भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कहा है कि कृषि क्षेत्र भारत की आर्थिक मजबूती का प्रमुख आधार बना हुआ है। मई माह के अपने बुलेटिन में इसने कृषि ऋण विस्तार, महंगाई पर नियंत्रण और आर्थिक वृद्धि में स्थिरता को प्रमुख विषयों के रूप में रेखांकित किया है। आरबीआई ने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद कृषि क्षेत्र को ऋण और आपूर्ति प्रबंधन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मार्च 2026 में कृषि क्षेत्र को कर्ज की वृद्धि दर 15.7 प्रतिशत रही, जबकि इंडस्ट्री के लिए यह 15 प्रतिशत और सर्विसेज के लिए 19 प्रतिशत थी।
आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा के अनुसार, महामारी के बाद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहा है। 2021-25 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की औसत वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत रही, जबकि 2025-26 में वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। 2026-27 में अर्थव्यवस्था के 6.9 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान जताया गया है।
बुलेटिन में खाद्य महंगाई और कृषि क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया गया है। आरबीआई ने कहा कि भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत है, इसलिए मानसून, कृषि उत्पादन और खाद्य आपूर्ति का महंगाई पर सीधा असर पड़ता है। आरबीआई ने कहा कि खाद्य वस्तुओं की कीमतों में अस्थायी बढ़ोतरी से निपटने के लिए केवल ब्याज दरों का सहारा लेना पर्याप्त नहीं होता। सरकार को आयात, जमाखोरी रोकने, बफर स्टॉक जारी करने और आपूर्ति बढ़ाने जैसे कदम उठाने पड़ते हैं।
भारत की लचीली इन्फ्लेशन टार्गेटिंग व्यवस्था ने महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में तनाव जैसे झटकों के बावजूद महंगाई को नियंत्रित रखने में मदद की है। हाल के महीनों में खुदरा महंगाई आरबीआई के 4 प्रतिशत लक्ष्य से नीचे रही है, हालांकि वित्त वर्ष 2026-27 के लिए औसत सीपीआई महंगाई 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
आरबीआई की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने कहा कि इन्फ्लेशन टार्गेटिंग लागू होने के बाद 2016-26 के दौरान औसत खुदरा महंगाई घटकर 4.6 प्रतिशत रह गई, जबकि इससे पहले के दशक में यह 8.1 प्रतिशत थी। इसके बावजूद आर्थिक वृद्धि स्थिर बनी रही।
बुलेटिन में यह भी कहा गया कि भारतीय कृषि अब मौसम और वर्षा संबंधी झटकों के प्रति पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुई है। बेहतर आपूर्ति प्रबंधन और मांग-आपूर्ति अंतर कम होने से खाद्य कीमतों में उतार-चढ़ाव घटा है। संशोधित सीपीआई बास्केट में खाद्य पदार्थों का भार कम होने से भविष्य में महंगाई की अस्थिरता और कम हो सकती है।
कृषि ऋण पर आरबीआई ने कहा कि बैंक केवल लाभ कमाने वाली संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि उनकी जिम्मेदारी समावेशी आर्थिक विकास को बढ़ावा देना भी है। आरबीआई के डिप्टी गवर्नर स्वामीनाथन जे. ने कहा कि कृषि, ग्रामीण उद्यम और छोटे व्यवसायों तक ऋण पहुंचाना बैंकों की महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि ऋण फैसलों का सीधा असर रोजगार, ग्रामीण आय और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ता है। बुलेटिन के अनुसार, मार्च 2026 में कृषि क्षेत्र को कर्ज की वृद्धि दर 15.7 प्रतिशत रही, जबकि इंडस्ट्री के लिए यह 15 प्रतिशत और सर्विसेज के लिए 19 प्रतिशत थी।
आरबीआई ने कहा कि हाल के वर्षों में बैंकिंग क्षेत्र की बैलेंस शीट मजबूत हुई है। पूंजी पर्याप्तता, लाभप्रदता और परिसंपत्ति गुणवत्ता में सुधार हुआ है, जिससे कृषि, एमएसएमई और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में ऋण प्रवाह बढ़ने की संभावना है।
हालांकि, बुलेटिन में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ऊर्जा कीमतों में तेजी, आपूर्ति श्रृंखला में बाधा और वैश्विक वित्तीय अनिश्चितताओं को लेकर चिंता भी जताई गई है। आरबीआई ने कहा कि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से डीजल, उर्वरक और परिवहन महंगे हो सकते हैं, जिसका असर कृषि लागत और खाद्य महंगाई पर पड़ेगा।
आरबीआई ने भरोसा जताया कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, राजकोषीय अनुशासन, नीति स्थिरता और सुधारों के कारण भारत की आर्थिक बुनियाद मजबूत बनी हुई है। केंद्रीय बैंक ने कहा कि आने वाले वर्षों में समावेशी विकास बनाए रखने के लिए कृषि ऋण, ग्रामीण वित्त और खाद्य महंगाई प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना होगा।