अल नीनो का प्रभाव अब स्पष्ट दिखने लगा है। देश का आधा से अधिक इलाका सूखे की चपेट में आ गया है। कुछ इलाकों में तो मानसून की बारिश की कमी 50 प्रतिशत से अधिक हो गई है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, बिहार के अलावा दक्षिण भारत के सभी राज्य इसका असर झेल रहे हैं। उत्तर पूर्व में भी नगालैंड, मिजोरम और त्रिपुरा को छोड़ बाकी चारों राज्य इससे प्रभावित हैं। बारिश में कमी का असर खरीफ की फसलों पर हो रहा है। धान के अलावा तिलहन, गन्ना और कपास का रकबा पिछले साल से कम है। जो फसलें खेत में हैं, उनमें भी बारिश की कमी के कारण उत्पादन प्रभावित होने का संकट है।
सूखे की निगरानी करने वाले आईआईटी गांधीनगर के इंडिया ड्रॉट मॉनिटर के अनुसार 9 सितंबर तक देश का 53.2 प्रतिशत क्षेत्र सूखे की चपेट में आ गया था। सप्ताह भर पहले यह 46 प्रतिशत था। बड़े राज्यों में आंध्र प्रदेश में यह आंकड़ा 90 प्रतिशत, तेलंगाना में 86.2 प्रतिशत और महाराष्ट्र में 85.2 प्रतिशत है।
ड्रॉट मॉनिटर के अनुसार सूखे की स्थिति।
क्षेत्रवार देखें तो उत्तर भारत का 40 प्रतिशत और उत्तर पश्चिम भारत का 45 प्रतिशत इलाका इस समय सूखे से प्रभावित है। मध्य भारत में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है जहां सिर्फ 39 प्रतिशत क्षेत्र में सूखे का प्रभाव है। लेकिन पश्चिमी और दक्षिणी क्षेत्र में क्रमशः 82 प्रतिशत और 70 प्रतिशत इलाके सूखाग्रस्त हैं। पूर्वी भारत का 45 प्रतिशत और उत्तर-पूर्व का 64 प्रतिशत क्षेत्र इसकी चपेट में है।
मौसम विभाग के अनुसार इस वर्ष अभी तक मानसून की बारिश दक्षिणी राज्यों में सामान्य से 28 प्रतिशत, पूर्वी और उत्तर-पूर्वी राज्यों में 25 प्रतिशत, उत्तर-पश्चिम में 10 प्रतिशत और मध्य भारत में सामान्य से 6 प्रतिशत कम हुई है। पूरे देश स्तर पर यह कमी 15 प्रतिशत है। विभाग के मुताबिक 19 सितंबर से पश्चिमी राजस्थान से मानसून की वापसी भी शुरू हो जाएगी। हालांकि विभाग ने इस सप्ताह के अंत में तमिलनाडु और केरल में अच्छी बारिश की संभावना जताई है।
राज्यवार देखें तो पंजाब में बारिश की कमी सामान्य से 40 प्रतिशत, हरियाणा में 23 प्रतिशत, राजस्थान में 25 प्रतिशत, कर्नाटक में 30 प्रतिशत, तेलंगाना में 20 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 42 प्रतिशत, तमिलनाडु में 23 प्रतिशत, केरल में 27 प्रतिशत और बिहार में सामान्य से 36 प्रतिशत कम है। उत्तर-पूर्व में भी असम में मानसून की बारिश सामान्य से 26 प्रतिशत, अरुणाचल प्रदेश में 42 प्रतिशत, मणिपुर में 43 प्रतिशत और मेघालय में 59 प्रतिशत कम है।

मौसम विभाग के अनुसार बारिश की स्थिति। नीले रंग का अर्थ बारिश सामान्य से अधिक, हरे रंग का अर्थ सामान्य की तुलना में -19% से 19%, लाल रंग का अर्थ सामान्य से 20-59% कम और पीले रंग का अर्थ 60% से अधिक।
बारिश में इस कमी का असर खरीफ फसलों पर साफ है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के उपज पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, धान की बुवाई पिछले साल से 3.82 प्रतिशत कम हुई है। दलहन में उड़द को छोड़ बाकी का रकबा या तो पिछले साल के लगभग बराबर है या कम हो गया है। मोटे अनाजों का रकबा पिछले साल से मामूली अधिक है, जबकि तिलहन के रकबे में कमी आई है। तिलहन की प्रमुख फसलों सोयाबीन और मूंगफली दोनों के रकबे में गिरावट है। सोयाबीन का रकबा बीते वर्ष से 0.8 प्रतिशत और मूंगफली का 0.42 प्रतिशत कम है।
गन्ने का रकबा भी खरीफ 2025-26 के मुकाबले 0.69 प्रतिशत और कपास का 0.88 प्रतिशत कम है। खरीफ की सभी फसलों का रकबा पिछले साल से 1.44 प्रतिशत नीचे है।
बारिश में कमी का असर सबसे अधिक धान की फसल पर पड़ने के आसार हैं। पिछले कई हफ्तों के दौरान पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में बारिश बहुत कम हुई है, जहां धान की बड़े पैमाने पर खेती होती है। रकबा और बारिश, दोनों की कमी के कारण इस वर्ष चावल का उत्पादन भी घटने की आशंका बन गई है। सीजन की शुरुआत में किसानों को उर्वरकों की कमी का भी सामना करना पड़ा था।
धान के अलावा खरीफ की दूसरी फसलों के भी प्रभावित होने की आशंका है। महाराष्ट्र के वर्षा-आश्रित कुछ इलाकों में तो किसानों द्वारा सोयाबीन की फसल को ट्रैक्टर चलाकर नष्ट करने की खबरें आई हैं।