वित्त मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि 2026 के मानसून सीजन के दौरान अल नीनो कृषि उत्पादन, खाद्य महंगाई और ग्रामीण आर्थिक गतिविधियों के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। हालांकि इसने यह भी कहा है कि इस वर्ष खरीफ सीजन की शुरुआत में देश के पास पर्याप्त खाद्यान्न भंडार और जल की उपलब्धता मौजूद है।
मई 2026 की मासिक आर्थिक रिपोर्ट में मंत्रालय ने कहा कि कृषि क्षेत्र के लिए निकट अवधि में स्थिति आश्वस्त करने वाली है, लेकिन मध्यम अवधि में सतर्क रहने की आवश्यकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने मानसून सीजन के दौरान अल नीनो की आशंका जताई है। रिपोर्ट में मानसूनी वर्षा को दीर्घकालिक औसत (LPA) का लगभग 92 प्रतिशत बताया गया (आईएमडी ने इसे संशोधित कर 90 प्रतिशत कर दिया है)।
खरीफ सीजन की मजबूत शुरुआत
रिपोर्ट के अनुसार भारत मानसून सीजन में पर्याप्त खाद्यान्न भंडार और जल संसाधनों के साथ प्रवेश कर रहा है। अप्रैल 2026 के अंत तक भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) और राज्य की एजेंसियों के पास चावल और गेहूं का संयुक्त भंडार 817.53 लाख टन था। जलाशयों में जल भंडारण भी सामान्य स्तर से काफी ऊपर रहा और यह दशक के औसत का 123.86 प्रतिशत दर्ज किया गया। वहीं ग्रीष्मकालीन फसलों की बुवाई का रकबा बढ़कर 83.08 लाख हेक्टेयर हो गया, जो पिछले वर्ष इसी अवधि के 80.01 लाख हेक्टेयर से अधिक है। इससे आगामी खरीफ सीजन के लिए सकारात्मक आधार तैयार हुआ है।
हालांकि मंत्रालय ने चेताया कि यदि जून में अल नीनो के कारण वर्षा में कमी आती है, तो इसका असर खाद्य महंगाई, ग्रामीण खपत और समग्र आर्थिक विकास पर पड़ सकता है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक ऊर्जा कीमतें पहले से ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं।
दलहन और तिलहन पर सबसे अधिक खतरा
रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐतिहासिक रूप से अल नीनो वाले वर्षों में धान उत्पादन अपेक्षाकृत स्थिर रहा है क्योंकि प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में सिंचाई सुविधाएं बेहतर हैं। इसके विपरीत, दलहन और तिलहन फसलें वर्षा की कमी के प्रति कहीं अधिक संवेदनशील रही हैं। चूंकि इनकी खेती मुख्य रूप से वर्षा आधारित क्षेत्रों में होती है, इसलिए पिछले अल नीनो वर्षों में इनके रकबे, उत्पादकता और कुल उत्पादन में गिरावट देखी गई है।
वित्त मंत्रालय ने पशुपालन और डेयरी क्षेत्र को लेकर भी चिंता जताई है। कम वर्षा से चारे की कमी, दूध उत्पादन में गिरावट और पशु आहार की लागत में वृद्धि हो सकती है, जिससे किसानों की आय और खाद्य कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
श्रम बाजार में स्थिरता बरकरार
कृषि क्षेत्र में जोखिमों के आकलन के साथ-साथ मंत्रालय ने श्रम बाजार की स्थिति को व्यापक रूप से स्थिर बताया है। अप्रैल 2026 के पीरियोडिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के अनुसार, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) 55 प्रतिशत रही, जबकि बेरोजगारी दर 5.2 प्रतिशत दर्ज की गई।
जनवरी-मार्च 2026 तिमाही के पीएलएफएस आंकड़ों के अनुसार औसत रोजगार 57.4 करोड़ व्यक्तियों का रहा, जिसमें 40.2 करोड़ पुरुष और 17.2 करोड़ महिलाएं शामिल थीं। कुल रोजगार में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 41.1 प्रतिशत रही, जबकि सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी 33.7 प्रतिशत और औद्योगिक क्षेत्र की हिस्सेदारी 25.2 प्रतिशत रही।
ग्रामीण रोजगार के स्वरूप में बदलाव
रिपोर्ट में बताया गया है कि वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही में ग्रामीण रोजगार में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 58.5 प्रतिशत थी, जो चौथी तिमाही में घटकर 55.8 प्रतिशत रह गई। यह रबी फसलों की बुवाई और कटाई के बीच की अवधि में श्रम मांग में मौसमी कमी को दर्शाता है।
कृषि क्षेत्र से मुक्त हुए श्रमिकों का एक हिस्सा सेकंडरी (जैसे मैन्युफैक्चरिंग) और टर्शियरी (जैसे सर्विसेज) क्षेत्रों में समाहित हुआ, जहां रोजगार हिस्सेदारी में मामूली वृद्धि दर्ज की गई। शहरी क्षेत्रों में सेवा क्षेत्र रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत बना रहा और इसकी हिस्सेदारी 62.1 प्रतिशत रही।
मंत्रालय ने यह भी बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्व-रोजगार और आकस्मिक श्रमिकों की हिस्सेदारी में कमी आई, जबकि नियमित वेतनभोगी रोजगार बढ़ा। इसके विपरीत शहरी क्षेत्रों में स्व-रोजगार बढ़ा और नियमित वेतनभोगी नौकरियों की हिस्सेदारी घटी। शहरी भारत में नियमित वेतनभोगी रोजगार 48.9 प्रतिशत रहा।
रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं की भागीदारी कृषि और स्व-रोजगार गतिविधियों में अपेक्षाकृत अधिक है, जबकि पुरुष श्रमिकों का बड़ा हिस्सा उद्योग और सेवा क्षेत्रों में केंद्रित है। वित्त मंत्रालय ने कहा कि श्रम बाजार के इंडिकेटर फिलहाल स्थिरता का संकेत देते हैं, लेकिन आने वाले महीनों में कृषि उत्पादन, महंगाई, ग्रामीण मांग और समग्र आर्थिक वृद्धि की दिशा काफी हद तक 2026 के मानसून के प्रदर्शन पर निर्भर करेगी।