उर्वरक खपत घटाने पर जोर: देशव्यापी मैपिंग पूरी, किसान आईडी के जरिये डायवर्जन रोकने की तैयारी

भारत सरकार ने उर्वरक खपत घटाने और सब्सिडी वाले उर्वरकों के डायवर्जन पर रोक लगाने के लिए देशव्यापी रणनीति तैयार की है। आईसीएआर द्वारा जिलावार मैपिंग पूरी हो चुकी है, जबकि किसान आईडी के जरिए वितरण प्रणाली को सख्त बनाने की तैयारी है। साथ ही ग्रीन मैन्योर, बायो-फर्टिलाइजर्स और उर्वरक उपयोग में कमी पर जोर दिया जा रहा है, ताकि सब्सिडी बोझ नियंत्रित रहे।

ईरान-अमेरिका युद्ध के चलते देश में उर्वरकों के संभावित संकट से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने कोशिशें तेज कर दी हैं। सरकार उर्वरकों की खपत घटाने और सब्सिडी वाले उर्वरकों, खासकर यूरिया, के डायवर्जन पर अंकुश लगाने की रणनीति पर काम कर रही है।

नेशनल फ्रेमवर्क फॉर सब्सिडाइज्ड फर्टिलाइजर मार्केटिंग के तहत उर्वरक बिक्री की कड़ी निगरानी होगी, वहीं देशभर में वैज्ञानिकों और सरकारी विभागों द्वारा उर्वरकों की खपत में कम से कम 5 फीसदी की कमी लाने का प्रयास किया जाएगा।

इस संबंध में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने देश के सभी जिलों में उर्वरकों की खपत और जरूरत का खाका तैयार कर लिया है। वहीं कृषि मंत्रालय में संयुक्त सचिव ने सभी राज्य सरकारों के संबंधित विभागों को पत्र लिखकर इस पूरी प्रक्रिया में सहयोग करने को कहा है।

सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों ने रूरल वॉयस को बताया कि इस पूरी कवायद का मकसद किसानों को उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से हतोत्साहित करना है। इसलिए किसानों को खरीफ की विभिन्न फसलों में उर्वरकों के संतुलित उपयोग की सलाह दी जाएगी। इसके लिए आईसीएआर और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिक सीधे किसानों से संपर्क कर उन्हें जागरूक करेंगे।

एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने रूरल वॉयस  बताया कि इस बार किसानों को धान में डाई अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) का उपयोग न करने की सलाह दी जा रही है, क्योंकि फसल को इसकी आवश्यकता नहीं होती। इसी तरह यूरिया के उपयोग में कमी करने पर भी जोर दिया जाएगा। यह फ्रेमवर्क जल्द ही जारी किया जाएगा।

सूत्रों का कहना है कि उर्वरक वितरण के लिए किसान आईडी का उपयोग लागू किया जा सकता है और इसे खरीफ सीजन से देशभर में लागू करने की तैयारी है। साथ ही राज्यों से कहा गया है कि वे किसानों को ग्रीन मैन्योर (हरित खाद) के उपयोग को बढ़ाने के लिए प्रेरित करें। इसके तहत अप्रैल से जून के बीच खरीफ की बुवाई से पहले और खरीफ की फसल कटने के बाद गेहूं की बुवाई के बीच की अवधि में ढैंचा (Sesbania bispinosa) बोने की सलाह दी जा रही है। लगभग डेढ़ महीने बाद इसकी जुताई कर मिट्टी में मिलाने से रासायनिक उर्वरकों की खपत घटेगी और मिट्टी की सेहत में भी सुधार होगा।

कुछ राज्यों ने ढैंचा के बीज की खरीद के लिए बीज कंपनियों से संपर्क भी शुरू कर दिया है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि जिस पैमाने पर सरकार प्रयास कर रही है, उसके लिए फिलहाल पर्याप्त प्रमाणित बीज उपलब्ध नहीं हैं। साथ ही प्रति हेक्टेयर लगभग 3000 रुपये खर्च करने पर केवल 20-22 किलो यूरिया की बचत होने का अनुमान है, जिस पर कुछ विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। 

केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने राज्यों से बॉयो फर्टिलाइजर्स, बॉयो स्टिमुलेंट्स और अन्य विकल्पों को बढ़ावा देने पर भी जोर देने को कहा है। सरकार द्वारा 25 लाख टन यूरिया खरीदने के लिए जारी किए गए टेंडर में पूर्वी तट के लिए 959 डॉलर प्रति टन (सीआईएफ) और पश्चिमी तट के लिए 935 डॉलर प्रति टन (सीआईएफ) की बोलियां प्राप्त हुई हैं।

सूत्रों के अनुसार इन बोलियों की समीक्षा की जा रही है। यदि इन्हें स्वीकार किया जाता है, तो आयातित यूरिया की कीमत करीब 90,000 रुपये प्रति टन तक पहुंच सकती है। ऐसे में 45 किलो के एक यूरिया बैग, जिसकी कीमत 266 रुपये है, सरकार को लगभग 4500 रुपये पड़ेगी, जिससे सब्सिडी पर भारी दबाव पड़ेगा।

खाड़ी क्षेत्र में तनाव के चलते देश में यूरिया उत्पादन अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुआ है, क्योंकि यूरिया उत्पादन के लिए गैस आपूर्ति की समस्या बनी हुई है। उद्योग के अनुमान के अनुसार मार्च और अप्रैल में उत्पादन में करीब 15 लाख टन की कमी आई है।

हालांकि, केंद्र सरकार का दावा है कि फिलहाल देश में सभी प्रमुख उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता है। लेकिन मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों और उर्वरकों के असंतुलित उपयोग को देखते हुए सरकार उर्वरकों की खपत पर अंकुश लगाने की कोशिश कर रही है।

24 अप्रैल को जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार,1 अप्रैल से 23 अप्रैल 2026 की अवधि के लिए देश में यूरिया की उपलब्धता 69.33 लाख टन, डीएपी की 22.78 लाख टन, एमओपी की 8.32 लाख टन, एनपीके की 52.75 लाख टन और एसएसपी की 25.60 लाख टन है। सरकार का दावा है कि यह आगामी खरीफ सीजन के लिए मजबूत शुरुआती स्थिति का संकेत है।

केंद्र सरकार द्वारा खरीफ 2026 के लिए उर्वरकों की आवश्यकता 390.54 लाख आंकी गई हैजिसमें से लगभग 180 लाख (46 प्रतिशत) पहले से ही प्रारंभिक स्टॉक के रूप में उपलब्ध है। देश में उर्वरकों की सालाना खपत लगभग 650 लाख टन है। इसमें यूरिया की खपत करीब 400 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि डीएपी की खपत लगभग 100 लाख टन रहती है। शेष मात्रा अन्य कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की होती है।