ईरान और इजरायल-अमेरिका युद्ध (Iran War) ने वैश्विक कृषि आपूर्ति श्रृंखला के लिए गंभीर चिंता उत्पन्न कर दी है। कच्चा तेल और गैस के साथ उर्वरकों के दाम भी तेजी से बढ़ रहे हैं। यदि यह संकट लंबा खिंचता है तो इसका असर खाद्य उत्पादन, कीमतों और वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर व्यापक रूप से पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कीटनाशक उत्पादन की लागत 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।
क्रॉप लाइफ इंडिया के चेयरमैन और क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लि. के एक्जीक्यूटिव चेयरमैन और एमडी अंकुर अग्रवाल ने बताया कि युद्ध के कारण जो शिपिंग रूट बाधित हुआ है, उससे कीटनाशकों के उत्पादन की लागत 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। फलस्वरूप किसानों की लागत भी बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि इस व्यवधान के कारण महत्वपूर्ण कृषि सीजन में कीटनाशकों की कमी भी हो सकती है। इसका असर उत्पादकता और गुणवत्ता पर होगा।
रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। आईजीसी की गुरुवार को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, यह दुनिया के लगभग 25% तेल और 20% एलएनजी निर्यात का प्रमुख मार्ग है। इसके अलावा, यह क्षेत्र उर्वरक उत्पादन और व्यापार का भी बड़ा केंद्र है। यहां से वैश्विक यूरिया का करीब 35% और अमोनिया का लगभग 30% निर्यात होता है। मौजूदा हालात में शिपिंग बाधाएं और कुछ उत्पादन इकाइयों के बंद होने से उर्वरक कीमतों में तेज वृद्धि देखी जा रही है।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और अन्य एजेंसियों के अनुसार, यह जलडमरूमध्य वैश्विक स्तर पर व्यापार होने वाले लगभग 30% उर्वरकों के परिवहन के लिए भी अहम है। कुछ आकलनों में युद्ध के कारण 65% से 70% तक यूरिया आपूर्ति पर खतरे की आशंका जताई गई है। उर्वरकों की कीमतें पहले ही 30% से 40% तक बढ़ चुकी हैं, जिससे खेती की लागत में बड़ा इजाफा हो रहा है।
हालांकि उत्तरी गोलार्ध के अधिकांश अनाज और तिलहन उत्पादक देशों ने अगली बुवाई के लिए पर्याप्त उर्वरक भंडारण रखा है, लेकिन एशिया और अफ्रीका के अनेक देश खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर हैं। यदि संकट लंबा चला, तो इन क्षेत्रों में बुवाई के फैसलों पर असर पड़ सकता है। उर्वरकों की कमी या ऊंची कीमतों के कारण किसानों को उर्वरक उपयोग घटाना पड़ सकता है, जिससे फसल उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
ऊर्जा कीमतों में भी तेज उछाल आया है। वैश्विक तेल और गैस की कीमतें युद्ध से पहले की तुलना में लगभग 50% बढ़ चुकी हैं। इसका सीधा असर कृषि उत्पादन, परिवहन और आपूर्ति लागत पर पड़ रहा है। नाइट्रोजन-आधारित उर्वरकों पर निर्भर गेहूं और मक्का जैसी प्रमुख फसलें सबसे पहले प्रभावित हो सकती हैं, जिससे खाद्य श्रृंखला पर व्यापक असर पड़ेगा। पशु चारा महंगा होने से डेयरी और मांस उत्पादों की कीमतों में भी वृद्धि की संभावना है।
यह संकट खाद्य सुरक्षा की क्षेत्रीय कमजोरियों को भी उजागर कर रहा है। फारस की खाड़ी क्षेत्र में हर महीने औसतन 20 लाख टन अनाज, तिलहन और संबंधित उत्पादों की आपूर्ति होती है। हालांकि यह वैश्विक व्यापार का केवल 3% है, लेकिन खाड़ी देशों की आयात पर निर्भरता बहुत अधिक है। होर्मुज मार्ग के बाधित होने से वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग सीमित हो गए हैं, हालांकि कुछ हद तक रेड सी या कैस्पियन सागर के रास्ते पुनः मार्ग निर्धारण संभव है। स्थानीय भंडार अल्पकालिक राहत दे सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक व्यवधान रहने पर खाद्य आपूर्ति संकट गहरा सकता है।
विकासशील देशों पर इसका असर अधिक गंभीर हो सकता है, जहां खुदरा महंगाई में खाद्य और ईंधन की हिस्सेदारी 30% से 50% तक होती है, जबकि विकसित देशों में यह 25% से कम रहती है। इससे इन अर्थव्यवस्थाओं में बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है। केन्या में उर्वरक कीमतें पहले ही करीब 40% तक बढ़ चुकी हैं। इसके विपरीत, लैटिन अमेरिका के कुछ देश अपेक्षाकृत कम प्रभावित हैं, हालांकि वहां भी आपूर्ति बाधाओं की आशंका बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि 2022 के यूक्रेन संकट के विपरीत, इस बार सीधा असर अनाज निर्यात पर नहीं बल्कि उर्वरकों और ऊर्जा लागत के माध्यम से उत्पादन पर पड़ेगा। इससे खाद्य महंगाई की दूसरी लहर देखने को मिल सकती है। हाल के वर्षों में वैश्विक खाद्य महंगाई में कमी आई थी और जनवरी में यह 2017 के बाद के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई थी, लेकिन मौजूदा संकट इस परिस्थिति को उलट सकता है।
यदि यह संकट कुछ सप्ताह से अधिक समय तक जारी रहता है, तो वैश्विक स्तर पर बुवाई, उत्पादन और खाद्य आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा और महंगाई दोनों पर दीर्घकालिक दबाव बनने की आशंका है।