तीन दिन देरी से केरल पहुंचा दक्षिण-पश्चिम मानसून; मौसम विभाग का दिल्ली में भी बारिश का येलो अलर्ट

दक्षिण-पश्चिम मानसून 4 जून को केरल पहुंच गया, जो सामान्य तिथि से तीन दिन देर है। केरल के कई हिस्सों में भारी बारिश हो रही है। हालांकि मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि इस वर्ष मानसूनी वर्षा दीर्घकालिक औसत (एलपीए) के केवल 90 प्रतिशत रहने की आशंका है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने गुरुवार, 4 जून को केरल में दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन की पुष्टि कर दी। इसके साथ ही देश के लिए महत्वपूर्ण चार महीने के वर्षा काल की औपचारिक शुरुआत हो गई। मानसून इस वर्ष सामान्य आगमन तिथि 1 जून की तुलना में तीन दिन देर से पहुंचा। हालांकि आईएमडी ने पहले इसके 26 मई तक केरल पहुंचने का अनुमान जताया था।

इस बीच, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी मौसम विभाग ने बारिश का लिए येलो अलर्ट जारी किया है। गुरुवार को दिल्ली का न्यूनतम तापमान 29.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जबकि अधिकतम तापमान 38 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहने का अनुमान है।

आईएमडी के अनुसार मानसून ने केरल और माहे, लक्षद्वीप, कर्नाटक और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों, कोमोरिन क्षेत्र के शेष भागों तथा अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के कई क्षेत्रों में आगे बढ़त दर्ज की है। मानसून के आगमन के साथ ही केरल के कई हिस्सों में व्यापक वर्षा दर्ज की गई। बुधवार रात से हुई भारी बारिश के बाद आईएमडी ने अलप्पुझा, कोट्टायम और एर्नाकुलम जिलों के लिए तीन घंटे का ऑरेंज अलर्ट जारी किया। विभाग ने इन क्षेत्रों में तेज वर्षा और स्थानीय स्तर पर व्यवधान की आशंका जताई है।

मानसून का आगमन देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि भारत की लगभग 70 प्रतिशत वार्षिक वर्षा इसी अवधि में होती है। कृषि उत्पादन, जल संसाधन, ग्रामीण आय और समग्र आर्थिक गतिविधियां काफी हद तक मानसून के प्रदर्शन पर निर्भर करती हैं।

हालांकि, मानसून के आगमन के साथ ही पूरे सीजन में इसके प्रदर्शन को लेकर चिंताएं भी बनी हुई हैं। पिछले सप्ताह आईएमडी ने अपने पूर्वानुमान में संशोधन करते हुए कहा था कि जून से सितंबर के दौरान देश में दीर्घकालिक औसत (एलपीए) का लगभग 90 प्रतिशत वर्षा होने की संभावना है।

देश के लिए 1971-2020 की अवधि के आधार पर मौसमी वर्षा का दीर्घकालिक औसत 87 सेंटीमीटर है। आईएमडी के अनुसार यदि मानसूनी वर्षा एलपीए के 90 प्रतिशत से कम रहती है, तो उसे “सामान्य से कम” या “डिफिशिएंट” श्रेणी में रखा जाता है।

मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि वर्षा में संभावित कमी का एक प्रमुख कारण अल नीनो परिस्थितियों का विकसित होना हो सकता है। आईएमडी के अनुसार वर्तमान में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ईएनएसओ) की स्थिति धीरे-धीरे अल नीनो की ओर बढ़ रही है, जिसका संबंध आमतौर पर भारत में कमजोर मानसून से माना जाता है।

मौसम विभाग का अनुमान है कि जून में अल नीनो का प्रभाव कमजोर रहेगा, लेकिन सितंबर तक इसके मध्यम से मजबूत स्तर तक पहुंचने की संभावना है। इससे मानसून के अंतिम चरण में वर्षा वितरण प्रभावित हो सकता है।