महंगी गैस और सल्फर ने बिगाड़ा उर्वरकों का गणित, तीन लाख करोड़ तक पहुंच सकती है सब्सिडी

गैस, डीएपी और सल्फर की ऊंची वैश्विक कीमतों से भारत की उर्वरक सब्सिडी चालू वित्त वर्ष में तीन लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। महंगी गैस से घरेलू यूरिया उत्पादन लागत बढ़ी है, जबकि डीएपी और एनपीके के कच्चे माल की कमी रबी सीजन में आपूर्ति पर दबाव बढ़ा सकती है।

वैश्विक बाजार में डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) और सल्फर की लगातार ऊंची कीमतों के साथ गैस के दाम में भारी बढ़ोतरी उर्वरक सब्सिडी के सरकार के बजट अनुमान को गड़बड़ाने जा रही है। आयातित यूरिया की कीमतों के 900 डॉलर को पार करने के बाद इसके घटकर 400 डॉलर प्रति टन पर आने से मिली राहत पूरे साल के लिए बनी रहेगी इसकी संभावना भी कम है। 

कीमतों में यह कमी चीन द्वारा यूरिया का निर्यात खोलने के चलते आई थी। वहीं ईरान-अमेरिका युद्ध के पहले जहां यूरिया उत्पादन के लिए उपयोग होने वाली गैस की आयात कीमत 15 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू के करीब थी वह अब 28 डॉलर के स्तर पर पहुंच गई है। यूरिया के बाद सबसे अधिक उपयोग होने वाली उर्वरक डीएपी की कीमतें 900 डॉलर प्रति टन के ऊपर ही बनी हुई हैं। इसी तरह सल्फर की कीमतों में करीब 40 डॉलर की कमी तो आई है लेकिन यह अब भी 900 डॉलर प्रति टन के आसपास ही है और इसकी उपलब्धता सामान्य नहीं हो पाई है।

उर्वरक उद्योग सूत्रों ने रूरल वॉयस को बताया कि चालू वित्त वर्ष में उर्वरक सब्सिडी करीब तीन लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। इसकी एक बड़ी वजह महंगी गैस है। देश में करीब 400 लाख टन यूरिया की खपत होती है जिसमें करीब 100 लाख टन आयात होता है। लेकिन जहां मौजूदा भाव पर आयातित यूरिया की कीमत कम है, वहीं महंगी गैस के चलते घरेलू उत्पादित यूरिया की कीमत 62 हजार रुपये प्रति टन से अधिक है। जाहिर है कि इसका सीधा असर सब्सिडी पर पड़ेगा क्योंकि राजनीतिक परिस्थिति और देश में सूखे की स्थिति का सामना कर रहे किसानों को देखते हुए कीमतों में बढ़ोतरी का जोखिम सरकार नहीं लेगी। यह स्थिति खाड़ी देशों में सामान्य स्थिति बहाल होने के बाद भी जारी रह सकती है। 

उक्त सूत्र के मुताबिक भारत को सबसे अधिक गैस की आपूर्ति कतर से होती रही है, लेकिन ईरान के हमलों से रिफाइनरियों और गैस संयंत्रों को जो नुकसान हुआ है उसके खाड़ी युद्ध के पहले की स्थिति में आने में कम से कम छह साल लग सकते हैं। ऐसे में भारत को गैस की आपूर्ति दूसरे स्रोतों से ही करनी होगी। इस स्थिति का सबसे अधिक फायदा अमेरिका का हुआ है जो भारत को गैस निर्यात करने वाला एक प्रमुख देश बन गया है।

वहीं गैर यूरिया उर्वरकों के मोर्चे पर रबी सीजन में आपूर्ति की मुश्किल बनी रह सकती है। डीएपी की महंगी कीमतों को देखते हुए सरकार को न्यूट्रिएंट आधारित सब्सिडी योजना (एनबीएस) के तहत सब्सिडी में भारी बढ़ोतरी करनी पड़ेगी। गैर यूरिया उर्वरक विनियंत्रित श्रेणी में आते हैं और कंपनियों को इनके दाम तय करने की छूट है क्योंकि सरकार सब्सिडी को एक स्तर पर ही रखती है। उससे अधिक लागत को कंपनियां दाम बढ़ाकर हासिल कर सकती हैं। लेकिन सरकार ने परोक्ष रूप से डीएपी के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) को 1350 रुपये प्रति बैग (50 किलो) पर स्थिर रखा है और सरकार उर्वरक कंपनियों को एनबीएस के तहत मिलने वाली सब्सिडी के अलावा लागत की भरपाई स्पेशल इंसेंटिव के जरिये कर रही है। सरकार ने अभी तक रबी सीजन 2026-27 के लिए एनबीएस के तहत सब्सिडी की दरें तय नहीं की हैं। 

डीएपी के अलावा एनबीएस तहत आने वाले उर्वरकों के दाम बढ़े हैं। कई एनपीके वेरिएंट के दाम 2400 रुपये प्रति बैग (50 किलो) तक पहुंच गये हैं। इसके चलते उर्वरकों की बिक्री में असंतुलन पैदा हो गया है। वहीं उर्वरक उद्योग का कहना है कि सल्फर की कमी के चलते एनपीके का उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है। दुनिया में सबसे अधिक डीएपी बनाने वाली मोरक्को की कंपनी ओसीपी वैश्विक बाजार में उपलब्ध अधिकांश सल्फर खरीद रही है। 

सल्फर पेट्रोलियम रिफाइनरियों का एक सह उत्पाद है। खाड़ी देशों में रिफाइनरियों पर हमलों के चलते इसकी आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसके अलावा यूक्रेन के हमलों से रूस की रिफाइनरियों को भारी नुकसान होने से अब रूस से इसका आपूर्ति लगभग बंद हो गई है। इसका असर डीएपी और एनपीके व एसएसपी जैसे उर्वरकों के उत्पादन पर पड़ रहा है। वहीं घरेलू डीएपी और कॉम्प्लेक्स उर्वरक उत्पादक इकाइयों में भी कच्चे माल की कमी के चलते उत्पादन सामान्य नहीं हो पाया है और वह पूरी क्षमता पर उत्पादन नहीं कर रही हैं।

इन परिस्थितियों का सीधा असर उर्वरक सब्सिडी में भारी बढ़ोतरी के रूप में दिखना तय है। सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में उर्वरक सब्सिडी के लिए 1,70,781 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। पिछले वर्ष का संशोधित अनुमान 1,86,460 करोड़ रुपये का है। उद्योग सूत्रों का कहना है कि इस वर्ष उर्वरक सब्सिडी तीन लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।

यहीं नहीं, अगर चीन यूरिया निर्यात की नीति में कोई बदलाव करता है तो उसके चलते वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी आ सकती है और यह 600 डॉलर प्रति टन तक जा सकती हैं। चीन सरप्लस में कमी आने के चलते इस तरह के बदलाव करता रहता है। इसलिए उर्वरकों और गैस की कीमतों में अगले कुछ माह उतार-चढ़ाव बने रहने की बात उर्वरक उद्योग के लोग कर रहे हैं।

अब यह सरकार को देखना होगा कि पहले ही खरीफ सीजन में बारिश की कमी के चलते कमजोर कृषि उत्पादन के बाद रबी सीजन में उर्वरकों की आपूर्ति को बेहतर बनाकर वह कैसे कृषि उत्पादन को सामान्य रखती है। खरीफ में कम बारिश के चलते उर्वरकों की खपत में गिरावट आई है, इसलिए रबी सीजन में उर्वरक आपूर्ति के रूप में इसका फायदा मिल सकता है। इसके साथ ही अगले साल के शुरू में उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राजनीतिक रूप से अहम राज्यों में विधान सभा चुनाव होने हैं। ऐसे में सरकार के सामने उर्वरकों की कीमतों में इजाफा करना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा कदम होगा जिसे वह उठाने से बचेगी।