फिर शुरू हुई किसान कर्ज माफी, महाराष्ट्र की 35,000 करोड़ रुपये की घोषणा से क्रेडिट अनुशासन पर बहस तेज

खरीफ सीजन से पहले महाराष्ट्र सरकार की 35,000 करोड़ रुपये की किसान कर्जमाफी की घोषणा ने एक बार फिर इस तरह के कदमों को लेकर बहस छेड़ दी है। राज्य में पिछले साल इसे लेकर किसानों ने आंदोलन किया था। गुजरात और कर्नाटक में भी फसल ऋण माफ करने की मांग उठ रही है। हालांकि विश्लेषकों और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का कहना है कि बार-बार कर्ज माफी ऋण अनुशासन को कमजोर करती हैं।

कृषि कर्ज माफी एक बार फिर शुरू हो गई है। पिछले सप्ताह महाराष्ट्र सरकार ने एक बड़ी कर्ज माफी योजना की घोषणा की, जिससे राज्य के लगभग 35,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इस योजना से करीब 50 लाख किसानों को लाभ मिल सकता है। हालांकि इस कदम ने फिर से इस बहस को तेज कर दिया है कि क्या ऐसी योजनाएं वास्तव में किसानों की मदद करती हैं या देश की कृषि ऋण व्यवस्था को कमजोर करती हैं।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने आगामी खरीफ सीजन से पहले ‘पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर शेतकरी कर्जमाफी योजना’ की घोषणा की। यह योजना 2024 के विधानसभा चुनावों के दौरान सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन द्वारा किए गए वादे के अनुरूप है। इस योजना के तहत किसानों के 2 लाख रुपये तक के फसल ऋण को माफ किया जाएगा, बशर्ते यह ऋण 30 सितंबर 2025 तक बकाया रहा हो।

राज्य सरकार के अनुसार, 28 से 30 लाख किसान जिन्होंने फसल ऋण का भुगतान नहीं किया है, इस कर्ज माफी से सीधे लाभान्वित होंगे। इसके अलावा, लगभग 20 लाख ऐसे किसान, जिन्होंने समय पर अपने ऋण का भुगतान किया है, उन्हें 50,000 रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। सरकार का अनुमान है कि केवल डिफॉल्टर किसानों की कर्जमाफी पर लगभग 20,000 करोड़ का खर्च आएगा, जबकि नियमित रूप से ऋण चुकाने वाले किसानों को दिए जाने वाले प्रोत्साहन पर करीब 15,000 करोड़ खर्च होंगे। इस प्रकार कुल मिलाकर योजना का वित्तीय बोझ लगभग 35,000 करोड़ रुपये होगा।

मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा कि इस योजना का उद्देश्य किसानों को कर्ज के बोझ से मुक्त करना है, ताकि वे अगले कृषि चक्र के लिए नया फसल ऋण लेने के पात्र बन सकें। सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि किसानों की पहचान आधार से जुड़े डिजिटल सिस्टम के जरिए सत्यापित की जाएगी, ताकि खरीफ बुवाई से पहले वास्तविक लाभार्थियों तक योजना का लाभ पहुंचाया जा सके।

हालांकि स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के संस्थापक राजू शेट्टी ने फडणवीस सरकार की घोषणा की कड़ी आलोचना करते हुए इस कर्ज माफी को “ढोंग” करार दिया। उन्होंने कहा कि पिछले साल अक्टूबर में किसान आंदोलन के बाद बैठक में मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया था कि किसानों का पूरा फसल ऋण माफ किया जाएगा। शेट्टी ने कहा कि अधिकांश किसानों पर 3.5 से 4 लाख रुपये का फसल ऋण बकाया है। मौजूदा योजना के तहत केवल 2 लाख रुपये तक का कर्ज माफ किया जा रहा है। ऐसे में किसानों को योजना का लाभ लेने के लिए शेष राशि पहले चुकानी होगी। महाराष्ट्र में किसानों ने पिछले वर्ष अक्टूबर में कर्ज माफी की मांग को लेकर आंदोलन किया था। एनसीपी के संस्थापक शरद पवार ने भी किसानों के कर्ज माफ करने की मांग की थी। 

कर्नाटक में भी किसान फसल ऋण माफी की मांग कर रहे हैं। गुजरात में कांग्रेस पार्टी किसान कर्ज माफी की मांग कर रही है। राज्य कांग्रेस नेता शक्तिसिंह गोहिल ने नवंबर 2025 में कहा था कि बेमौसम बारिश से फसल नुकसान के कारण राज्य में कुछ किसानों ने आत्महत्या कर ली। उन्होंने सरकार से किसानों को उनकी खेती की पूरी लागत का मुआवजा देने और उनके कर्ज माफ करने की मांग की थी।

कर्ज माफी का लंबा इतिहास
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 35 वर्षों में केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारें मिलकर कृषि ऋण माफी योजनाओं पर 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर चुकी हैं। देश में पहली बड़ी राष्ट्रव्यापी कृषि ऋण माफी 1990 में एग्रीकल्चर एंड रूरल डेट रिलीफ स्कीम (ARDRS) के तहत लागू की गई थी। इस योजना में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों से लिए गए अल्पकालिक ऋण तथा टर्म लोन की बकाया किस्तों को शामिल किया गया था। उस समय इस योजना पर लगभग 10,000 करोड़ रुपये का खर्च आया था, जो मौजूदा कीमतों के हिसाब से 50,000 करोड़ रुपये से अधिक है।

इसके बाद 2008 में एग्रीकल्चरल डेट वेवर एंड डेट रिलीफ स्कीम (ADWDRS) लागू की गई, जो कहीं अधिक बड़ी योजना थी और जिस पर लगभग 52,500 करोड़ रुपये खर्च हुए। इस योजना में वाणिज्यिक बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, सहकारी संस्थाओं और लोकल एरिया बैंकों से लिए गए ऋण शामिल थे। इसमें छोटे और सीमांत किसानों को अधिक राहत देने का प्रावधान किया गया था।

राज्यों की बढ़ती भूमिका
हाल के वर्षों में कृषि ऋण माफी की घोषणाएं केंद्र सरकार के बजाय राज्य सरकारों द्वारा अधिक की जाने लगी हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार 2014-15 के बाद से अब तक कम से कम दस राज्यों ने लगभग 2.4 लाख करोड़ रुपये के कृषि ऋण माफी की घोषणा की है। वर्ष 2017 से 2019 के बीच कई राज्यों ने बड़े पैमाने पर ऐसी योजनाएं लागू कीं। राजस्थान ने लगभग 18,000 करोड़ रुपये की ऋण माफी की घोषणा की, मध्य प्रदेश ने 36,500 करोड़ रुपये की योजना शुरू की, जबकि छत्तीसगढ़ ने 6,100 करोड़ रुपये का ऋण माफी कार्यक्रम लागू किया। 

इन योजनाओं का उद्देश्य किसानों के कर्ज का बोझ कम करना और ग्रामीण मांग को बढ़ावा देना था, लेकिन इनके दीर्घकालिक प्रभाव को लेकर अर्थशास्त्रियों और नीति निर्माताओं के बीच मतभेद बने हुए हैं। कृषि ऋण माफी योजनाएं राज्य सरकारों पर भारी वित्तीय बोझ डाल सकती हैं। आमतौर पर इसका प्रभाव तीन से पांच वर्षों तक पड़ता है, क्योंकि या तो योजनाएं चरणबद्ध तरीके से लागू की जाती हैं या फिर बैंकों का भुगतान कई बजटीय वर्षों में किया जाता है।

विभिन्न राज्यों में इसका वित्तीय प्रभाव काफी अलग-अलग रहा है। कुछ मामलों में ऋण माफी की लागत सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के 0.1 प्रतिशत से लेकर लगभग 2 प्रतिशत तक रही है। विश्लेषकों का कहना है कि इससे सरकारों की कृषि अवसंरचना पर खर्च करने की क्षमता सीमित हो सकती है।

महाराष्ट्र के मामले में राज्य सरकार का कहना है कि उसकी वित्तीय स्थिति इतनी मजबूत है कि वह इस योजना का खर्च वहन कर सकती है। हालांकि आलोचकों का तर्क है कि इस तरह का बड़ा खर्च कृषि क्षेत्र में उत्पादक निवेश को प्रभावित कर सकता है।

क्रेडिट अनुशासन पर चिंता
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने आगाह किया है कि बार-बार कर्ज माफी की घोषणाएं बैंकिंग व्यवस्था में क्रेडिट अनुशासन को कमजोर करती हैं और वित्तीय तंत्र में नैतिक जोखिम पैदा करती हैं। आरबीआई के अनुसार, जब उधार लेने वालों लगता है कि भविष्य में उनका कर्ज माफ हो सकता है, तो कुछ लोग इस उम्मीद में कर्ज की अदायगी टाल देते हैं या भुगतान करना बंद कर देते हैं। इस तरह का व्यवहार ऋण चुकाने की संस्कृति को कमजोर करता है और बैंकों की वित्तीय सेहत पर भी नकारात्मक असर डालता है। विश्लेषकों का कहना है कि इसका असर विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर अधिक पड़ता है, क्योंकि निजी बैंकों की तुलना में उनका कृषि ऋण में जोखिम ज्यादा होता है।

मैक्वेरी ग्रुप के विश्लेषक सुरेश गणपति ने एक नोट में कहा, “कृषि क्षेत्र में कर्जमाफी अंततः गैर-निष्पादित ऋण (NPL) बढ़ाने का कारण बनती है, क्योंकि इससे क्रेडिट संस्कृति कमजोर होती है।” उन्होंने कहा कि इसका असर सरकारी बैंकों पर ज्यादा पड़ सकता है, क्योंकि उनके कृषि ऋण पोर्टफोलियो में अपेक्षाकृत अधिक संख्या में जोखिम वाले उधार होते हैं। हालांकि सभी बैंकों को प्राथमिकता क्षेत्र ऋण लक्ष्य, जिसमें कृषि भी शामिल है, पूरा करना होता है, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की ग्रामीण और कृषि ऋण में हिस्सेदारी आम तौर पर अधिक होती है।

ऋण माफी की जगह प्रत्यक्ष सहायता?
फार्म लोन माफी को लेकर एक और आलोचना यह है कि इसका लाभ हमेशा सबसे कमजोर किसानों तक नहीं पहुंच पाता। बड़ी संख्या में छोटे और सीमांत किसान अपनी जरूरतों के लिए साहूकारों जैसे अनौपचारिक स्रोतों से कर्ज लेते हैं, इसलिए बैंक ऋण माफी योजनाओं का उन्हें सीधा लाभ नहीं मिल पाता।

अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि बड़ी घोषणाओं के बावजूद पात्र किसानों में से केवल एक हिस्से को ही वास्तव में राहत मिलती है। एक शोध रिपोर्ट के अनुसार, 2014 के बाद से 3.7 करोड़ पात्र किसानों में से मार्च 2022 तक केवल लगभग आधे किसानों को ही ऋण माफी का लाभ मिल पाया था। इसी कारण अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ऋण माफी के बजाय प्रत्यक्ष आय सहायता कार्यक्रम अधिक प्रभावी हो सकते हैं। ऐसे कार्यक्रम अपेक्षाकृत कम वित्तीय बोझ में अधिक व्यापक किसान वर्ग को सहायता प्रदान कर सकते हैं।