित करना।
  • बीमारी के संपर्क में आए पशुओं को अलग रखना और क्वारंटीन करना।
  • प्रभावित क्षेत्रों में पशुओं की आवाजाही पर आवश्यक प्रतिबंध लगाना।

जैव-सुरक्षा उपाय

  • पशु परिसर की उचित साफ-सफाई और कीटाणुशोधन।
  • संक्रमित पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना।
  • पशु बाड़ों और परिसर में नियमित disinfection protocols का पालन करना।

निगरानी और समय पर पहचान

  • संदिग्ध मामलों की तत्काल सूचना देना और पशुओं की सक्रिय निगरानी करना।
  • बीमारी के प्रसार को सीमित करने के लिए जल्दी पहचान और तत्काल हस्तक्षेप बेहद महत्वपूर्ण है।