लगभग पूरी तरह नियंत्रित उर्वरक उद्योग उत्तर प्रदेश सरकार के एक फैसले से सकते में है। उत्तर प्रदेश सरकार ने 9 जनवरी, 2026 को एक शासनादेश जारी कर राज्य में 1 जनवरी, 2026 से सब्सिडी वाले उर्वरक बेचने वाली कंपनियों और वितरकों पर गैर-सब्सिडी वाले उर्वरक बेचने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।
राज्य के कृषि निदेशालय के उर्वरक अनुभाग द्वारा जारी शासनादेश में कहा गया है कि राज्य में समस्त उर्वरक विनिर्माता एवं प्रदायकर्ता संस्थाओं को अनुदानित (सब्सिडाइज्ड) उर्वरकों की आपूर्ति एवं बिक्री के लिए दी गई अनुमति को छोड़कर, उर्वरक विक्रय प्राधिकार पत्र में अंकित सभी गैर-अनुदानित उर्वरकों की आपूर्ति और बिक्री पर 1 जनवरी, 2026 से उत्तर प्रदेश में पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया गया है।
उर्वरक उत्पादकों और विपणन करने वाली कंपनियों को इस आशय का पत्र 13 जनवरी को भेजा गया। इस पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि गैर-अनुदानित उर्वरकों की आपूर्ति एवं बिक्री पर 1 जनवरी, 2026 से उत्तर प्रदेश में पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाता है। रूरल वॉयस के पास इस पत्र की प्रति उपलब्ध है।
यह पत्र सहकारी उर्वरक कंपनियों इफको और कृभको के अलावा इंडियन पोटाश लिमिटेड, हिंदुस्तान उर्वरक एंड रसायन लिमिटेड, एनएफएल, यारा फर्टिलाइजर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, चंबल फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड, कोरोमंडल इंटरनेशनल लिमिटेड, मेटिक्स फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स, राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स, गुजरात स्टेट फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स, गुजरात नर्मदा वैली फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स, श्रीराम फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स और नर्मदा बॉयो-केम लिमिटेड को भेजा गया है।
पत्र में कहा गया है कि किसानों को सब्सिडाइज्ड उर्वरकों के साथ अन्य उर्वरकों की टैगिंग की शिकायतें मिल रही थीं। इस संबंध में उद्योग के साथ हुई बैठकों का भी उल्लेख किया गया है। शिकायतें जारी रहने के बाद यह कदम उठाया गया, जिसे आदेश जारी करने की प्रमुख वजह बताया गया है।
उद्योग सूत्रों ने रूरल वॉयस को बताया कि उर्वरक उद्योग सबसे अधिक नियंत्रित क्षेत्रों में से एक है। यूरिया की बिक्री और मूल्य पूरी तरह नियंत्रित हैं। नवंबर 2012 से यूरिया की बिक्री कीमत में कोई बदलाव नहीं हुआ है और 45 किलो के बैग के लिए 266.5 रुपये की अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) तय है। वहीं न्यूट्रिएंट आधारित सब्सिडी (एनबीएस) योजना के तहत आने वाले विनियंत्रित उर्वरकों में सर्वाधिक बिकने वाले डाइ-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) का एमआरपी 2022 से 50 किलो के बैग के लिए 1350 रुपये पर स्थिर है। सरकार इस एमआरपी को बरकरार रखने के लिए सब्सिडी निर्धारित करती है।
डीएपी के अलावा एनपीके सहित 30 से अधिक कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की कीमत तय करने का अधिकार उत्पादकों और विपणन कंपनियों के पास है। हालांकि, डीएपी की तरह इन उर्वरकों के दाम भी परोक्ष रूप से सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी से प्रभावित होते हैं। सब्सिडी के साथ कई शर्तें भी लागू होती हैं।
देश में करीब 670 लाख टन उर्वरकों की बिक्री होती है। इनमें अकेले यूरिया की बिक्री लगभग 400 लाख टन और डीएपी की करीब 100 लाख टन है। सब्सिडी वाले उर्वरकों की बिक्री के लिए सरकार कृषि मंत्रालय की मांग के आधार पर कंपनियों को फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर के तहत इंडेंट जारी करती है और उनके मूवमेंट व बिक्री की पूरी जानकारी रखती है। आयातित और घरेलू रूप से उत्पादित सब्सिडी वाले उर्वरकों के डिस्पैच तथा राज्य व जिला-वार आवंटन पर भी सरकार का नियंत्रण रहता है।
उत्तर प्रदेश सरकार के इस फैसले से सब्सिडी वाले उर्वरकों पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन गैर-सब्सिडी वाले स्पेशियलिटी उर्वरकों की बिक्री प्रभावित होगी। उद्योग सूत्रों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सब्सिडी वाले उर्वरकों की बिक्री लगभग 13 हजार करोड़ रुपये की है, जबकि गैर-सब्सिडी उर्वरकों का बाजार 1000 करोड़ रुपये से थोड़ा अधिक है। राज्य सरकार के इस फैसले से कंपनियों के इस कारोबार को झटका लगेगा।
एक उर्वरक कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने रूरल वॉयस को बताया कि इस तरह का प्रतिबंध किसानों के लिए भी हितकर नहीं है। सरकार और कंपनियां रासायनिक उर्वरकों के विकल्पों पर ध्यान दे रही हैं, ताकि मृदा स्वास्थ्य के लिए संतुलित उपयोग को बढ़ावा दिया जा सके और गैर-रासायनिक उर्वरकों की खपत बढ़ाई जा सके। लेकिन इस निर्णय से विशिष्ट जरूरतों वाले नए उर्वरकों में कंपनियों के निवेश को भी झटका लगेगा।
कुछ कंपनियों का कहना है कि फसलों की विशेष आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्पेशियलिटी उर्वरक जरूरी होते हैं, लेकिन यह फैसला किसानों को इनसे वंचित कर सकता है। देशभर में इन उर्वरकों का बाजार करीब चार लाख टन का है, जिसमें सॉल्यूबल और माइक्रो न्यूट्रिएंट उर्वरक शामिल हैं।
उर्वरक उद्योग का कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार का यह फैसला नियंत्रण को और सख्त करने वाला कदम है, जो किसानों के भी हित में नहीं है।