धान-चावल के स्टॉक में कमी पर FIR, दोगुनी वसूली; केंद्र के नए नियमों से राइस मिलर्स पर शिकंजा

केंद्र ने राज्यों को ज्वाइंट फिजिकल वेरिफिकेशन के निर्देश दिए, कमी मिलने पर 12 फीसदी ब्याज के साथ वसूली, एफआईआर और दो साल तक सरकारी मिलिंग से बाहर करने का प्रावधान

धान की सरकारी खरीद का नया सीजन शुरू होने से ठीक पहले केंद्र सरकार ने राइस मिलों में रखे सरकारी धान और कस्टम मिल्ड राइस (CMR) के स्टॉक की निगरानी सख्त कर दी है। फिजिकल वेरिफिकेशन में स्टॉक कम पाए जाने पर संबंधित मिलर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने और कमी की दोगुनी वसूली के दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। डिफॉल्टर मिलर को दो साल तक सरकारी मिलिंग से बाहर किया जा सकता है।

केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने 23 सितंबर को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पत्र भेजकर अनमिल्ड धान के फिजिकल वेरिफिकेशन (PV) के लिए संशोधित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) जारी किया है। केंद्र ने भारतीय खाद्य निगम (FCI) और राज्य की एजेंसियों को मिलकर स्टॉक का ज्वाइंट फिजिकल वेरिफिकेशन (JPV) करने के निर्देश दिए हैं।

मंत्रालय की ओर से जारी नए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के अनुसार, फिजिकल वेरिफिकेशन के दौरान सरकारी धान अथवा चावल के स्टॉक में कमी पाए जाने पर संबंधित मिलर से कमी की राशि की दोगुनी दर से वसूली की जा सकती है। साथ ही 12 फीसदी ब्याज वसूलने, डिफॉल्टर मिलर को दो साल तक सरकारी मिलिंग से डिबार करने और उसके खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराने का भी प्रावधान है। केंद्र सरकार ने इससे पहले ये एसओपी 2025 में जारी किए थे। 

केंद्र के इन निर्देशों पर राइस मिलर्स ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने एक अक्टूबर से धान की खरीद और नए मिलिंग सीजन की शुरुआत से पहले फिजिकल वेरिफिकेशन तथा स्टॉक में कमी के आकलन के लिए स्पष्ट, वैज्ञानिक और एकसमान मानक तय करने की मांग की है। 

पंजाब में पुराना स्टॉक बना चुनौती

पंजाब में पुराने धान की मिलिंग में देरी और भंडारण क्षमता की कमी बड़ी चुनौती बनी हुई है। पंजाब में खरीफ मार्केटिंग सीजन (KMS) 2025-26 में खरीदा गया 156.10 लाख टन धान राइस मिलों में रखा गया था। निर्धारित 67 फीसदी आउट-टर्न रेशियो के आधार पर इससे करीब 105.63 लाख टन चावल निकलना था। लेकिन 1 सितंबर 2026 तक सरकारी एजेंसियों को 91.19 लाख टन चावल ही मिल पाया था और करीब 14.45 लाख टन चावल की डिलीवरी बाकी थी। जबकि पिछले साल इसी तारीख तक कस्टम मिल्ड राइस की डिलीवरी 99.96 फीसदी हो चुकी थी।

सितंबर के मध्य तक पंजाब की बड़ी संख्या में राइस मिलों में पिछले सीजन का धान और चावल मौजूद था। इसी संकट को देखते हुए पंजाब सरकार को खरीफ सीजन 2026-27 की कस्टम मिलिंग पॉलिसी के नियमों में ढील देनी पड़ी है। पंजाब सरकार ने उन मिलर्स को भी नया धान लेने की अनुमति दी है, जिन्होंने पिछले सीजन के देय चावल का कम से कम 90 फीसदी जमा करा दिया है। केंद्र सरकार ने पिछले सीजन के चावल की डिलीवरी की समयसीमा भी 30 नवंबर तक बढ़ा दी है।

तकनीकी शॉर्टफॉल को गबन न माना जाए

राइस मिलर्स की मांग है कि तकनीकी कारणों से होने वाले मिलिंग लॉस को गबन नहीं माना जाए। उनका तर्क है कि सरकारी धान के वास्तविक गबन और तकनीकी कारणों से मिलिंग रिकवरी में होने वाली कमी के बीच अंतर करना जरूरी है। 

राइस मिलर्स का कहना है कि हाइब्रिड और अन्य किस्मों के धान की मिलिंग रिकवरी अलग-अलग हो सकती है। इसके अलावा नमी, धान सुखाने के दौरान वजन में कमी, टूटे चावल की मात्रा और लंबे समय तक भंडारण जैसे कारकों का असर भी अंतिम रिकवरी पर पड़ता है। इसलिए केवल मिलिंग रिकवरी में अंतर के आधार पर किसी मिलर को अपराधी नहीं माना जाना चाहिए। 

मिलर्स की यह भी मांग है कि अगर वे फिजिकल वेरिफिकेशन के निष्कर्ष से सहमत नहीं हैं तो उनकी लिखित आपत्ति दर्ज की जाए और विवादित मामलों में दोबारा वेरिफिकेशन का अवसर मिले। अंतिम देनदारी तय करने, एफआईआर दर्ज कराने या मिलर को सरकारी मिलिंग से बाहर करने से पहले उसे नोटिस देकर अपना पक्ष रखने का मौका मिलना चाहिए।