अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) ने चीनी क्षेत्र से जुड़ी केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखा हमला बोला है। संगठन का आरोप है कि सरकार की नीतियां निजी चीनी मिलों और कॉरपोरेट प्रोसेसरों को फायदा पहुंचा रही हैं, जबकि गन्ना किसानों को उनके वैधानिक बकाये से वंचित किया जा रहा है। यह आलोचना ऐसे समय में सामने आई है जब घरेलू बाजार में चीनी की कीमतें तेजी से बढ़कर 16 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं।
AIKS के अध्यक्ष राजन क्षीरसागर और महासचिव रवुला वेंकैया की तरफ से 24 अगस्त 2026 को जारी बयान में किसान संगठन ने चीनी अर्थव्यवस्था में बढ़ते विरोधाभास को रेखांकित किया है। एक्स-मिल चीनी की कीमत एक साल पहले के 3,900 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर 5,400-5,500 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है। वहीं, देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत अब 58.23 रुपये प्रति किलोग्राम है, जो ओडिशा में 64.72 रुपये प्रति किलोग्राम और कई क्षेत्रीय बाजारों में 60-70 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है।
किसान सभा ने कहा कि सालाना 44 करोड़ टन गन्ने की पैदावार से 330-350 लाख चीनी का उत्पादन होता है, लेकिन इससे आने वाली राशि का बड़ा हिस्सा प्रोसेसरों और औद्योगिक खरीदारों के पास चला जाता है। घरेलू चीनी खपत का 60-75% हिस्सा खाद्य प्रसंस्करण, पेय पदार्थ और फार्मास्यूटिकल्स सहित औद्योगिक क्षेत्रों से आता है, न कि घरेलू उपभोक्ताओं से।
इसके अलावा, कुल गन्ना पेराई का 18-20%, यानी 760-950 लाख टन गन्ना, सरकार के E20 जैव ईंधन लक्ष्य के लिए एथनॉल उत्पादन की ओर मोड़ा जा रहा है। इससे मिलों को एथनॉल, सह-उत्पादित बिजली, प्रेसमड और बगास से आकर्षक राजस्व प्राप्त हो रहा है, लेकिन किसानों को इसमें कोई हिस्सा नहीं दिया जा रहा है।
मिलों को रिकॉर्ड राजस्व प्राप्तियों के बावजूद, 2025-26 के पेराई सत्र के लिए देशभर में गन्ने का बकाया 16,087 करोड़ रुपये है। AIKS द्वारा संकलित राज्यवार आंकड़ों के अनुसार प्रमुख बकाये इस प्रकार हैं:
कर्नाटक: 4,956 करोड़ रुपये
महाराष्ट्र: 4,252 करोड़ रुपये
उत्तर प्रदेश: 3,287 करोड़ रुपये
महाराष्ट्र में 210 मिलों ने 1,045 लाख टन गन्ने की पेराई की, जिसकी कुल देय एफआरपी 40,446 करोड़ रुपये थी। लेकिन फरवरी तक 168 मिलें अपना पूरा बकाया चुकाने में विफल रही थीं और 4,898 करोड़ रुपये का भुगतान लंबित था। AIKS ने अधिकारियों पर गन्ने के भुगतान के लिए निर्धारित 14 दिन की वैधानिक समयसीमा लागू करने में विफल रहने तथा देरी से भुगतान पर अनिवार्य 15% दंडात्मक ब्याज नहीं लगाने का आरोप भी लगाया।
किसान सभा ने गुजरात की मांडवी सहकारी चीनी मिल जैसी सहकारी संपत्तियों की औने-पौने दाम पर बिक्री का भी आरोप लगाया। इस मिल की परिसंपत्तियों का मूल्य 250 करोड़ रुपये आंका गया था, लेकिन इसे निजी कंपनियों को केवल 37 करोड़ रुपये में बेच दिया गया।
एफआरपी को लेकर सरकार पर निशाना
AIKS ने 10.25% रिकवरी पर 355 रुपये प्रति क्विंटल के उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) को कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) की ओर से किया गया “सांख्यिकीय छल” करार दिया। संगठन के अनुसार, स्वामीनाथन फॉर्मूले (C2+50%) के तहत एफआरपी 456 रुपये प्रति क्विंटल होनी चाहिए। उपज में बदलाव, जोखिम और प्रबंधन लागत को ध्यान में रखने पर यह 548-563 रुपये प्रति क्विंटल तक होनी चाहिए।
AIKS ने सरकार पर रंगराजन समिति और नीति आयोग की सिफारिशों की अनदेखी करने का भी आरोप लगाया। संगठन के अनुसार, इन सिफारिशों के तहत किसानों को चीनी से प्राप्त वास्तविक आय का 75% या चीनी तथा सह-उत्पादों से प्राप्त राजस्व का 70% हिस्सा मिलना चाहिए, जो 380-407 रुपये प्रति क्विंटल के बराबर बैठता है।
शुल्क-मुक्त आयात का विरोध
खुदरा महंगाई पर काबू पाने के लिए सरकार ने हाल ही में 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को मंजूरी दी और डीलरों के लिए स्टॉक सीमा लागू की। AIKS ने आयात के फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य घरेलू गन्ने की कीमतों को दबाना है। संगठन ने गरीब उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत चीनी की बिक्री फिर से शुरू नहीं करने पर भी सरकार को घेरा।
किसान सभा की 7 सूत्री मांगें
PDS में चीनी की बहाली: राशन प्रणाली के माध्यम से चीनी की खरीद और सब्सिडी दरों पर वितरण किया जाए।
बकाया और बोनस: 16,087 करोड़ रुपये के गन्ना बकाये का तत्काल भुगतान 15% वैधानिक ब्याज के साथ किया जाए तथा 2025-26 के लिए एफआरपी के ऊपर 1,200 रुपये प्रति टन बोनस दिया जाए।
C2+50% के आधार पर एफआरपी: एफआरपी का आधार 456 रुपये प्रति क्विंटल तय किया जाए और CACP की गणना संबंधी खामियों को दूर करते हुए इसे 548-563 रुपये प्रति क्विंटल तक किया जाए।
कानूनी राजस्व हिस्सेदारी: एथनॉल और सभी सह-उत्पादों सहित शुद्ध प्राप्त वास्तविक मूल्य में किसानों की 75% वैधानिक हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए।
निजीकरण पर रोक: किसानों के स्वामित्व वाली सहकारी चीनी मिलों का कॉरपोरेट अधिग्रहण रोका जाए।
शुल्क-मुक्त आयात पर रोक: घरेलू गन्ने की कीमतों को कृत्रिम रूप से दबाने के लिए किए जाने वाले शुल्क-मुक्त चीनी आयात पर रोक लगाई जाए।
वैधानिक MSP गारंटी: सभी कृषि फसलों के लिए C2+50% के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी देने वाला राष्ट्रीय कानून बनाया जाए।