रबी खरीद सीजन 2027-28 के लिए गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में केवल 25 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी पर किसान संगठनों में नाराजगी जताई है। केंद्र सरकार ने गेहूं का एमएसपी 2,585 रुपये से बढ़ाकर 2,610 रुपये प्रति क्विंटल किया है। यह वृद्धि एक फीसदी से भी कम, करीब 0.96 प्रतिशत है।
2004-05 के बाद सबसे कम बढ़ोतरी
प्रतिशत के लिहाज से यह गेहूं के एमएसपी में पिछले 23 वर्षों की सबसे कम बढ़ोतरी है। इससे पहले वर्ष 2004-05 के लिए केंद्र सरकार ने गेहूं के एमएसपी में कोई बढ़ोतरी नहीं की थी। तब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार थी।
कुल वृद्धि के लिहाज से देखें तो गेहूं के एमएसपी में इस बार से कम, केवल 20 रुपये की बढ़ोतरी 2010-11 के लिए मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए-2 सरकार के समय हुई थी। हालांकि, प्रतिशत के लिहाज से यह वृद्धि 1.85 प्रतिशत थी। पिछले तीन दशकों में गेहूं के एमएसपी में सर्वाधिक 21.43 प्रतिशत की बढ़ोतरी 2007-08 में हुई थी। तब गेहूं का एमएसपी 700 रुपये से 150 रुपये बढ़ाकर 850 रुपये प्रति क्विंटल किया गया था। 2014 के बाद गेहूं के एमएसपी में सर्वाधिक वृद्धि 2024-25 के लिए हुई थी, जब केंद्र सरकार ने गेहूं का एमएसपी 150 रुपये यानी लगभग 7 फीसदी बढ़ाया था। पिछले साल मोदी सरकार ने गेहूं का एमएसपी 160 रुपये बढ़ाकर 2585 रुपये प्रति क्विंटल किया था जो 6.6 फीसदी बढ़ोतरी थी।
किसान संगठनों ने बताया धोखा
गेहूं सहित रबी फसलों के एमएसपी में बढ़ोतरी पर किसान संगठनों का कहना है कि खेती की बढ़ती लागत और महंगाई के बीच यह वृद्धि किसानों के लिए पर्याप्त नहीं है।
भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, फिर भी सरकार ने गेहूं के एमएसपी में मात्र 25 रुपये की बढ़ोतरी की है। उन्होंने कहा कि अन्य फसलों के एमएसपी में भी बहुत कम बढ़ोतरी की गई है। टिकैत ने इस पर निराशा जताते हुए कहा कि किसान का हल बेईमान नहीं है, दिल्ली की कलम बेईमान है।
किसान मजदूर मोर्चा के नेताओं ने चंडीगढ़ में प्रेस वार्ता कर गेहूं के एमएसपी में मामूली बढ़ोतरी पर नाराजगी जताई और इसे किसानों के साथ खिलवाड़ करार दिया। उन्होंने फसलों के दाम डॉ. स्वामीनाथन आयोग के C2+50 प्रतिशत फार्मूले के अनुसार निर्धारित करने की मांग की। मोर्चे ने कहा कि खेती में लगातार बढ़ रही लागत, डीजल, खाद, बीज, कीटनाशक और मजदूरी के खर्च को ध्यान में रखे बिना की गई मामूली बढ़ोतरी से किसानों की आर्थिक स्थिति में कोई बुनियादी सुधार नहीं हो सकता।
भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) के राष्ट्रीय प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक ने कहा कि गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 0.96 प्रतिशत की वृद्धि धोखा है। सरकार की किसान विरोधी नीतियों के चलते किसानों पर लगातार कर्ज बढ़ता जा रहा है। बीकेयू (अराजनैतिक) ने एमएसपी के साथ किसानों के खर्च और बढ़ी महंगाई के आंकड़े भी जारी करने की मांग की है। खासतौर पर पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना तथा कृषि विश्वविद्यालय, पंतनगर में गेहूं की उत्पादन लागत से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग की है।
अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) ने किसानों के लिए लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने के केंद्र सरकार के दावे को खारिज किया है। सरकार का दावा है कि किसानों को उत्पादन लागत पर कम से कम 50 प्रतिशत का लाभ दिया जा रहा है। AIKS का कहना है कि यह दावा पूरी तरह भ्रामक है। संगठन के अनुसार, यह गणना कमतर लागत A2+FL पर आधारित है, जबकि किसान संगठन व्यापक लागत C2+50% के आधार पर एमएसपी तय करने की मांग लंबे समय से करते रहे हैं। साथ ही, एमएसपी की कानूनी गारंटी और इसे प्रभावी सरकारी खरीद व्यवस्था से जोड़ने की मांग भी कर रहे हैं।
किसान सभा का कहना है कि ऐसे समय जब किसान उत्पादन जोखिम, कम बारिश और बढ़ती खेती लागत का सामना कर रहे हैं, सरकार ने प्रमुख रबी फसलों के एमएसपी में बेहद अपर्याप्त बढ़ोतरी की है।
गौरतलब है कि अगले साल देश के दो प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश और पंजाब में विधानसभा चुनाव हैं। दोनों ही राज्यों में किसानों से जुड़े मुद्दे राजनीति पर असर डालते हैं। ऐसे में इस फैसले के सियासी नफे-नुकसान का भी आकलन किया जा रहा है।