फीड और एथेनॉल के कारण भारत में मक्का की मांग 2030-31 तक 44% बढ़कर 7.2 करोड़ टन पहुंचने का अनुमानः फिक्की-यस बैंक रिपोर्ट

फिक्की और यस बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत का मक्का क्षेत्र तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रहा है। वर्ष 2025-26 के 5 करोड़ टन से बढ़कर 2030-31 तक मक्का की मांग 7.2 करोड़ टन पहुंच सकती है। एथेनॉल ब्लेंडिंग, पोल्ट्री फीड और स्टार्च उद्योग मांग बढ़ाने वाले प्रमुख कारक होंगे। हालांकि उत्पादकता और भंडारण संबंधी चुनौतियां चिंता का विषय बनी रहेंगी।

भारत का मक्का क्षेत्र एक निर्णायक दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां एथेनॉल ब्लेंडिंग, पोल्ट्री फीड और औद्योगिक प्रसंस्करण से बढ़ती घरेलू मांग मक्का को पारंपरिक अनाज से रणनीतिक फसल में बदल रही है। उद्योग चैंबर फिक्की और यस बैंक की नई रिपोर्ट के अनुसार भारत में मक्का की मांग 2025-26 के लगभग 5 करोड़ मीट्रिक टन से बढ़कर 2030-31 तक 7.2 करोड़ टन तक पहुंच सकती है। इसका मुख्य कारण औद्योगिक खपत में तेजी और जैव-ईंधन में बढ़ती मांग है।

“मेज सेक्टर इन इंडिया - नेविगेटिंग ट्रांसफॉर्मेशन इन डिमांड-सप्लाई डायनेमिक्स” शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर भी मक्का दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण कृषि कमोडिटी में से एक बन चुका है। वर्ष 2025 में वैश्विक मक्का उत्पादन 1.26 अरब टन तक पहुंच गया और 2034 तक इसके लगभग 1.4 अरब टन तक पहुंचने का अनुमान है।

भारत सबसे तेजी से बढ़ती मक्का अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा

रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में भारत का मक्का उत्पादन लगभग दोगुना हो गया है। वर्ष 2015-16 में उत्पादन 2.257 करोड़ टन था, जो 2025-26 में बढ़कर लगभग 5 करोड़ टन हो गया। इसी अवधि में मक्का का रकबा 4.5% वार्षिक दर से बढ़ा, जबकि उत्पादन में 8.3% और उत्पादकता में 3.6% की वृद्धि हुई, जो कुल अनाज उत्पादन वृद्धि से कहीं अधिक है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि मक्का अब भारत के कुल खाद्यान्न उत्पादन में लगभग 14% योगदान देता है और देश के 27 राज्यों में लगभग 1.7 करोड़ किसान इसकी खेती करते हैं। यह चावल और गेहूं के बाद तीसरा सबसे बड़ा अनाज है। भारत में 90% से अधिक मक्का का उपयोग फीड, ईंधन और स्टार्च प्रसंस्करण जैसे औद्योगिक उद्देश्यों के लिए हो रहा है।

भारत वैश्विक स्तर पर मक्का के रकबे में चौथे और उत्पादन में पांचवें स्थान पर है। यह फसल देश में खरीफ, रबी और जायद तीनों मौसमों में उगाई जाती है। वर्ष 2025-26 में कुल रकबे का 72% और उत्पादन का 60% हिस्सा खरीफ सीजन का रहा।

एथेनॉल कार्यक्रम बदल रहा है मक्का की मांग का स्वरूप

मक्का की मांग में तेजी का सबसे बड़ा कारण सरकार का एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम बनकर उभरा है। रिपोर्ट के अनुसार एथेनॉल उत्पादन के लिए मक्का ने गन्ने और चावल को पीछे छोड़ते हुए प्रमुख फीडस्टॉक का स्थान हासिल कर लिया है। वर्ष 2024-25 में लगभग 1.25 करोड़ टन मक्का का उपयोग एथेनॉल उत्पादन में हुआ, जो इस क्षेत्र में इस्तेमाल कुल फीडस्टॉक का लगभग 50% था।

भारत ने जुलाई 2025 में 19.93% एथेनॉल ब्लेंडिंग हासिल कर ली। यह सरकार के E20 लक्ष्य के काफी करीब है। रिपोर्ट के अनुसार 2025-26 एथेनॉल सप्लाई ईयर में भारत का एथेनॉल उत्पादन 12 अरब लीटर तक पहुंच सकता है।

रिपोर्ट का अनुमान है कि अकेला एथेनॉल उद्योग 2030-31 तक 2 से 2.5 करोड़ टन मक्का की खपत करेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि एथेनॉल की प्रशासनिक कीमत तय करने, जीएसटी घटाने और अनाज आधारित डिस्टिलरी के लिए ब्याज सब्सिडी योजनाओं जैसे नीतिगत उपाय मक्का आधारित एथेनॉल उत्पादन में निवेश को बढ़ावा दे रहे हैं।

पोल्ट्री फीड उद्योग सबसे बड़ा उपभोक्ता

जैव-ईंधन के अलावा पोल्ट्री और पशुपालन क्षेत्र भारत में मक्का के सबसे बड़े उपभोक्ता बने हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुल मक्का खपत का लगभग 54% हिस्सा पशु आहार उद्योग का है, जिसमें 44% पोल्ट्री फीड और 10% पशुधन फीड के लिए उपयोग होता है।

पोल्ट्री फीड फॉर्मूलेशन में मक्का की हिस्सेदारी लगभग 60-65% रहती है क्योंकि इसमें एनर्जी वैल्यू अधिक होती है और यह पशु पोषण के लिए उपयुक्त है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पोल्ट्री, डेयरी और एक्वाकल्चर क्षेत्रों की तेज वृद्धि आने वाले वर्षों में मक्का की मांग को लगातार मजबूत बनाए रखेगी।

स्टार्च उद्योग भी मक्का का बड़ा उपभोक्ता है, जो हर साल लगभग 70 लाख टन मक्का इस्तेमाल करता है। खाद्य प्रसंस्करण, फार्मास्यूटिकल्स, कागज, टेक्सटाइल, चिपकने वाले पदार्थ और बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक क्षेत्रों से मांग तेजी से बढ़ रही है। ब्रेकफास्ट सीरियल, पॉपकॉर्न, स्नैक्स और रेडी-टू-ईट उत्पाद जैसे प्रोसेस्ड फूड सेगमेंट भी मक्का की खपत बढ़ा रहे हैं।

वैश्विक स्तर से अभी पीछे है भारत की उत्पादकता

तेज वृद्धि के बावजूद रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्पादकता के मामले में भारत अभी प्रमुख मक्का उत्पादक देशों से पीछे है। वर्ष 2025-26 में भारत की औसत उत्पादकता 3.7 टन प्रति हेक्टेयर रही, जबकि वैश्विक औसत 6.04 एमटी प्रति हेक्टेयर है।

केवल पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, बिहार और तेलंगाना जैसे कुछ राज्यों की उत्पादकता वैश्विक औसत के बराबर या उससे अधिक है। आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में क्रमशः 6.8 टन और 6.9 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादकता दर्ज की गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई राज्यों में वर्षा आधारित खेती, कम मशीनीकरण, कमजोर कीट प्रबंधन और उन्नत हाइब्रिड बीजों का सीमित उपयोग कम उत्पादकता के प्रमुख कारण हैं।

वैश्विक मक्का बाजार का लगातार विस्तार

वैश्विक स्तर पर अमेरिका 2025 में 38.53 करोड़ टन उत्पादन के साथ सबसे बड़ा मक्का उत्पादक बना हुआ है। इसके बाद चीन, ब्राजील, अर्जेंटीना और भारत का स्थान है। ये पांच देश मिलकर वैश्विक मक्का उत्पादन का लगभग 71% हिस्सा रखते हैं। रिपोर्ट के अनुसार 2034 तक वैश्विक मक्का खपत 1.4 अरब टन तक पहुंच सकती है, जिसमें सबसे बड़ा योगदान पशु आहार क्षेत्र का होगा। वैश्विक मक्का उपयोग में 50% से अधिक हिस्सा केवल फीड सेक्टर का रहने का अनुमान है।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार कुछ देशों तक केंद्रित है, जहां अमेरिका, ब्राजील और अर्जेंटीना निर्यात में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। वर्ष 2025 में वैश्विक मक्का निर्यात करीब 46.44 अरब डॉलर का रहा। रिपोर्ट में कहा गया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने ऊर्जा कीमतों को बढ़ाया है, जिससे वैश्विक स्तर पर एथेनॉल की मांग बढ़ी और परोक्ष रूप से मक्का की मांग को समर्थन मिला।

सप्लाई चेन की चुनौतियां बन सकती हैं बाधा

रिपोर्ट में कई संरचनात्मक चुनौतियों की पहचान की गई है, जो भारत में मक्का क्षेत्र के विस्तार को सीमित कर सकती हैं। मक्का की बड़ी खेती अब भी वर्षा आधारित है और जलवायु जोखिमों के प्रति संवेदनशील बनी हुई है। कटाई के बाद की व्यवस्थाएं भी कमजोर हैं, जहां वैज्ञानिक तरीके से सुखाने की सुविधाओं, भंडारण और नमी प्रबंधन का अभाव है।

एफ्लाटॉक्सिन प्रदूषण एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है, जिससे अनाज की गुणवत्ता, किसानों की आय और निर्यात प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो रही है। रिपोर्ट में बिखरी हुई सप्लाई चेन, असंगत गुणवत्ता मानकों और अपर्याप्त एग्रीगेशन सिस्टम को भी प्रमुख चिंता बताया गया है।

भारत का मक्का निर्यात भी घरेलू मांग और ऊंची कीमतों के कारण अस्थिर हो गया है। वर्ष 2025 में भारत ने 4.41 लाख टन मक्का का निर्यात किया, जिसकी कीमत 17.03 करोड़ डॉलर थी, जबकि आयात 2.60 लाख टन रहा, जिसका मूल्य 7.85 करोड़ डॉलर था।

‘नई मक्का क्रांति’ का रोडमैप

रिपोर्ट में मक्का क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए पांच प्रमुख सुझाव दिए गए हैं। इनमें हाइब्रिड बीजों और मशीनीकरण के जरिए उत्पादकता बढ़ाना, वैज्ञानिक तरीके से सुखाने और भंडारण सुविधाओं का विस्तार, एफ्लाटॉक्सिन प्रबंधन और गुणवत्ता परीक्षण को मजबूत करना, उद्योगों के लिए कच्चे माल की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करना और खाद्य-फीड-ईंधन नीतियों में बेहतर तालमेल स्थापित करना शामिल है।

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारत “नई मक्का क्रांति” के मुहाने पर खड़ा है, लेकिन दीर्घकालिक सफलता के लिए सार्वजनिक और निजी निवेश, वैज्ञानिक नवाचार और मजबूत बाजार संपर्कों की आवश्यकता होगी, ताकि किसान हित, औद्योगिक मांग और ऊर्जा सुरक्षा के बीच संतुलन बनाया जा सके।