डीएपी महंगा: अंतरराष्ट्रीय बाजार में 730 डॉलर पर पहुंचे दाम, खरीफ से पहले बढ़ी चिंता

खेती में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख उर्वरक डाई अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) की वैश्विक कीमतों में दो सप्ताह में 50 डॉलर प्रति टन से अधिक की तेजी आई है। ब्राजील की बड़ी खरीद और चीन के निर्यात प्रतिबंध से बाजार में दबाव बढ़ा है। भारत में किसानों के लिए डीएपी का दाम 1350 रुपये प्रति बैग पर स्थिर है, लेकिन आयात लागत बढ़ने से सरकार पर सब्सिडी बोझ बढ़ सकता है। उद्योग अप्रैल 2026 से लागू होने वाली एनबीएस दरों के ऐलान का इंतजार कर रहा है।

यूरिया के बाद देश में दूसरे सबसे अधिक खपत वाले उर्वरक डाई अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) की वैश्विक कीमतों में पिछले दो सप्ताह में 50 डॉलर प्रति टन से अधिक की तेजी आई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीएपी की कीमतें 720 से 730 डॉलर प्रति टन के बीच चल रही हैं। वहीं, ब्राजील द्वारा 740 डॉलर प्रति टन पर किए गए सौदों के चलते कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है। देश में सालाना करीब 100 लाख टन डीएपी की खपत होती है और उसका अधिकांश हिस्सा आयात होता है। आयात में करीब 40 फीसदी हिस्सेदारी कच्चे माल की है, जिसके जरिये यहां उत्पादन होता है, जबकि लगभग 60 फीसदी डीएपी तैयार उर्वरक के रूप में आता है।

उर्वरक उद्योग सूत्रों के मुताबिक, करीब 15 दिन पहले डीएपी की वैश्विक कीमतें 665 से 670 डॉलर प्रति टन थीं। लेकिन अब भारत की संभावित मांग के चलते कीमतों में तेजी आ रही है। वहीं ब्राजील बड़ी मात्रा में डीएपी की खरीद कर रहा है। उसने सऊदी अरब की कंपनी मादेन से 740 डॉलर प्रति टन तक के सौदे किए हैं। इसके अलावा, एक बड़े डीएपी निर्यातक चीन द्वारा निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का भी कीमतों पर असर पड़ रहा है।

भारत ने डीएपी की दीर्घकालिक आपूर्ति के लिए रूस और सऊदी अरब की कंपनी मादेन के साथ समझौता किया है। लेकिन फिलहाल मादेन भारत की बजाय ब्राजील को प्राथमिकता दे रहा है। रूस के साथ छह लाख टन डीएपी की आपूर्ति का दीर्घकालिक समझौता किया गया है। हालांकि, उद्योग सूत्रों का कहना है कि रूस ने फरवरी में आपूर्ति नहीं की और अब वह अप्रैल के मध्य में आपूर्ति करना चाहता है। खरीफ सीजन के लिए अप्रैल में आयात का मतलब है कि समय पर उर्वरक उपलब्ध कराने में मुश्किलें आ सकती हैं।

इस स्थिति के चलते आयातक असमंजस में हैं। इसकी एक बड़ी वजह सरकार द्वारा विनियंत्रित उर्वरकों को न्यूट्रिएंट आधारित सब्सिडी (एनबीएस) योजना के तहत दी जाने वाली सब्सिडी की नीति भी है। इसके तहत सरकार नाइट्रोजन (एन), फॉस्फेट (पी), पोटाश (के) और सल्फर (एस) न्यूट्रिएंट के लिए प्रति किलो सब्सिडी की दर तय करती है। आयात लागत, उत्पादन लागत और सरकार द्वारा तय सब्सिडी दरों के आधार पर कंपनियों को विनियंत्रित उर्वरकों का अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) तय करने का अधिकार है।

सरकार रबी और खरीफ सीजन के लिए एनबीएस की दरें तय करती है। इन दरों के आधार पर कंपनियां यह आकलन करती हैं कि आयात या उत्पादन करना कितना व्यावहारिक होगा और एमआरपी क्या तय की जानी चाहिए। सरकार ने यूरिया के अलावा अन्य उर्वरकों को मूल्य नियंत्रण से मुक्त रखा है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि डीएपी जैसे विनियंत्रित उर्वरकों की अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) पर सरकार का परोक्ष नियंत्रण है। डीएपी की एमआरपी पिछले तीन वर्षों से 1350 रुपये प्रति बैग (50 किलो) पर स्थिर है। इस कीमत और आयात व उत्पादन लागत के बीच के अंतर की भरपाई सरकार सब्सिडी के माध्यम से करती है। सब्सिडी का बड़ा हिस्सा एनबीएस योजना के तहत दिया जाता है, जबकि अतिरिक्त घाटे की भरपाई विशेष प्रोत्साहन (स्पेशल इंसेंटिव) के रूप में की जाती है।

फिलहाल सरकार ने उद्योग को आश्वस्त किया है कि वह आयात लागत और एमआरपी के बीच के अंतर की भरपाई करेगी। इसके बावजूद अधिकांश आयातक अप्रैल 2026 से खरीफ सीजन के लिए लागू होने वाली एनबीएस सब्सिडी दरों का इंतजार कर रहे हैं।

उद्योग सूत्रों ने रूरल वॉयस को बताया कि सब्सिडी की मौजूदा नीति समय पर उर्वरक उपलब्धता में बाधा बनती है। बेहतर होगा कि सरकार सब्सिडी की दीर्घकालिक नीति लाए, जैसा कि यूरिया के मामले में है। यूरिया एक नियंत्रित उर्वरक है और उसकी कीमत, आयात तथा वितरण समेत सभी स्तरों पर सरकार का नियंत्रण है। कंपनियों को एमआरपी और लागत के बीच का पूरा अंतर सब्सिडी के रूप में भुगतान किया जाता है।

फिलहाल वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी का डीएपी की किसानों के लिए तय कीमत पर सीधा असर पड़ने की संभावना कम है। हालांकि डीएपी के अलावा अन्य कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की कीमतों में पिछले कुछ वर्षों में बढ़ोतरी हुई है। डीएपी की उपलब्धता में कमी के चलते अन्य कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की खपत भी बढ़ी है।

सरकार के लिए चुनौती यह भी है कि उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के लिए यूरिया की खपत कम की जाए। लेकिन पिछले वर्ष के आंकड़ों के मुताबिक एन, पी और के न्यूट्रिएंट के उपयोग का अनुपात काफी बिगड़ चुका है और यूरिया की खपत आदर्श अनुपात से दोगुने से भी अधिक है।