भारत खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता से लगातार दूर होता जा रहा है। 1990 के दशक में जहां देश अपनी जरूरत का केवल 10 प्रतिशत खाद्य तेल आयात करता था, वहीं आज 60 प्रतिशत से अधिक जरूरत आयात से पूरी हो रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत ने तिलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए समय रहते पर्याप्त तैयारी की थी। एशियन पाम ऑयल अलायंस के चेयरमैन अतुल चतुर्वेदी का मानना है कि दशकों तक सस्ते आयात पर निर्भर रहने और घरेलू उत्पादन की अनदेखी का खामियाजा अब देश को ऊंची कीमतों और बढ़ते आयात बिल के रूप में भुगतना पड़ रहा है। रूरल वॉयस के एडिटर-इन-चीफ हरवीर सिंह के साथ बातचीत में उन्होंने खाद्य तेल संकट, पाम ऑयल, बायोडीजल, जीएम टेक्नोलॉजी और वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के भारतीय बाजार पर असर पर विस्तार से चर्चा की। मुख्य अंशः
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-देश में खाद्य तेलों की जरूरत के साथ आयात भी बढ़ता जा रहा है। 1990 के दशक में हम अपनी जरूरत का सिर्फ 10 प्रतिशत आयात करते थे, आज जरूरत का 60% से ज्यादा आयात कर रहे हैं। सरकार ने नेशनल मिशन फॉर ऑयल सीड और ऑयल पाम मिशन लॉन्च किया। उसके तीन साल हो गए हैं। अभी हम कहां खड़े हैं?
1970 और 1980 के दशक में फूड सिक्योरिटी का मतलब था गेहूं और चावल की सिक्योरिटी। खाद्य तेल प्राथमिकता में था ही नहीं। सैम पित्रोदा के अधीन 1987 के आसपास एक टेक्नोलॉजी मिशन लॉन्च हुआ। मैं समझता हूं कि सिर्फ वही समय था जब इस क्षेत्र में कुछ गंभीर काम हुआ। तीन-चार साल में तिलहन की खेती में काफी इजाफा हुआ। उसी का नतीजा था कि 1990 के दशक के बाद के वर्षों में सिर्फ तीन लाख टन खाद्य तेलों का आयात होता था। आज खपत 260 लाख टन है और आयात करीब 160 लाख टन पहुंच गया है।
एक बात और। 1980 के दशक तक भारत में प्रति व्यक्ति खाद्य तेल खपत सात से आठ किलो सालाना हुआ करती थी। वर्ष 1991 में इकोनॉमी खुली तो लोगों की इनकम बढ़ी और खान-पान की आदतों में बदलाव आया। उसका नतीजा यह हुआ कि प्रति व्यक्ति खपत आज बढ़कर 19 किलो सालना के आसपास हो गई है। खपत तो बढ़ती गई, पर तिलहन उत्पादन की तरफ जो तवज्जो देनी चाहिए थी, वह नहीं दी गई।
-नीतिगत रूप से हमने करीब 90% आत्मनिर्भरता हासिल कर ली थी, जो आज 40% से भी नीचे आ गई है। किसानों को तिलहन उत्पादन की तरफ ले जाने के बजाय हम आयात से जरूरत पूरी करते रहे। लेकिन 2022 में जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ तो खाद्य तेल की सप्लाई बाधित हुई और दाम बढ़ गए। अब ईरान- अमेरिका युद्ध के कारण एक बार फिर आपूर्ति बाधित हो रही है। ऐसी परिस्थितियों का सामना करने के लिए क्या तैयारी करनी चाहिए थी?
खाद्य तेल आयात पर निजी क्षेत्र का नियंत्रण है और उसमें लचीलापन ज्यादा है। यही कारण है कि दाम कुछ भी हो, यहां सप्लाई चेन नहीं बिगड़ी। यहां तक कि कोविड के समय भी नहीं। जहां तक कीमतों की बात है तो भारत ‘प्राइस टेकर’ है। दुनिया में दाम बढ़ते हैं तो भारत को भी ऊंचे दाम पर ही तेल खरीदना पड़ेगा। रुपया इतना कमजोर होने का भी असर है। आप कह सकते हैं कि आयातित महंगाई खाद्य तेल सेक्टर को प्रभावित कर रही है।
यहां एक और बात बताना चाहूंगा। 2000 के दशक के शुरुआती वर्षों में मैंने एक बार केंद्र सरकार के कृषि सचिव से पूछा कि आप लोग तिलहन की तरफ ध्यान क्यों नहीं देते? भारत में जिस रफ्तार से खपत बढ़ रही है, उत्पादन वृद्धि तो उसके आसपास भी नहीं है। इस पर उनका कहना था कि आप लोगों (निजी क्षेत्र) ने सप्लाई चेन को इतना अच्छा बना रखा है तो हम सोचते हैं कि इस पर ज्यादा ध्यान क्यों दें।
उस समय कमोडिटी के दाम भी बहुत कम थे। आज जो भाव 1200-1300 डॉलर प्रति टन है, वह उस समय 500-600 डॉलर प्रति टन की रेंज में था। पाम उत्पादन करने वाले मलेशिया और इंडोनेशिया को मार्केट चाहिए था, इसलिए वे बहुत प्रतिस्पर्धी दरों पर सप्लाई कर रहे थे। तो, उस समय नीति निर्माताओं ने तिलहन उत्पादन पर ध्यान नहीं दिया जिसका आज हमें खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।
आपने ऑयलसीड मिशन का जिक्र किया था, पर मुझे लगता है कि वह घोषणा ही रह गई। पाम उत्पादन के उद्देश्य से 5 साल के लिए करीब 11,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। यानी करीब 2,000 करोड़ साल के। मुझे लगता है कि इसका 70 प्रतिशत तो वेतन जैसे खर्चों में चला जाता होगा। पाम मिशन में भी फंडिंग इतनी कम है कि उसका कोई बड़ा प्रभाव दिखना मुश्किल है।
-हमारे आयात में पाम ऑयल की बड़ी हिस्सेदारी है। अब सूरजमुखी और सोयाबीन तेल का भी बड़े पैमाने पर आयात होने लगा है। हम यह मार्केट लैटिन अमेरिकी देशों, अमेरिका, कनाडा और यहां तक कि ऑस्ट्रेलिया को दे रहे हैं। लेकिन अब जो भू-राजनीतिक परिस्थिति बनी है, उसमें क्रूड ऑयल के दाम बढ़ रहे हैं। इसलिए पाम ऑयल उत्पादक देश इससे बायोडीजल बनाने लगे हैं। इससे इसकी सप्लाई में भी दिक्कत आएगी। इन सबका क्या असर देखते हैं?
देखिए, इंडोनेशिया में अभी बी40 चल रहा था, मतलब 40% पाम ऑयल को बॉयोडीजल में तब्दील कर उसे डीजल में मिलाना था। जब (पेट्रोलियम) क्रूड के दाम कम थे, तो सरकारी आदेश के जरिए ही इस ब्लेंडिंग को हासिल किया जाता था। अब क्रूड ऑयल के दाम इतने ऊंचे हो चुके हैं कि पाम से बना बायोडीजल प्रॉफिटेबल हो गया है। अब वहां की सरकार ने जुलाई से बी50 लागू करने की घोषणा कर मैंडेटरी कर दिया है। इसका मतलब है कि 15 से 20 लाख टन तेल बायोडीजल में डायवर्ट होगा। यही हाल मलेशिया का है। उसने 10% की जगह 15% ब्लेंडिंग की घोषणा की है।
अर्जेंटीना और ब्राजील का भी सोया ऑयल बायोडीजल बनाने में जा रहा है। इस समय दुनिया का 25 से 28 प्रतिशत खाद्य तेल एनर्जी में जा रहा। इसलिए अगर भारत आत्मनिर्भरता को तवज्जो नहीं देगा तो मौजूदा परिस्थिति बरकरार रहेगी। लेकिन तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए जो गंभीरता चाहिए, वह अभी तक नहीं आई है। पिछले साल 19.5 अरब डॉलर (160 लाख करोड़ रुपये) के खाद्य तेल का आयात हुआ। इस साल दाम बढ़े हुए हैं, तो कोई ताज्जुब नहीं कि हमारा खाद्य तेल आयात बिल 22 से 23 अरब डॉलर का हो जाए।
-आपने कहा कि 25 से 28 प्रतिशत खाद्य तेल का इस्तेमाल दूसरी जगहों पर होने लगा है। इधर रुपये की वैल्यू भी घटी है। एक डॉलर 96 रुपये के आस-पास पहुंच गया है। इन दोनों को मिलाकर कीमतों पर क्या असर आया है?
युद्ध से पहले और बाद की परिस्थितियों में प्रति टन 125 से 150 डॉलर का इंपैक्ट है। यह अंतर बड़ा है। थोक में जो तेल पहले 120 रुपये लीटर के आसपास हुआ करता था, वह 150 रुपये का हो गया है।
-चाहे सरसों हो या सोयाबीन, हमारी उत्पादकता वैश्विक औसत से बहुत कम है। यील्ड बढ़ाने में टेक्नोलॉजी का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए? इसी से जुड़ा सवाल है कि क्या हमें जीएम सरसों की अनुमति देनी चाहिए? सोयाबीन में भी हमने अभी तक जीएम की अनुमति नहीं दी है। एक समय कॉटन सीड ऑयल हमारा चौथा सबसे बड़ा स्रोत हो गया था, लेकिन अब कॉटन का उत्पादन भी गिरता जा रहा है। ऐसे में सरकार को क्या नीतिगत बदलाव करने चाहिए?
देखिए, आज भारत का कुल सोयाबीन उत्पादन 110 से 120 लाख टन के बीच है। इसकी यील्ड विश्व औसत की आधी भी नहीं है। सॉल्वेंट एक्स्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन ने तो सरकार से कहा है कि आप टेक्नोलॉजी को अपनाइए। अगर जीएम टेक्नोलॉजी से सोयाबीन उत्पादन में इजाफा हो सकता है तो वह क्यों ना किया जाए। आज आप जितना सोयाबीन तेल या कॉटन सीड ऑयल खा रहे हैं वह सारा जेनेटिकली मॉडिफाइड है। अमूल जैसी कंपनियों के जानवर जो कॉटन की खली खाते हैं, वह जेनेटिकली मॉडिफाइड है। दुनिया में आज नॉन-जीएम तो कहीं पर ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलता।
सरसों पर हमारे पास डॉ. दीपक पेंटल की जेनेटिकली मॉडिफाइड रिसर्च काफी जबरदस्त थी। उन्होंने बताया था कि इससे यील्ड में करीब 28% इजाफा होता है। लेकिन हम लोग आज तक उसको भी लागू नहीं कर सके। मेरा मानना है कि अगर हमने इसकी तरफ पर्याप्त ध्यान नहीं दिया तो स्थिति बद से बदतर होती चली जाएगी।
-अगर होर्मुज स्ट्रेट में स्थिति नहीं सुधरती है तो उर्वरकों की समस्या बरकरार रहेगी। इस बार सुपर अल नीनो की भी बात हो रही है। मानसून सामान्य से कम रहेगा। ऐसे में आप सरकार, किसान और कंज्यूमर के लिए क्या रणनीति बताना चाहेंगे?
देखिए, सुपर अल नीनो को मैं अभी ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहा हूं क्योंकि बारिश का भौगोलिक वितरण देखना ज्यादा जरूरी है। भारत में तिलहन की ज्यादातर खेती बारिश वाले इलाकों में होती है। अगर मध्य प्रदेश या महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बारिश ठीक-ठाक हो गई तो कोई तकलीफ नहीं होगी। ऐसा नहीं हुआ तो समस्या बढ़ेगी। जहां तक उर्वरकों का सवाल है तो मुझे लगता है कि इसकी कोई ज्यादा दिक्कत नहीं होगी, क्योंकि सरकार की तैयारी थी।
लेकिन मुझे लगता है रबी सीजन में ज्यादा दिक्कत होगी, जब सरसों की खेती होती है। सोयाबीन की तुलना में सरसों से ज्यादा तेल निकलता है। बारिश कम हुई तो मिट्टी में नमी कम होगी। प्रधानमंत्री ने लोगों से अपील की है कि तेल की खपत 10 प्रतिशत कम करें। मैं समझता हूं उसका भी थोड़ा असर होगा। मैं एक और बात बताना चाहूंगा कि भारत में खाद्य तेलों की खपत बढ़ने की रफ्तार थोड़ी कम हुई है। ऊंची कीमत और गर्मी की वजह से घरेलू खपत पर निश्चित रूप से असर पड़ा है। इसलिए हो सकता है कि इस साल आयात वृद्धि ज्यादा न हो।
सरसों उत्पादन बढ़ाने में इंडस्ट्री ने भी भूमिका निभाई है। जब हम लोगों ने देखा कि सरकार की तरफ से बहुत कम रिस्पॉन्स आ रहे हैं, तो सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन (एसईए) ने 6-7 साल पहले इंडस्ट्री में सबको तैयार किया और यील्ड बढ़ाने के लिए मस्टर्ड मिशन लॉन्च किया। उसका कुछ असर दिखने लगा है और सरसों की यील्ड बढ़ी है। सरसों उत्पादन 70 लाख टन से बढ़कर 120 लाख टन तक पहुंच गया है। अगर वह नहीं होता तो आज तेल के दाम शायद 200 रुपये होते।
-मौजूदा स्थिति में क्या दाम और बढ़ने की आशंका है?
बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि मध्य-पूर्व (ईरान) का युद्ध, यूक्रेन-रूस युद्ध की तरह खिंचता तो नहीं चला जाएगा। अगर यह लड़ाई खिंचती चली गई और क्रूड तथा फॉसिल फ्यूल्स के डिस्ट्रीब्यूशन में दिक्कतें बढ़ने लगीं, तो खाद्य तेलों के दाम में जो वृद्धि हुई है, उसके नीचे आने की गुंजाइश कम है। इसलिए भारत के उपभोक्ताओं को (थोक में) 150 रुपये का भाव सामान्य मान लेना चाहिए। अब 120-125 रुपये किलो वाला जमाना गया।
मैं एक और बात बताना चाहूंगा कि पाम उत्पादन में भी थोड़ा असर दिख रहा है। पाम उत्पादन चार लाख टन से बढ़कर छह लाख टन हुआ है। आपके माध्यम से मैं बोलना चाहूंगा कि सरकार जो भी नेशनल मिशन लॉन्च करती है, उसके लिए पर्याप्त फंड उपलब्ध कराना चाहिए। आयात पर वसूली जाने वाली कस्टम्स ड्यूटी की रकम को ऑयल सीड डेवलपमेंट में लगाना चाहिए, ताकि प्रधानमंत्री का जो सपना है आत्मनिर्भरता का, उस दिशा में थोड़ा बहुत तो काम हो।