भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर किसान संगठनों ने उठाए सवाल, 12 फरवरी को विरोध-प्रदर्शन का ऐलान
भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के खिलाफ किसान संगठनों का विरोध तेज हो गया है। संयुक्त किसान मोर्चा, ऑल इंडिया किसान सभा और अन्य संगठनों ने इसे भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए घातक बताते हुए 12 फरवरी को देशव्यापी प्रदर्शन और आम हड़ताल का समर्थन करने का ऐलान किया है।
भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर देश के प्रमुख किसान संगठनों में विरोध जताया है। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM), एसकेएम (गैर-राजनीतिक) और ऑल इंडिया किसान सभा (AIKS) समेत कई संगठनों ने इस समझौते की कड़ी आलोचना करते हुए 12 फरवरी को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन और आम हड़ताल के समर्थन का ऐलान किया है।
संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने आरोप लगाया कि भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौता मोदी सरकार द्वारा अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने पूरी तरह “सरेंडर” करने जैसा है। अंतरिम समझौते से वाणिज्य मंत्री का यह दावा पूरी तरह खारिज होता है कि कृषि क्षेत्र को मुक्त व्यापार समझौते (FTA) से बाहर रखा गया है और सरकार किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं करेगी। एसकेएम ने वाणिज्य मंत्री के तत्काल इस्तीफे की मांग की है। साथ ही प्रधानमंत्री से इस समझौते पर हस्ताक्षर न करने की मांग करता है।
एसकेएम ने कहा कि अमेरिका द्वारा 18% शुल्क और भारत द्वारा शून्य शुल्क मुक्त व्यापार नहीं है। भारतीय वस्तुओं पर शुल्क वास्तव में 2023-24 में शून्य से बढ़कर 3% और फिर 18% हो गया है, जबकि अमेरिकी कृषि उत्पादों पर हमारे शुल्क, जो 30% से 150% तक थे, अब शून्य कर दिए गए हैं। इससे भारतीय कृषि अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के फंदे में फंस जाएगी। अंतरिम समझौते के अनुसार गैर-शुल्क बाधाओं को भी कम किया जाएगा, जिससे अमेरिका से दूध का आयात आसान होगा।
भारतीय किसान यूनियन (BKU) के नेता राकेश टिकैत ने कहा कि गांवों में लोग पूछ रहे हैं कि यह समझौता उनकी रोजमर्रा की जिंदगी को कैसे प्रभावित करेगा। टिकैत ने कहा कि यह डील देश की 70% आबादी पर कड़ा प्रहार है पहले से बाजार की अस्थिरता कर्ज का बोझ झेल रहा ग्रामीण वर्ग अब बर्बाद हो जाएगा सोने की चिड़िया कहे जाने वाले देश पर अब कॉरपोरेट का कब्जा होगा सरकार तत्काल प्रभाव से इस समझौते को रद्द करें।
संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) के नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल ने कहा कि जहां मंत्री सोशल मीडिया पर कृषि और डेयरी को सुरक्षित बताने का दावा कर रहे हैं, वहीं संयुक्त बयान में गैर-शुल्क बाधाओं को हटाने पर सहमति की बात कही गई है। यह समझौता किसानों की बर्बादी का समझौता है।
सेब उत्पादकों की चिंता
अमेरिका से आने वाले सेब पर आयात शुल्क 50 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी किए जाने से हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादकों की चिंता बढ़ गई है। हालांकि, सरकार ने न्यूनतम आयात मूल्य (एमआईपी) 50 रुपये से बढ़ाकर 80 रुपये प्रति किलो कर दिया है। नए ढांचे के तहत अमेरिकी सेब करीब 100 रुपये प्रति किलो की कीमत पर भारत पहुंचेंगे, जिससे प्रतिस्पर्धा और तेज होने की आशंका जताई जा रही है।
संयुक्त किसान मंच (SKM) के संयोजक हरीश चौहान का कहना है कि मुक्त व्यापार के नाम पर देश के किसानों की बर्बादी के समझौते किए जा रहे हैं। बाजार में सस्ते आयातित सेब की हिस्सेदारी बढ़ेगी, जिससे घरेलू सेब की कीमत और बिक्री प्रभावित होगी। उन्होंने सरकार के इस दावे पर भी सवाल उठाया कि पहले अमेरिकी सेब 75 रुपये प्रति किलो की दर से भारत पहुंच रहे थे। चौहान ने पूछा कि यदि ऐसा था, तो खुदरा बाजार में ये सेब 200 से 250 रुपये प्रति किलो क्यों बिकते रहे। उन्होंने आशंका जताई कि यदि अमेरिकी सेब 100 रुपये प्रति किलो पर भारत पहुंचेंगे, तो कोल्ड एटमॉस्फियर (CA) स्टोरेज में प्रीमियम सेब रखना घाटे का सौदा बन जाएगा।
गौरतलब है कि जनवरी से नवंबर 2025 के बीच अमेरिका से भारत में कृषि आयात सालाना आधार पर 34 प्रतिशत बढ़कर लगभग 2.9 अरब डॉलर तक पहुंच गया। प्रमुख आयातों में कपास, सोयाबीन तेल, एथेनॉल और बादाम जैसे ड्राई फ्रूट शामिल हैं।

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