अमेरिका का भारत समेत 54 देशों पर नया टैरिफ लगाने का प्रस्ताव, जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर रोक न लगाने का आरोप

अमेरिका ने जबरन श्रम (फोर्स्ड लेबर) से जुड़े व्यापारिक मुद्दों को लेकर 54 अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त सेक्शन 301 शुल्क लगाने का प्रस्ताव दिया है, जिसमें भारत पर 12.5% शुल्क शामिल है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह जांच सेक्शन 301 के कानूनी दायरे से बाहर है और भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौता (बीटीए) वार्ता में दबाव बनाने का प्रयास है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विभिन्न देशों के आयात पर टैरिफ लगाने का नया रास्ता तलाशा है। उनके व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय ने भारत सहित 54 देशों से आयात पर सेक्शन 301 के तहत 12.5% तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव किया है। यह प्रस्ताव जबरन श्रम यानी फोर्स्ड लेबर से जुड़ा है। हालांकि यह कार्रवाई इस आरोप पर आधारित नहीं है कि भारतीय निर्यातक जबरन श्रम का उपयोग करके उत्पाद तैयार कराते हैं। इसके बजाय, अमेरिका यह देख रहा है कि क्या भारत ने तीसरे देशों में जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर पर्याप्त प्रतिबंध लगाया है। 

प्रस्ताव पर सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया जारी है और आने वाले हफ्तों में फाइनल टैरिफ घोषित किए जा सकते हैं। व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को इस जांच के कानूनी आधार को चुनौती देनी चाहिए।  इसे भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) पर चल रही वार्ताओं के बीच दबाव की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।

यूएसटीआर का प्रस्ताव क्या है

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (यूएसटीआर) ने 11 और 12 मार्च 2026 को जबरन श्रम और अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता (एक्सेस कैपेसिटी) से जुड़ी चिंताओं को लेकर 60 देशों के खिलाफ सेक्शन 301 के तहत दो अलग-अलग जांच शुरू की थीं। उस जांच के निष्कर्ष जारी करते हुए यूएसटीआर ने अब 54 देशों से आयात पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है। 

प्रस्ताव के अनुसार कनाडा, इक्वाडोर, यूरोपीय संघ, इंडोनेशिया, मैक्सिको और पाकिस्तान से आयात पर 10% शुल्क लगाया जाएगा, जबकि भारत और चीन सहित 48 अन्य अर्थव्यवस्थाओं पर 12.5% शुल्क प्रस्तावित है। टेक्सटाइल उत्पादों के लिए अपेक्षाकृत कम शुल्क का प्रस्ताव है, हालांकि उनकी दरें अभी अंतिम रूप से तय नहीं हुई हैं।

यह कदम अभी प्रस्ताव के रूप में है और अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। प्रस्ताव फिलहाल परामर्श चरण में है। इच्छुक पक्ष 22 जून 2026 तक सुनवाई में भाग लेने के लिए आवेदन और अपने बयान का सार प्रस्तुत कर सकते हैं, जबकि लिखित टिप्पणियां 6 जुलाई तक जमा करनी होंगी। यूएसटीआर 7 जुलाई को सार्वजनिक सुनवाई आयोजित करेगा।

अंतिम निर्णय जुलाई में आने की संभावना है, संभवतः 24 जुलाई 2026 को समाप्त होने वाले अस्थायी 10% सेक्शन 122 शुल्कों की अवधि समाप्त होने से पहले। मंजूरी मिलने के बाद ये शुल्क तत्काल लागू किए जा सकते हैं।

भारत को जांच के दायरे को चुनौती देनी चाहिए

12.5% शुल्क अमेरिका की विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के प्रति प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन करते हैं क्योंकि ये उसकी बाउंड ड्यूटी सीमा से अधिक है। इसलिए इसे डब्ल्यूटीओ नियमों के तहत अवैध माना जा सकता है। मौजूदा जांच भी सेक्शन 301 के मूल दायरे से बाहर जाती है। सेक्शन 301 का उद्देश्य उन बाजार पहुंच बाधाओं की जांच करना है जिनका सामना अमेरिकी कंपनियां संबंधित देश में करती हैं, न कि यह निर्धारित करना कि वह देश किन उत्पादों का और किन स्रोतों से आयात करता है।

यह जांच इस आरोप पर आधारित नहीं है कि भारतीय निर्यात जबरन श्रम से तैयार किए जाते हैं। इसके बजाय, यूएसटीआर यह देख रहा है कि क्या देश तीसरे देशों में जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगाते हैं। भारत यह तर्क दे सकता है कि अमेरिका एकतरफा व्यापारिक उपायों के माध्यम से अपनी पसंद की आयात-नियंत्रण व्यवस्था अन्य देशों पर थोपने की कोशिश कर रहा है, जो सेक्शन 301 के दायरे से बाहर है।

भारत यह भी तर्क दे सकता है कि जबरन श्रम से जुड़ी चिंताएं, विशेष रूप से चीन जैसे देशों में, अक्सर कुछ विशेष उत्पादों तक सीमित होती हैं। अमेरिका भी ऐसे कई उत्पादों का बड़ा आयातक बना हुआ है। इसलिए कुछ चुनिंदा उत्पादों से जुड़ी समस्या के लिए पूरे देश पर व्यापक शुल्क लगाना उचित नहीं है।

बीटीए पर हस्ताक्षर के लिए भारत पर दबाव

थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) का मानना है कि 12.5% शुल्क का प्रस्ताव द्विपक्षीय व्यापार वार्ता में भारत पर दबाव बढ़ाने की व्यापक अमेरिकी रणनीति का हिस्सा है। जीटीआरआई के अनुसार भारत को अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता जैसे अन्य क्षेत्रों में भी नए सेक्शन 301 शुल्कों के लिए तैयार रहना चाहिए। नई दिल्ली को बीटीए वार्ता और सेक्शन 301 जांच को अलग-अलग मुद्दों के रूप में देखना चाहिए। इसके लिए भारत को अन्य देशों की तरह इन शुल्कों का मुकाबला करने और आवश्यक होने पर उनका भार उठाने के लिए तैयार रहना होगा।

जीटीआरआई का तर्क है कि 20 फरवरी को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा रेसिप्रोकल टैरिफ व्यवस्था को रद्द किए जाने के बाद बीटीए का मूल औचित्य काफी कमजोर पड़ गया है। प्रस्तावित बीटीए अब एकतरफा दिखाई देता है, जिसमें भारत से बड़े समझौते और रियायतें मांगी जा रही हैं, जबकि बदले में उसे कोई स्पष्ट लाभ नहीं मिल रहा। संस्था का सुझाव है कि भारत को बीटीए में अपनी भागीदारी का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए और मलेशिया की तरह इस समझौते से अलग होने का विकल्प भी रखना चाहिए।

वाणिज्य मंत्रालय की प्रतिक्रिया

इस बीच, वाणिज्य मंत्रालय ने एक बयान में कहा, “भारत इस मामले पर सेक्शन 301 की कार्यवाही के तहत अमेरिका के साथ लगातार संवाद कर रहा है। साथ ही, भारत और अमेरिका 2 फरवरी 2026 को घोषित तथा 7 फरवरी 2026 को जारी संयुक्त बयान के अनुरूप एक फ्रेमवर्क एग्रीमेंट को अंतिम रूप देने के लिए भी बातचीत कर रहे हैं।”

मंत्रालय ने कहा कि रिपोर्ट के अनुसार प्रस्तावित शुल्क अभी अंतिम नहीं हैं। इच्छुक पक्ष 22 जून 2026 तक सार्वजनिक सुनवाई में भाग लेने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। लिखित टिप्पणियां 6 जुलाई 2026 तक जमा की जा सकती हैं, जबकि सार्वजनिक सुनवाई 7 जुलाई 2026 को आयोजित की जाएगी।