भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) में बीमा कंपनियों के रेगुलेटरी प्रबंधन व्यय (Expense of Management - EoM) की गणना में महत्वपूर्ण बदलाव का प्रस्ताव दिया है। IRDAI ने पिछले हफ्ते जारी परामर्श पत्र री-कैलिब्रेटिंग इकोनॉमिक्स ऑफ इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन (Recalibrating Economics of Insurance Distribution) में कहा है कि PMFBY में बीमा कंपनियों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिली है। नियामक के अनुसार, यह प्रतिस्पर्धा फसल बीमा जैसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता वाले कारोबार के लिए स्पष्ट अंडरराइटिंग रणनीति की बजाय EoM संबंधी अनुपालन जरूरतों को पूरा करने से अधिक प्रेरित रही है।
नियामक ने PMFBY के तहत कुछ राज्य सरकारों द्वारा अपनाए गए “कप एंड कैप” मॉडल के प्रभाव को विशेष रूप से रेखांकित किया है। इस व्यवस्था में बीमा कंपनियां आक्रामक बोली लगा सकती हैं, क्योंकि उनकी अधिकतम देनदारी प्रीमियम के 130 प्रतिशत तक सीमित रहती है। IRDAI ने कहा कि इस तरह का आक्रामक मूल्य निर्धारण प्रणालीगत जोखिम पैदा कर सकता है। मौजूदा समय में चरम मौसम घटनाओं में बढ़ोतरी के बीच यदि ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं, तो राज्य सरकारों को काफी अधिक जोखिम का सामना करना पड़ सकता है। नियामक ने यह भी चेतावनी दी कि इसका प्रतिकूल असर किसानों पर पड़ सकता है।
इसी पृष्ठभूमि में IRDAI ने प्रस्ताव दिया है कि PMFBY के तहत अर्जित सकल प्रीमियम का केवल एक-तिहाई हिस्सा EoM की गणना के लिए ग्रॉस डायरेक्ट प्रीमियम इनकम (GDPI) माना जाए। यह प्रस्ताव नियामक के इस आकलन पर आधारित है कि PMFBY में बीमा कंपनियों का ग्राहक जोड़ने का खर्च (acquisition cost) प्रीमियम के अनुपात में नहीं होता। IRDAI के अनुसार, EoM की गणना में सकल प्रीमियम के केवल एक-तिहाई को GDPI मानने से बीमा कंपनियों को पर्याप्त प्रोत्साहन मिलेगा।
प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य गंभीर बीमा कंपनियों की भागीदारी को बढ़ावा देना और एक्चुरियल प्राइसिंग की ओर लौटना भी है। इसमें प्रीमियम को बीमा जोखिम के वास्तविक स्तर के साथ जोड़ा जाता है। IRDAI का परामर्श पत्र फिलहाल हितधारकों की टिप्पणियों और सुझावों के लिए खुला है। टिप्पणियां और फीडबैक जमा करने की अंतिम तिथि 25 अक्टूबर 2026 है।