राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ने देश के 28 और पारंपरिक उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication-GI) पंजीकरण दिलाने में सहायता की है। इससे भारत की पारंपरिक शिल्प विरासत को कानूनी संरक्षण मिलने के साथ-साथ ग्रामीण कारीगरों और उत्पादकों के लिए आजीविका के नए अवसर सृजित होंगे। इन नए उत्पादों के शामिल होने के बाद नाबार्ड अब तक देशभर में 176 उत्पादों को जीआई पंजीकरण दिलाने में सहयोग कर चुका है।
नए जीआई पंजीकृत उत्पादों में भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जुड़े हस्तशिल्प, हथकरघा वस्त्र, बांस शिल्प, धातु शिल्प, मिट्टी कला, चित्रकला और पारंपरिक वाद्य यंत्र शामिल हैं। जीआई पंजीकरण से इन उत्पादों को बाजार में अलग पहचान मिलेगी, उनकी नकल पर रोक लगेगी और घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उनका व्यावसायिक मूल्य बढ़ेगा।
नवीनतम जीआई पंजीकरण प्राप्त करने वाले उत्पादों में बिहार की नालंदा बावनबूटी साड़ी एवं फैब्रिक्स और गया पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट, झारखंड की कुचाई सिल्क साड़ी एवं फैब्रिक्स, असम का बा शिल्प (बांस शिल्प) और बिहू पेपा, हिमाचल प्रदेश का वुड कार्विंग क्राफ्ट तथा मध्य प्रदेश का खजुराहो मेटल क्राफ्ट सहित देश के विभिन्न राज्यों के कई पारंपरिक उत्पाद शामिल हैं।
नाबार्ड के अध्यक्ष डॉ. शाजी कृष्णन वी. ने कहा कि जीआई पंजीकरण पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा, स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा देने और ग्रामीण उत्पादकों के लिए मूल्य सृजन का प्रभावी माध्यम है। उन्होंने कहा कि नाबार्ड उत्पादक समूहों के संगठन, कौशल विकास, उद्यम प्रोत्साहन, ब्रांडिंग, बाजार संपर्क और निर्यात सुविधा के माध्यम से जीआई आधारित मूल्य श्रृंखलाओं को और मजबूत करता रहेगा, ताकि भारत की पारंपरिक विरासत को स्थायी आर्थिक अवसरों में बदला जा सके।
नाबार्ड के अनुसार, जीआई आधारित पहल के माध्यम से अब तक 13,000 से अधिक कारीगरों और उत्पादकों को उच्च मूल्य वाले घरेलू बाजारों से जोड़ा गया है। वहीं, नाबार्ड समर्थित जीआई मूल्य श्रृंखलाओं और संबंधित उद्यमों के जरिए 50,000 से अधिक प्रत्यक्ष रोजगार सृजित हुए हैं। जीआई उत्पादों के उत्पादन और मार्केटिंग को बढ़ावा देने के लिए वर्तमान में 14 ग्रामीण उद्यम उत्पादक संगठन (REPOs) मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक और गुजरात में सक्रिय हैं।
जीआई पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए नाबार्ड ने अहमदाबाद स्थित एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (EDII), बिहार कृषि विश्वविद्यालय तथा तमिलनाडु के मदुरै एग्री बिजनेस इन्क्यूबेशन फोरम (MABIF) में जीआई फैसिलिटेशन सेंटर स्थापित करने में भी सहयोग दिया है। ये केंद्र जीआई पंजीकरण के साथ-साथ ब्रांडिंग, व्यावसायीकरण और बाजार विकास जैसी पंजीकरण उपरांत गतिविधियों में कारीगरों और उत्पादक समूहों की सहायता करते हैं।
कर्नाटक के ऐहोल में नाबार्ड ने जीआई प्रमाणित उत्पादों के प्रदर्शन और विपणन के लिए एक समर्पित जीआई स्टोर की स्थापना में भी सहयोग किया है। इसके अलावा संस्था ब्रांडिंग, गुणवत्ता सुधार, डिजिटल कॉमर्स, बाजार संपर्क और संस्थागत क्षमता निर्माण में निवेश कर रही है, ताकि कारीगरों को अपने उत्पादों का बेहतर मूल्य मिल सके और उन्हें घरेलू तथा वैश्विक बाजारों तक व्यापक पहुंच मिल सके।
नाबार्ड का कहना है कि इन पहलों का उद्देश्य भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करते हुए पारंपरिक उत्पादों को व्यावसायिक रूप से अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है। इससे ग्रामीण समुदायों के लिए टिकाऊ आजीविका के अवसर सृजित होंगे और भारत के विशिष्ट भौगोलिक उत्पादों की वैश्विक पहचान भी मजबूत होगी।