छह साल में भारत का चारा क्षेत्र 23% घटा, इसलिए ICAR का फसल अवशेषों के बेहतर उपयोग का सुझाव

भारत का पशुधन क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है, जबकि चारा उत्पादन के लिए भूमि लगातार घट रही है। ICAR के आकलन के अनुसार, 2018 से 2024 के बीच चारा क्षेत्र 23% घटकर 63.9 लाख हेक्टेयर रह गया। दूध, मांस, अंडा और मछली उत्पादन बढ़ने से चारा संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है, जो भविष्य में पशुधन उत्पादकता के लिए चिंताजनक है।

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भारत की पशुधन अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन पशु उत्पादों की मांग लगातार बढ़ने के बावजूद चारा उत्पादन के तहत आने वाला क्षेत्र तेजी से घटा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के ‘भारत में पशुधन उत्पादन बढ़ाने के लिए फीड एवं फोडर संसाधनों का व्यापक आकलन’ (Comprehensive Assessment of Feed and Fodder Resources for Increased Livestock Production in India) के अनुसार, चारा उत्पादन का क्षेत्र 2018 में 83 लाख हेक्टेयर से घटकर 2024 में 63.9 लाख हेक्टेयर रह गया। यानी छह वर्षों में इसमें करीब 23% की कमी आई है। अब देश के सकल फसली क्षेत्र का 5% से भी कम हिस्सा चारा उत्पादन के लिए इस्तेमाल हो रहा है।

चारा क्षेत्र में यह गिरावट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी अवधि में भारत का पशुधन क्षेत्र तेजी से बढ़ा है। 2013-14 से 2023-24 के बीच पशुधन क्षेत्र की सालाना वृद्धि दर (CAGR) 12.77% रही, जो फसल क्षेत्र की वृद्धि से काफी अधिक है। 2023-24 में कृषि सकल मूल्य वर्धन (GVA) में पशुधन क्षेत्र की हिस्सेदारी 31% से अधिक और राष्ट्रीय GVA में करीब 5.5% रही।

चारा आधार घटने के बावजूद बढ़ा दूध उत्पादन

पशुधन क्षेत्र के विस्तार का पैमाना उत्पादन के आंकड़ों से स्पष्ट होता है। आईसीएआर के आकलन के मुताबिक भारत में दूध उत्पादन 2014-15 के 14.63 करोड़ टन से बढ़कर 2024-25 में 24.79 करोड़ टन हो गया। इसी अवधि में अंडा उत्पादन लगभग दोगुना होकर 78.48 अरब से बढ़कर 149.1 अरब अंडे हो गया, जबकि मांस उत्पादन 66.9 लाख टन से बढ़कर 105 लाख टन हो गया। मछली उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

इससे पोषण की दृष्टि से पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण पशु आहार की जरूरत लगातार बढ़ रही है। ICAR के आकलन के अनुसार, डेयरी गायों और भैंसों, कॉमर्शियल पोल्ट्री तथा मछली पालन के लिए मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों स्तरों पर फीड संसाधनों की मांग तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। समस्या यह है कि चारा उत्पादन का विस्तार लगातार कठिन होता जा रहा है, क्योंकि कृषि भूमि का इस्तेमाल खाद्यान्न, व्यावसायिक फसलों और अन्य जरूरतों के लिए भी करना पड़ता है।

रिपोर्ट में भूमि और पानी के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा को हरे चारे की उपलब्धता बढ़ाने में प्रमुख बाधा बताया गया है। चारा क्षेत्र के साथ वृक्ष आवरण और सामुदायिक संसाधनों में कमी आई है। वहीं, अधिक चराई के दबाव और अपर्याप्त प्रबंधन के कारण प्राकृतिक चरागाहों और घास वाली भूमि की उत्पादकता भी घटी है।

चारा उत्पादकता में बढ़ोतरी से मिली कुछ राहत

चारा क्षेत्र में कमी का असर चारा उत्पादन में उसी अनुपात में नहीं दिखा है। आकलन के अनुसार, अधिक उत्पादन देने वाली और एक से अधिक बार कटाई वाली चारा किस्मों की शुरुआत तथा बेहतर कृषि प्रबंधन से चारा उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इससे क्षेत्रफल में आई कमी की कुछ हद तक भरपाई हो सकी है। हालांकि, ICAR का मानना है कि केवल उत्पादकता बढ़ने पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं हो सकता, क्योंकि पशुधन उत्पादन लगातार बढ़ रहा है।

डेयरी उत्पादन के लिए हरे चारे को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि यह आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराता है, अपेक्षाकृत किफायती है और जुगाली करने वाले पशुओं के स्वास्थ्य तथा उनकी उत्पादक आयु को बेहतर बनाए रखने में मदद करता है। लेकिन हरे चारे की उपलब्धता मौसमी है और भूमि तथा पानी के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा से यह और सीमित हो रही है।

डेयरी संरचना में बदलाव से बढ़ रहा चारे का दबाव

भारत की पशुधन आबादी की संरचना भी बदल रही है, जिसका सीधा असर चारे की मांग पर पड़ रहा है। 2007 से 2019 के बीच संकर गायों की संख्या 82.1% बढ़ी, जबकि देसी नस्ल की गायों की संख्या में 10% वृद्धि हुई। इसके विपरीत बैलों की संख्या में तेज गिरावट आई। भैंसों में भी ऐसा ही रुझान देखा गया। इस दौरान भैंसों की संख्या 17.3% बढ़ी, जबकि भैंसे की संख्या 52.6% घट गई।

ICAR के अनुसार ये बदलाव पारंपरिक रूप से कृषि कार्यों और भार ढोने के लिए रखे जाने वाले पशुधन से दूध केंद्रित डेयरी की ओर बदलाव को दर्शाते हैं। यह बदलाव देश की कुल चारा मांग को सीधे प्रभावित करता है, क्योंकि अधिक उत्पादन देने वाले पशुओं को उच्च गुणवत्ता और संतुलित पोषण वाले आहार की आवश्यकता होती है।

कॉमर्शियल पोल्ट्री में यह बदलाव और अधिक स्पष्ट है। 2012 और 2019 की पशुधन गणनाओं के बीच कुल पोल्ट्री संख्या में 31.2% की वृद्धि हुई, जबकि कॉमर्शियल पोल्ट्री की संख्या करीब 50% बढ़ी। रिपोर्ट के अनुसार, कॉमर्शियल पोल्ट्री वैज्ञानिक तरीके से तैयार किए गए पोषक तत्वों से भरपूर कंपाउंड फीड पर काफी हद तक निर्भर होते हैं।

कम भूमि से अधिक उत्पादन की चुनौती

उभरती तस्वीर केवल चारे की कमी की नहीं है। यह ऐसे पशुधन क्षेत्र में बदलाव की तस्वीर है, जिसे लगातार सीमित होते चारे और भूमि संसाधनों से अधिक दूध, मांस और अंडे का उत्पादन करना होगा। ICAR की रिपोर्ट के अनुसार, भारत को चारा संसाधनों की उपलब्धता के साथ-साथ उनके उपयोग की दक्षता में भी सुधार करना होगा। इसके लिए एग्रो-इंडस्ट्रियल सह-उत्पादों के जरिए चारे के आधार का विस्तार, फसल अवशेषों के पोषण में सुधार, सूखा-रोधी चारा किस्मों को बढ़ावा और हरे चारे की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना जरूरी है।

सामुदायिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन को भी प्राथमिकता देने की जरूरत है, खासकर उन पशुपालन प्रणालियों में जो चराई पर निर्भर हैं। रिपोर्ट में क्षेत्र विशिष्ट पशु आहार रणनीतियां अपनाने की भी सिफारिश की गई है, क्योंकि देश के अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में चारा संसाधन, पशुपालन प्रणालियां और पशुओं को खिलाने की पद्धतियां काफी अलग हैं।

बड़ी नीतिगत चुनौती कृषि भूमि की प्रतिस्पर्धी जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की है। खाद्यान्न या व्यावसायिक फसलों की कीमत पर चारा क्षेत्र बढ़ाना मुश्किल है, जबकि चारा भूमि और सामुदायिक चरागाह संसाधनों में लगातार कमी पशुधन उत्पादकता को प्रभावित कर सकती है।

ICAR ने इसलिए अधिक उत्पादकता वाले चारे, फसल अवशेषों का बेहतर उपयोग, वैकल्पिक फीड संसाधनों और अधिक दक्ष पशुधन उत्पादन पर आधारित व्यापक रणनीति की जरूरत पर जोर दिया है। पशु आधारित खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ने की संभावना को देखते हुए, सीमित चारा आधार से अधिक पशुधन उत्पादन हासिल करने की क्षमता भारत की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए आने वाले वर्षों में और अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।