यूरोपीय संघ के सख्त हरित नियम से भारत के चावल निर्यात पर बढ़ा खतरा, वैश्विक दबदबा बरकरार रखना चुनौती

भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है, लेकिन यूरोपीय संघ के सख्त होते पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा नियम उसके लिए नई चुनौती बन रहे हैं। ICRIER की रिपोर्ट के मुताबिक, कीटनाशक अवशेष, कमजोर ट्रेसबिलिटी, सीमित प्रयोगशाला क्षमता और बिखरी नियामकीय व्यवस्था प्रीमियम बाजारों तक भारत की पहुंच और प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को प्रभावित कर सकती है।

भारत भले ही दुनिया के चावल निर्यात बाजार में सबसे आगे हो, लेकिन यूरोपीय संघ के तेजी से बदलते हरित व्यापार नियम उसकी इस बढ़त के लिए नई चुनौती बनकर उभर रहे हैं। उत्पादन और निर्यात के रिकॉर्ड के बावजूद भारत को अब सबसे बड़ी जरूरत अधिक चावल पैदा करने की नहीं, बल्कि यह साबित करने की है कि उसकी हर खेप यूरोपीय संघ के कड़े पर्यावरण, खाद्य सुरक्षा और श्रम मानकों पर खरी उतरती है।
 
इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, यूरोपीय बाजार में भारत की चुनौती अब केवल उत्पादन या कीमत की प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं है। अनुपालन, ट्रेसबिलिटी और प्रमाणन की कमजोरियां भारतीय चावल की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं।
 
भारत की हिस्सेदारी वैश्विक चावल निर्यात में करीब 29.1 प्रतिशत है। वर्ष 2024 में उसने लगभग 11.8 अरब डॉलर का चावल निर्यात किया। घरेलू चावल उत्पादन भी 2014-15 के 10.54 करोड़ टन से बढ़कर 2025-26 में 15.40 करोड़ टन पहुंच गया है। यानी एक दशक में उत्पादन में लगातार वृद्धि हुई है। इसके बावजूद रिपोर्ट ने चेताया है कि इन उपलब्धियों के पीछे निर्यात व्यवस्था की कुछ गंभीर कमजोरियां छिपी हुई हैं।
 
यूरोप का बाजार छोटा, लेकिन प्रभाव बड़ा
 
भारत के कुल चावल निर्यात में यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी 2024 में केवल करीब 2.14 प्रतिशत थी। इसके बावजूद यूरोपीय बाजार का महत्व बहुत अधिक है, क्योंकि वहां लागू किए जा रहे पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा मानक अब वैश्विक व्यापार के लिए भी संदर्भ बनते जा रहे हैं।
 
भारत अब भी यूरोपीय संघ का सबसे बड़ा बाहरी चावल आपूर्तिकर्ता है। यूरोपीय संघ को भारत का चावल निर्यात 2015 के 23.13 करोड़ डॉलर से बढ़कर 2025 में 55.08 करोड़ डॉलर हो गया। इस अवधि में यूरोपीय संघ के कुल चावल आयात में भारत की हिस्सेदारी 11 प्रतिशत से बढ़कर 13 प्रतिशत हुई।
 
लेकिन आगे की राह आसान नहीं है। यूरोपीय संघ अब पारंपरिक खाद्य सुरक्षा जांच से आगे बढ़ते हुए चावल के उत्पादन, पर्यावरणीय प्रभाव, श्रमिकों की स्थिति और पूरी सप्लाई चेन की निगरानी पर जोर दे रहा है।
 
ग्रीन डील, फार्म-टू-फोर्क रणनीति और कॉरपोरेट सस्टेनेबिलिटी ड्यू डिलिजेंस डायरेक्टिव के तहत कीटनाशकों के इस्तेमाल, भूजल प्रबंधन, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, श्रमिक कल्याण और कंपनियों की जवाबदेही जैसे मुद्दे भी निर्यात अनुपालन का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
 
कीटनाशक अवशेष बड़ी चिंता
 
भारत के सामने मौजूद चुनौती का अंदाजा यूरोपीय संघ के रैपिड अलर्ट सिस्टम फॉर फूड एंड फीड (RASFF) के आंकड़ों से लगाया जा सकता है। 2019 से 2025 के बीच भारतीय चावल की खेपों से संबंधित 200 से अधिक नोटिफिकेशन दर्ज किए गए। इनमें बड़ी संख्या कीटनाशक अवशेषों से जुड़े मामलों की थी, जिनमें ट्राइसाइक्लाजोल और थायामेथोक्साम जैसे रसायन शामिल हैं।
 
वर्ष 2025 में ही भारत के चावल निर्यात के खिलाफ 52 अस्वीकृति नोटिफिकेशन दर्ज हुए, जबकि पाकिस्तान के लिए यह संख्या 55 थी। दूसरी ओर, म्यांमार और थाईलैंड के मामले में कोई नोटिफिकेशन नहीं दर्ज हुआ, जबकि कंबोडिया और वियतनाम के मामले में केवल एक-एक नोटिफिकेशन रहा।
 
ICRIER के अनुसार, यह स्थिति संकेत देती है कि समस्या केवल बाजार पहुंच या भेदभाव की नहीं, बल्कि निर्यात अनुपालन में असंगति की भी है।
 
कई एजेंसियां, लेकिन जवाबदेही किसकी?
 
रिपोर्ट ने भारत की संस्थागत व्यवस्था को भी बड़ी कमजोरी बताया है। APEDA, एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल, विदेश व्यापार महानिदेशालय, FSSAI, सीमा शुल्क विभाग और राज्य स्तरीय एजेंसियां निर्यात से जुड़े अलग-अलग काम करती हैं। लेकिन पूरी सप्लाई चेन में शुरू से अंत तक अनुपालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसी एक संस्था के पास नहीं है।
 
इससे निर्यातकों को पंजीकरण, सर्टिफिकेशन और परीक्षण की कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। भारतीय और यूरोपीय नियामकों के बीच पारस्परिक मान्यता की सीमित व्यवस्था के कारण निर्यातकों की अनुपालन लागत भी बढ़ रही है।
 
प्रयोगशाला की क्षमता भी चिंता का विषय
 
APEDA ने 126 प्रयोगशालाओं को जांच के लिए अधिकृत किया है, लेकिन इनमें सिर्फ 50 चावल निर्यात की जांच करने में सक्षम हैं। इनमें भी केवल 47 को FSSAI की मान्यता प्राप्त है। EIC की आठ प्रयोगशालाओं में केवल छह चावल परीक्षण कर सकती हैं, जबकि उसकी 81 बाहरी प्रयोगशालाओं में से 59 में यह क्षमता है।
 
रिपोर्ट के मुताबिक, इस बिखरी हुई व्यवस्था के कारण निर्यात से पहले क्वालिटी संबंधी समस्याओं की पहचान नहीं हो पाती है। कमतर क्वालिटी की खेप को भारत से रवाना होने से पहले ही रोका जा सकता था।
 
ट्रेसबिलिटी और सर्टिफिकेशन भी चुनौती
 
APEDA का Basmati.Net प्लेटफॉर्म किसानों से लेकर व्यापारियों, मिलर्स और निर्यातकों तक को जोड़ता है और चावल की ट्रेसबिलिटी में मदद करता है। लेकिन इसकी अंतरराष्ट्रीय मान्यता अभी सीमित है। रिपोर्ट का कहना है कि जब तक यूरोपीय संघ ऐसे भारतीय डिजिटल सिस्टम को औपचारिक मान्यता नहीं देता, तब तक भारतीय निर्यातकों को अतिरिक्त दस्तावेजी और सर्टिफिकेशन आवश्यकताओं का सामना करना पड़ सकता है।
 
टैरिफ बढ़ा रहे प्रतिस्पर्धी दबाव
 
भारत के लिए एक और चुनौती व्यापारिक शर्तों से जुड़ी है। प्रस्तावित भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते में चावल को टैरिफ उदारीकरण से बाहर रखा गया है। भारतीय चावल पर लगभग 7.7 प्रतिशत शुल्क लागू है, जबकि वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी देशों को मौजूदा व्यापार समझौतों के कारण अधिक अनुकूल बाजार पहुंच हासिल है। इसके अलावा भारत को मिलने वाले GSP लाभों के 2027 में समाप्त होने की आशंका भी है, जिससे भारतीय चावल की कीमत संबंधी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त और प्रभावित हो सकती है।
 
असर सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं
 
सबसे बड़ी चिंता यह है कि यूरोपीय संघ के नियम केवल यूरोपीय बाजार तक सीमित प्रभाव नहीं डालेंगे। जैसे-जैसे दूसरे विकसित बाजार भी पर्यावरण, खाद्य सुरक्षा और श्रम मानकों को कड़ा करेंगे, यूरोपीय मानकों पर खरा न उतर पाने वाले देशों के लिए अन्य प्रीमियम बाजारों में भी प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो सकता है।
 
ICRIER ने छह प्रमुख पर्यावरणीय जोखिमों और चार श्रम संबंधी जोखिमों की पहचान की है। इनमें कीटनाशक अवशेष, भूजल का अत्यधिक दोहन, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, प्रवासी श्रमिकों की असुरक्षा और बाल श्रम जैसे मुद्दे शामिल हैं।
 
रिपोर्ट का निष्कर्ष स्पष्ट है - भारत के सामने समस्या चावल उत्पादन की नहीं, बल्कि संस्थागत क्षमता को प्रभावी अनुपालन में बदलने की है। भारत के पास उत्पादन, प्रसंस्करण और निर्यात का मजबूत आधार है, लेकिन यदि ट्रेसबिलिटी, प्रयोगशाला परीक्षण, नियामकीय समन्वय और अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन व्यवस्था को मजबूत नहीं किया गया, तो दुनिया के सबसे बड़े चावल निर्यातक के रूप में भारत का दबदबा सीमित हो सकता है।
 
प्रीमियम वैश्विक बाजारों में नेतृत्व बनाए रखने के लिए अब केवल अधिक चावल पैदा करना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उसके चावल की गुणवत्ता, सुरक्षा, टिकाऊपन और पूरी आपूर्ति श्रृंखला अंतरराष्ट्रीय मानकों पर प्रमाणित हो।