ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच युद्ध का देश में उर्वरक उत्पादन पर असर पड़ना शुरू हो गया है, लेकिन फिलहाल यूरिया और डाई अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) सहित अधिकांश उर्वरकों का स्टॉक पिछले साल से बेहतर है। अगर युद्ध एक सप्ताह और खिंचता है तो देश में उर्वरकों का संकट पैदा हो सकता है। उर्वरकों और गैस, पोटाश तथा फॉस्फेट जैसे उसके कच्चे माल के मामले में देश की सबसे अधिक निर्भरता खाड़ी के देशों पर है। फिलहाल वहां से इनका आयात बंद हो गया है। गैस की आपूर्ति प्रभावित होने से यूरिया का उत्पादन भी गिरा है, लेकिन यह कमी सात से आठ फीसदी के आसपास ही है।
उद्योग सूत्रों ने रूरल वॉयस को बताया कि फिलहाल कोई संकट नहीं है और इसकी वजह फरवरी, 2026 के अंत में उर्वरकों का स्टॉक फरवरी, 2025 से अधिक होना है। हालांकि चालू साल में पिछले साल के मुकाबले अधिकांश उर्वरकों की खपत भी बढ़ी है, लेकिन उसके बावजूद फरवरी के अंत में स्टॉक अधिक है। उक्त सूत्र के मुताबिक युद्ध के चलते गैस की आपूर्ति में 10 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है। इसके चलते कुछ यूरिया उत्पादन संयंत्रों ने उत्पादन में सात से आठ फीसदी तक की कटौती की है। लेकिन अगर युद्ध एक सप्ताह और खिंचता है तो देश में उर्वरकों की उपलब्धता के मोर्चे मुश्किल बढ़ सकती है।
उद्योग सूत्रों के मुताबिक फरवरी, 2026 के अंत में देश में यूरिया का स्टॉक 55 लाख रहा है। जबकि पिछले साल इसी समय इसका स्टॉक 49 लाख टन था। वहीं डीएपी के मामले में स्थिति और बेहतर है। चालू साल में फरवरी के अंत में डीएपी का स्टॉक 25 लाख रहा जो इसके पहले साल इसी समय 13 लाख टन रहा था। म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) का स्टॉक फरवरी, 2026 में पिछले साल से कम रहा है। यह 12.92 लाख टन रहा जो पिछले साल इसी समय 15 लाख टन था।
कॉम्प्लेक्स उर्वरकों में एनपीके के मामले में स्थिति बेहतर है। फरवरी, 2026 के अंत में एनपीके का स्टॉक 54 लाख टन रहा जो पिछले साल इसी समय 32 लाख टन पर था। वहीं इस साल फरवरी के अंत में सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) का स्टॉक 32 लाख टन रहा जो पिछले साल इसी समय 22 लाख टन था।
उक्त सूत्र का कहना है कि यह स्थिति तब है जब चालू साल में यूरिया की बिक्री में नौ फीसदी, डीएपी की बिक्री में 21 फीसदी और एनपीके की बिक्री में पिछले साल के मुकाबले 11.9 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
पिछले कुछ दिनों में ही वैश्विक बाजार में डीएपी की कीमत बढ़ने लगी थी और युद्ध शुरू होने के पहले 740 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई थी। भारत उर्वरकों, कच्चे माल और गैस का आयात सऊदी अरब, मोरक्को, जॉर्डन और ओमान समेत कई पश्चिम एशियाई देशों से करता है। वहीं डीएपी के एक बड़े निर्यातक चीन ने डीएपी का निर्यात पहले ही बंद कर रखा है। भारत ने सऊदी अरब की उर्वरक कंपनी मादेन के साथ डीएपी की दीर्घकालिक आपूर्ति का करार किया है लेकिन मौजूदा परिस्थिति में यह आयात संभव नहीं है। रूस के साथ भी दीर्घकालिक करार हुआ है लेकिन वहां से भी आपूर्ति अप्रैल के मध्य में होगी। इसके साथ यह भी तय है कि इस युद्ध के चलते उर्वरकों की कीमतों में तेजी आना तय है। इसके चलते अगर किसानों को कीमत वृद्धि से बचाकर रखना है तो सरकार को अधिक उर्वरक सब्सिडी देनी होगी।
देश में उर्वरकों की करीब 650 लाख टन की सालाना खपत होती है। इसमें चालू साल में यूरिया की खपत 400 लाख टन के आसपास रहेगी। डीएपी की खपत करीब 100 लाख टन रहती है। बाकी मात्रा अन्य कॉम्पलेक्स व उर्वरकों की है।
उर्वरक उद्योग इस परिस्थिति पर नजर लगाए हुए है और सूत्रों का कहना है कि अगले एक सप्ताह से 10 दिन काफी अहम साबित होंगे। उसके बाद ही स्थिति साफ होगी। करीब चार साल पहले फरवरी में ही रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला करने के बाद उर्वरकों की कीमतो में भारी तेजी आई थी। जिसके चलते सरकार को उर्वरक सब्सिडी में बढ़ोतरी करनी पड़ी थी। लेकिन इस बार केवल कीमतों की बात नहीं है। अगर यह युद्ध जारी रहता है तो समय पर आयात को लेकर एक बड़ी चुनौती खड़ी हो जाएगी।