पश्चिम एशिया में ईरान युद्ध से पैदा हुए संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लगातार दो दिनों तक देशवासियों से किफायत बरतने की अपील ने अर्थव्यवस्था को लेकर नई चिंताओं को जन्म दे दिया है। पेट्रोल-डीजल कम इस्तेमाल करने, विदेश यात्राएं टालने, सोने के गहने नहीं खरीदने और आयातित वस्तुओं की खपत घटाने की सलाह को सरकार की बढ़ती आर्थिक बेचैनी से जोड़कर देखा जा रहा है। दरअसल, युद्ध के बाद कच्चे तेल, गैस और उर्वरकों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज उछाल आया है, जबकि रुपया कमजोर होने से इनका आयात और महंगा हो गया है। विशेषज्ञों को आशंका है कि आने वाले महीनों में महंगाई बढ़ सकती है, विकास दर पर दबाव पड़ सकता है और सरकार का राजस्व लक्ष्य भी प्रभावित हो सकता है। विभिन्न एजेंसियों ने ऊंची महंगाई, बढ़ते चालू खाता घाटे और धीमी जीडीपी ग्रोथ की चेतावनी देना शुरू कर दिया है। इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि स्वदेशी अपनाने और किफायत बरतने की अपील तभी लाभदायक होगी जब दीर्घकालिक नीति बनाकर उस पर अमल किया जाए।
क्या कहा प्रधानमंत्री ने
पहले 10 मई को हैदराबाद में, और फिर 11 मई को वडोदरा में प्रधानमंत्री ने देशवासियों से यह अपील की। पश्चिम एशिया संकट का जिक्र करते हुए उन्होंने लोगों से पेट्रोल-डीजल का उपयोग कम करने, कार पूलिंग करने, शहरों में मेट्रो ट्रेन का इस्तेमाल करने, सड़क के बजाय रेलमार्ग से सामान भेजने और कोरोना काल की तरह वर्क फ्रॉम होम, वर्चुअल मीटिंग और स्कूलों में ऑनलाइन क्लास की व्यवस्था फिर से शुरू करने का आग्रह किया। उन्होंने एक साल तक विदेश न घूमने, विदेश में डेस्टिनेशन वेडिंग न करने और यहां तक कि सोने के गहने नहीं खरीदने की भी अपील की।
भारत 90 प्रतिशत पेट्रोलियम पदार्थों के लिए आयात पर निर्भर है। ढाई महीने से जारी पश्चिम एशिया संकट के कारण कच्चा तेल करीब 50 प्रतिशत महंगा हो गया है। देश में जितने नए सोने की (रिसाइक्लिंग के अलावा) खपत होती है, वह लगभग पूरा आयात होता है। खाने के तेल, दाल और उर्वरकों के लिए भी काफी हद तक भारत आयात पर निर्भर है। हर साल 400 लाख टन यूरिया खपत में से 100 लाख टन की आपूर्ति आयात से होती है। डीएपी तो लगभग पूरा आयात होता है। उर्वरक बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के लिए भी हम बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का बयान अर्थव्यवस्था को लेकर सरकार की चिंता को दर्शाता है। हालात जल्दी नहीं सुधरे तो विकास दर घटने और महंगाई बढ़ने का अंदेशा है। एफएमसीजी कंपनियां एक बार अपने उत्पादों के दाम बढ़ा चुकी हैं। अब वे दूसरे दौर की मूल्यवृद्धि की तैयारी कर रही हैं।
महंगाई बढ़ने और जीडीपी ग्रोथ घटने का डर
रिसर्च फर्म क्रिसिल इंटेलिजेंस ने अपनी नई रिपोर्ट में महंगाई बढ़ने और जीडीपी ग्रोथ घटने की बात कही है। इसका कहना है कि पश्चिम एशिया में दो महीने से भी ज्यादा समय से तनाव के कारण आर्थिक जोखिम बढ़ते जा रहे हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य लगभग बंद है और इसका असर सप्लाई चेन और ट्रेड पर दिख रहा है। यह रूट खुलने के बाद भी तेल और गैस की सप्लाई सामान्य होने में समय लगेगा, क्योंकि इनके इंफ्रास्ट्रक्चर को युद्ध में काफी नुकसान हुआ है।
क्रिसिल ने ब्रेंट क्रूड की कीमत वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान 90 से 95 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान जताया है। इसका पिछला अनुमान 82 से 87 डॉलर प्रति बैरल का था। वर्ष 2025-26 के मुकाबले तो यह कीमत 32% अधिक होगी। अर्थात अगर आयात की मात्रा नहीं घटी तो क्रूड आयात बिल कम से कम एक-तिहाई बढ़ जाएगा। यही नहीं, क्रिसिल ने आने वाले समय में जोखिम और बढ़ने का अंदेशा जताया है।
इसका आकलन है कि इस साल खुदरा महंगाई आरबीआई के 4% के लक्ष्य से अधिक, 5.1% रहेगी। वर्ष 2025-26 में खुदरा महंगाई औसतन दो प्रतिशत थी। चालू खाते का घाटा (CAD) भी पिछले वर्ष के 0.8% की तुलना में 2.5% तक पहुंचने का अनुमान है। इन वजहों से क्रिसिल ने वर्ष 2026-27 के लिए जीडीपी ग्रोथ का अनुमान घटाकर 6.6% कर दिया है। वर्ष 2025-26 में भारत की विकास दर 7.6% रहने का सरकार का अनुमान है।
क्रूड आयात और तेल कंपनियों पर प्रभाव
भारत की सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल को लेकर है। आयात बिल में सबसे बड़ा हिस्सा इसी का है। पिछले तीन साल के आंकड़ों पर गौर करें तो आयात की मात्रा 24 करोड़ टन के आसपास स्थिर है। लेकिन कीमतों में उतार-चढ़ाव और डॉलर के मुकाबले रुपये की वैल्यू बदलने से आयात बिल में फर्क दिखता है। ईरान युद्ध से पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था, जो युद्ध के बाद लगातार 100 डॉलर या उससे ऊपर चल रहा है। अगर दाम इसी स्तर पर बने रहे तो 11 लाख करोड़ रुपये के आसपास रहने वाला कच्चा तेल आयात बिल काफी बढ़ सकता है।
कच्चे तेल के अलावा भारत एलपीजी का भी बड़े पैमाने पर आयात करता है। इसका वर्ष 2023-24 में 86,361 करोड़ रुपये, 2024-25 में 105,679 करोड़ रुपये और 2025-26 में 99,243 करोड़ रुपये का आयात हुआ।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने के बावजूद पेट्रोल-डीजल के खुदरा दाम नहीं बढ़े हैं। कहा जा रहा है कि इससे सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को बहुत नुकसान हो रहा है। लेकिन यहां इस तथ्य को भी जानना जरूरी है कि वित्त वर्ष 2024-25 में सार्वजनिक क्षेत्र की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOCL), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियिम कॉरपोरेशन (HPCL) को 36,522 करोड़ रुपये का मुनाफा (स्रोतः बीएसई) हुआ। खनन कंपनियों में ओएनजीसी को 2024-25 में 35,610 करोड़ और ऑयल इंडिया को 6,114 करोड़ रुपये का प्रॉफिट हुआ था। वर्ष 2025-26 के पहले नौ महीने (अप्रैल-दिसंबर) के दौरान तीनों ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को करीब 57,788 करोड़ रुपये का प्रॉफिट हुआ है। इस दौरान ओएनजीसी और ऑयल इंडिया का प्रॉफिट 28,909 करोड़ रुपये रहा है।
बिना सोना कैसे होगी शादी
भारत के आयात बिल में सोना दूसरे स्थान पर आता है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार वर्ष 2022 में भारत ने 36.5 अरब डॉलर के गोल्ड बार का आयात किया गया था। यह 2023 में बढ़कर 42.6 अरब डॉलर और 2025 में 58.9 अरब डॉलर हो गया। प्रधानमंत्री ने लोगों से एक साल तक सोने के गहने नहीं खरीदने की अपील की है। देश में हर साल होने वाली लाखों शादियों में लोग अपनी हैसियत के अनुसार कम या अधिक गहने खरीदते हैं। कुछ तो पुराने सोने की रीसाइक्लिंग होती है और कुछ नए गहने खरीदे जाते हैं। भारत में नए सोने की डिमांड आयात से ही पूरी होती है। सवाल है कि क्या बिना किसी गहने के भारत में शादी हो सकती है? और फिर हजारों छोटी-बड़ी ज्वैलरी दुकानों और उनके कर्मचारियों का क्या होगा?
उर्वरक सब्सिडी का बढ़ना तय
रासायनिक उर्वरकों का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि “इससे धरती को बहुत नुकसान हो रहा है। इसलिए जरूरी है कि हम केमिकल फर्टिलाइजर की खपत आधी कर दें और प्राकृतिक खेती की तरफ बढ़ें।” उन्होंने कहा कि “फर्टिलाइजर (यूरिया) की एक बोरी दुनिया में 3000 रुपये में बिक रही थी। भारत के किसानों को वही बोरी 300 रुपये से भी कम में दी जा रही है।” ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान फरवरी तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमत 500 डॉलर प्रति टन से नीचे ही रही, लेकिन ईरान युद्ध शुरू होने के बाद इसके दाम 700 डॉलर तक पहुंच गए।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढ़ने के कारण उर्वरक सब्सिडी भी बढ़ना तय है। यह सब्सिडी कोविड वाले साल 2020-21 में 1.28 लाख करोड़ रुपये की थी, जो 2022-23 में बढ़कर रिकॉर्ड 2.51 लाख करोड़ हो गई। वर्ष 2025-26 में उर्वरक सब्सिडी 1.86 लाख करोड़ थी और ईरान युद्ध से पहले 1 फरवरी को पेश आम बजट में 2026-27 के दौरान इसके 1.70 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया था। मौजूदा हालात में यह राशि काफी बढ़ सकती है।

प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया है कि “युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में पेट्रोल, डीजल, गैस और फर्टिलाइजर के दाम बहुत अधिक बढ़ चुके हैं। भारत में नागरिकों पर बोझ न पड़े, इसलिए सरकार सारा बोझ खुद उठा रही है।” लेकिन इसके साथ उन्होंने यह भी कहा कि “जब सप्लाई चेन पर लगातार संकट बना रहे, तो हम कितने भी उपाय कर लें, मुश्किलें बढ़ती ही जाती हैं।” उनके इस बयान को जल्दी दाम बढ़ने का संकेत भी माना जा रहा है।
आयात पर निर्भरता कैसे कम होगी
दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के सीनियर प्रोफेसर डॉ. सुरेंद्र कुमार ने रूरल वॉयस से कहा, प्रधानमंत्री के बयान को दो हिस्से में देखा जाना चाहिए। स्वदेशी अपनाने की अपील किफायत बरतना नहीं है। इससे घरेलू निर्माण क्षमता बढ़ेगी। 1991 में जब आर्थिक सुधार लागू हुए तो आयात पर निर्भरता भी बढ़ी। घरेलू क्षमता में उतना इजाफा नहीं हुआ। आज हम किसी भी वस्तु के मामले में नहीं कह सकते कि पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं। थोड़े समय के आर्थिक फायदे का हमें नुकसान भी होता है, क्योंकि दूसरे देश इसका फायदा उठाते हैं। जैसे कोविड के समय चीन ने इस निर्भरता का दुरुपयोग किया, अमेरिका समय-समय पर प्रतिबंध लगाता रहता है। स्वदेशी का प्रयोग बढ़ने से घरेलू मैन्युफैक्चरिंग बढ़ेगी, लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि घरेलू कंपनियां संरक्षित ना हों। हमें ऐसी नीति बनानी होगी जिससे उनके उत्पाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी भी हों।
डॉ. सुरेंद्र के अनुसार, पश्चिम एशिया पर ऊर्जा के मामले में हमारे निर्भरता बहुत अधिक है। हमारा करीब एक-चौथाई व्यापार भी इसी रास्ते से होता है। हम इलेक्ट्रिफिकेशन पर जोर दे सकते हैं क्योंकि हमारे पास कोयला प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों की तर्ज पर हमने आपूर्ति बढ़ाने वाली नीति आपनाई है, मांग की अनदेखी की है। हमें मांग बढ़ाने के उपाय करने होंगे। इसके अलावा घरेलू पूंजी का इंतजाम भी करना होगा जो बचत से आएगी। हम सिर्फ बाहरी पूंजी पर निर्भर नहीं रह सकते हैं।