Budget 2026: किसानों को बजट की औपचारिकता नहीं, ठोस सुधारों की जरूरत

भारतीय किसानों के लिए बजट अब समाधान की बजाय एक औपचारिकता बन गया है। या तो वित्त मंत्रालय कृषि मंत्रालय की बात नहीं सुनता, या कृषि मंत्रालय प्रभावशाली तर्क पेश करने में विफल रहता है। बजट घोषणाएं केवल इरादों के बयान तक सीमित रहती हैं। उदाहरण के लिए, पिछले वर्ष घोषित किसान क्रेडिट कार्ड की सीमा 3 लाख रुपये से बढ़ाकर 5 लाख रुपये करने का वादा अब तक अधिसूचित नहीं हुआ है।

वर्ष 2026 भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होने वाला है। निश्चित रूप से केंद्रीय बजट इसका महत्वपूर्ण हिस्सा होगा, लेकिन 8वां वेतन आयोग और 16वां वित्त आयोग ऐसे निर्णायक पड़ाव हैं, जिन पर खास ध्यान देने की जरूरत है। इसके बाद दो सरकारी विशेषज्ञ समितियां भी हैं, जिनका नेतृत्व राजीव गाबा कर रहे हैं - एक विकसित भारत के लक्ष्यों को साकार करने के लिए और दूसरी गैर-वित्तीय क्षेत्र के रेगुलेटरी सुधारों के लिए। इसके अलावा, अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ किए जाने वाले व्यापार समझौतों में लिए जाने वाले रणनीतिक फैसले भी महत्वपूर्ण हैं। ऐसे फैसले जो हमें खाद्य सुरक्षा, डेटा रेगुलेशन और अनुपालन प्रणाली के बाहरी मानकों में सीमित कर सकते हैं, जो हमारे हित में नहीं हो सकते।

भारतीय किसानों के लिए बजट अब समाधान की बजाय एक औपचारिकता बन गया है। या तो वित्त मंत्रालय कृषि मंत्रालय की बात नहीं सुनता, या कृषि मंत्रालय प्रभावशाली तर्क पेश करने में विफल रहता है। बजट घोषणाएं केवल इरादों के बयान तक सीमित रहती हैं। उदाहरण के लिए, पिछले वर्ष घोषित किसान क्रेडिट कार्ड की सीमा 3 लाख रुपये से बढ़ाकर 5 लाख रुपये करने का वादा अब तक अधिसूचित नहीं हुआ है।

यह कहना गलत होगा कि शीर्ष नेतृत्व में साहस की कमी है। नए विचार आजमाए गए हैं। स्वाभाविक रूप से, कभी-कभी नीतियां अपेक्षित परिणाम नहीं देतीं या समय के साथ परिस्थितियां बदल जाती हैं। लेकिन विफल कार्यक्रमों को जारी रखने की राजनीतिक मजबूरी सुधार की गुंजाइश को सीमित कर देती है और सिस्टम एक दुष्चक्र में फंस जाता है। कमजोर परिणाम चुनावी चिंता को बढ़ाते हैं, जो अंततः लोक-लुभावन नीतियों को बढ़ावा देता है। लोक-लुभावन नीतियां और वित्तीय समस्याएं एक-दूसरे को पोषित करती हैं और गवर्नेंस को कठिन बना देती हैं।

लोक-लुभावन राजनीति उन स्थानों पर अधिक मजबूत होती है जहां असमानता अधिक है। बिहार के चुनावों ने इसे प्रमाणित किया और यह भी दिखाया कि राजनीतिक दलों की विचारधारा में अंतर होते हुए भी उनकी लोक-लुभावन प्रवृत्तियां समान हैं। सरकारें कर्ज समस्या को और अधिक कर्ज देकर कम करने की कोशिश करती हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि कई निजी व्यवसायों की उधारी की लागत (ब्याज) कई राज्यों की तुलना में कम है, जबकि उन राज्यों का ऋण संप्रभु गारंटी के तहत है।

उदाहरण के लिए उर्वरक सब्सिडी। खाद्य सुरक्षा अब पहले जैसी वजह नहीं रही। कृषि की विकास दर लगभग 3% है, जबकि जनसंख्या वृद्धि करीब 0.5% है। गणित बदल गया है। राजनीतिक रूप से यूरिया की कीमतों में 25% वृद्धि करना संभव है और इस बचत को सीधे किसानों के लाभ के लिए पुनः इस्तेमाल किया जा सकता है।

उपभोग के दृष्टिकोण से, भारत ने अत्यधिक गरीबी को घटाकर 7.5 करोड़ तक लाने में बड़ी प्रगति की है। नीति आयोग के अनुसार 15 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी का सामना कर रहे हैं। लेकिन अब भी 80 करोड़ भारतीय मुफ्त अनाज प्राप्त कर रहे हैं। तार्किक रूप से यह व्यवस्था इसी तरह जारी नहीं रह सकती।

फसल बीमा की बात करें तो, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) में केंद्र और राज्य मिलकर कुल प्रीमियम का 90 प्रतिशत दे रहे हैं। इसके बावजूद किसानों और राज्यों में शिकायतें व्यापक हैं, खासकर दावे निपटान और पारदर्शिता को लेकर। विशेषज्ञों का सुझाव है कि अब PMFBY को सरल फसल मुआवजा कोष में बदल दिया जाए, जिससे किसानों का भरोसा फिर से स्थापित किया जा सके।

शहरी नीति में भी एक बड़ी चूक नजर आती है। ‘स्मार्ट सिटी’ का विचार 10 साल पहले ही सफल नहीं था। यह ग्रामीण इलाकों से लोगों को पहले से ही दबावग्रस्त शहरों की ओर खींचता है और भारत के गांवों के वास्तविक स्वरूप को नजरअंदाज करता है। सुधार स्पष्ट है- इसके बजाय 5,000 से अधिक जनगणना शहरों का विकास किया जाए, ताकि समावेशी विकास सुनिश्चित हो सके।

यह किसी भी तरह से आसान नहीं है। किसानों की शिकायतें लंबे समय से बरकरार हैं और समस्याएं दशकों से बढ़ती रही हैं। किसी भी नए कार्यक्रम का विस्तार करने से पहले उसका मूल्यांकन अनिवार्य है। लेकिन सरकारें अपनी ही कार्यप्रणाली का सही मूल्यांकन करने में कमजोर साबित होती हैं। इसके लिए एक विधिक (स्टैच्यूटरी) किसान आयोग का गठन किया जाना चाहिए, जिसका दायित्व मौजूदा व्यवस्था का ऑडिट करना, सुधार की सिफारिशें देना, नए उपाय प्रस्तावित करना और एक समग्र किसान नीति तैयार करना होना चाहिए।

यह कहना आवश्यक है कि कुछ नीतियां बेहद प्रभावी साबित हुई हैं। हालांकि इसके कारण खुले तौर पर स्वीकार नहीं किए जाते। किसानों को उनके खेत के पास मिलने वाली कीमतों (फार्म-गेट प्राइस) को कृत्रिम रूप से कम रखना भारत का सबसे प्रभावी महंगाई नियंत्रण उपकरण बना हुआ है। चाहे भारतीय रिजर्व बैंक कुछ भी तर्क दे, रेपो रेट दूसरे नंबर पर आता है। कीमतों पर यह दबाव आंकड़ों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है: अरहर, कपास, चना, मूंगफली, मक्का, मसूर, मूंग, रागी, सोयाबीन और उड़द आदि की कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे बनी हुई हैं।

यहां तक कि आम सब्जियों - प्याज, आलू, टमाटर, गाजर - की कीमतें भी लगभग एक तिहाई गिर गई हैं, जबकि फल और सब्जियों का उत्पादन 4% बढ़ा है। यह कोई विरोधाभास नहीं है। यह उत्पादन और उत्पादकता के बीच के अंतर को दर्शाता है। स्पष्ट संदेश यह है कि सरकार की कल्याणकारी और लोकलुभावन नीतियां डिप्रेशन को खुले विरोध में बदलने से रोक रही हैं।

व्यापार नीति ने दबाव को और बढ़ा दिया है। पिछले वर्ष पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्क में 40% कटौती की गई। भारत अब अपनी खाद्य तेल की जरूरत का 57% आयात करता है। आयात अधिक हैं क्योंकि फसल उत्पादन (यील्ड) में अंतर बना हुआ है और कृषि अनुसंधान व विकास (R&D) दशकों से उपेक्षित रहा है। R&D का आवंटन दोगुना न करना ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य के प्रति विश्वासघात होगा।

विडंबना यह है कि किसानों को जो राहत मिली है, वह अनजाने में हुई है: मुद्रा अवमूल्यन। कमजोर रुपया - जो 2014 के 60 रुपये प्रति डॉलर से बढ़कर अब लगभग 90 रुपये हो गया है - सस्ते कृषि उत्पादों के आयात के खिलाफ एक प्राकृतिक अवरोध का काम करता है और निर्यात प्रतिस्पर्धा को बढ़ाता है। शुल्क संरक्षण न होने की स्थिति में, अवमूल्यन ने वही काम कर दिया जो नीति नहीं कर पाई।

भारत जीडीपी के हिसाब से दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। फिर भी यह प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में लगभग 200 देशों में 142वें स्थान पर है। किसानों को उच्चतम मूल्य तभी मिल पाएगा जब उनकी क्रय शक्ति बढ़ेगी, उपभोग में वृद्धि होगी और अर्थव्यवस्था अधिक संतुलित रूप से बढ़ेगी। इसके लिए बेहतर गवर्नेंस अहम है।

शासन की गुणवत्ता और सार्वजनिक संसाधनों (जैसे हवा, पानी, मिट्टी आदि) को सुधारने के लिए अगर इस वर्ष केवल एक सुधार किया जाना है, तो वह यह होना चाहिए: संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के माध्यम से सिविल सेवा भर्ती में ऊपरी आयु सीमा को 26 वर्ष तक सीमित किया जाए और प्रयासों (अटेम्प्ट) की संख्या केवल दो निर्धारित की जाए, चाहे उम्मीदवार किसी भी जाति का हो। सुधार ऊपर से शुरू हो ताकि नीचे के लोगों को उठाया जा सके।

मुझे प्रधानमंत्री की नीयत और क्षमता पर भरोसा है; काश मुझे यह विश्वास भी होता कि सरकार हमारी, यानी किसानों की बात सुनेगी।

(अजय वीर जाखड़ भारत कृषक समाज के चेयरमैन हैं)