टूटे चावल के दाम 360 डॉलर प्रति टन के पार, क्या फिर लगेगा इसके निर्यात पर प्रतिबंध?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में टूटे चावल (broken rice) के दाम 360 डॉलर प्रति टन के पार होने और घरेलू कीमतों में तेजी के बीच सरकार इसके निर्यात पर फिर प्रतिबंध लगा सकती है। आईआरईएफ (IREF) ने एथेनॉल और पोल्ट्री फीड की बढ़ती मांग तथा महंगाई संबंधी चिंताओं को इसकी वजह बताया है।
100 फीसदी टूटे चावल (ब्रोकन राइस) के निर्यात पर फिर से प्रतिबंध लग सकता है। घरेलू बाजार में कीमतों में लगातार बढ़ोतरी और एथेनॉल निर्माता कंपनियों, पोल्ट्री फीड उद्योग तथा निर्यातकों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण यह संभावना बनी है। इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) ने आगाह किया है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में टूटे चावल के दाम 360 डॉलर प्रति टन से अधिक हो गए हैं। इससे घरेलू उपलब्धता बनाए रखने के लिए सरकार हस्तक्षेप कर सकती है। पिछले महीने घरेलू बाजार में टूटे चावल की कीमतों में 5 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है।
आईआरईएफ के महानिदेशक विनोद कौल ने कहा कि कीमतों में इस बढ़ोतरी पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। टूटे चावल का इस्तेमाल अब एथेनॉल उत्पादन और पोल्ट्री फीड सहित कई उद्योगों में कच्चे माल के रूप में हो रहा है। घरेलू उद्योगों और निर्यात बाजार के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा से उपलब्धता घटने और कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
नए एथेनॉल वर्ष में सरकार ने चीनी से एथेनॉल बनाने का कोई उल्लेख नहीं किया है। दूसरी ओर, देश में एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम के विस्तार से टूटे चावल, मक्का और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के अतिरिक्त चावल सहित अनाज आधारित कच्चे माल की मांग बढ़ी है। सरकार ने एथेनॉल उत्पादन के लिए एफसीआई के अतिरिक्त चावल के इस्तेमाल की अनुमति दी है। हालांकि, निजी डिस्टिलरी कंपनियां खुले बाजार से भी कच्चा माल खरीदती हैं। इससे उनकी प्रतिस्पर्धा पोल्ट्री फीड निर्माताओं और निर्यातकों के साथ बढ़ जाती है। IREF के अनुसार, टूटे चावल की कीमतों में वृद्धि से इन उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है और महंगाई का दबाव भी बढ़ सकता है।
सरकार ने घरेलू उपलब्धता और मांग को देखते हुए सितंबर 2022 में टूटे चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। यह प्रतिबंध 7 मार्च 2025 तक जारी रहा, जिसके बाद निर्यात को फिर से मुक्त श्रेणी में रखा गया। आईआरईएफ के अनुसार घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देने के लिए सरकार फिर से निर्यात नियंत्रण का विकल्प अपना सकती है।
वर्ष 2025-26 में भारत का कुल चावल उत्पादन रिकॉर्ड 15.40 करोड़ टन रहा जबकि उससे पिछले साल यह 15.01 करोड़ टन था। इस दौरान करीब 2.15 करोड़ टन चावल का निर्यात किया गया। हालांकि, IREF ने कहा कि कुल चावल उत्पादन अधिक होने का मतलब यह नहीं है कि 100 फीसदी टूटे चावल की पर्याप्त उपलब्धता भी सुनिश्चित हो। इसकी आपूर्ति मिलिंग प्रक्रिया पर निर्भर करती है और इसकी मांग पर अलग-अलग कारकों का असर पड़ता है।
अगले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं। आईआरईएफ के अनुसार खाद्य महंगाई और एथेनॉल उत्पादन के लिए कच्चे माल की उपलब्धता को लेकर सरकार की संवेदनशीलता बढ़ सकती है।
फेडरेशन ने निर्यातकों को वायदा सौदे करते समय सतर्क रहने और घरेलू कीमतों, धान मिलों में आवक तथा एथेनॉल उद्योग की मांग पर नजर रखने की सलाह दी है। उसने सरकार से किसी भी प्रतिबंध से पहले उद्योग के हितधारकों से विचार-विमर्श करने और मौजूदा अनुबंधों, लेटर ऑफ क्रेडिट तथा पहले से तय खेपों के लिए उचित समय देने का आग्रह किया है। आईआरईएफ का कहना है कि किसी भी नीतिगत कदम में घरेलू जरूरतों के साथ किसानों, मिलरों और निर्यातकों के हितों का संतुलन जरूरी है, ताकि वैश्विक बाजार में भारत की भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता की छवि बनी रहे।

Join the RuralVoice whatsapp group



















