GDP Data: कृषि उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन उस अनुपात में किसानों की आय नहीं बढ़ी

चालू साल की पहली और दूसरी तिमाही, दोनों ऐसी रही हैं जब स्थिर कीमतों (2011-12) के मुकाबले मौजूदा कीमतों (करंट प्राइसेज) के आधार पर कृषि और सहयोगी क्षेत्र में ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) की वृद्धि दर कम रही है। स्थिर कीमतों पर कृषि और सहयोगी क्षेत्र के जीवीए में पहली दो तिमाही में क्रमशः 3.7 फीसदी और 3.5 फीसदी की वृद्धि हुई है। लेकिन करंट प्राइसेज में पहली तिमाही में जीवीए 3.2 फीसदी रही जो स्थिर कीमतों पर जीवीए से कम है।

बेहतर मानसून और किसान की मेहनत से कृषि और सहयोगी क्षेत्र ने चालू वित्त वर्ष (2025-26) की दूसरी तिमाही में 3.5 फीसदी की वृद्धि दर को तो हासिल किया, लेकिन उस अनुपात में आय वृद्धि में वह पिछड़ गया। यह लगातार दो तिमाही में हुआ है जब कृषि और सहयोगी क्षेत्र का उत्पादन जितना बढ़ा, उसकी वैल्यू उस अनुपात में नहीं बढ़ी। यह सीधे कृषि उत्पादों की कीमतों में गिरावट का नतीजा है। अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों मैन्यूफैक्चरिंग, रियल स्टेट और फाइनेंशियल सर्विसेज में जीडीपी के मुकाबले पहली दोनों तिमाही में जीवीए की दर अधिक रही है। 

28 नवंबर को केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) द्वारा जारी जीडीपी और जीवीए के आंकड़ों ने यह तस्वीर साफ की है। इससे यह भी साफ है कि टर्म्स ऑफ ट्रेड कृषि और सहयोगी क्षेत्रों के लिए प्रतिकूल है। सीएसओ के मुताबिक दूसरी तिमाही में कुल जीडीपी के 8.2 फीसदी की दर से और जीवीए के 8.1 फीसदी की दर से बढ़ने का अनुमान है।

असल में इस साल बेहतर मानसून रहा। कई क्षेत्रों में अधिक बारिश और बाढ़ से फसलों को नुकसान हुआ, लेकिन बेहतर बारिश से खरीफ सीजन में फसलों के क्षेत्रफल और उत्पादन में बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसका नतीजा है कि कृषि और सहयोगी क्षेत्रों की जीडीपी में 3.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। हालांकि यह पहली तिमाही की 3.7 फीसदी की बढ़ोतरी से कुछ कम है। 

लेकिन कहानी कुछ और है। चालू साल की पहली और दूसरी तिमाही, दोनों ऐसी रही हैं जब स्थिर कीमतों (2011-12) के मुकाबले मौजूदा कीमतों (करंट प्राइसेज) के आधार पर कृषि और सहयोगी क्षेत्र में ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) की वृद्धि दर कम रही है। स्थिर कीमतों पर कृषि और सहयोगी क्षेत्र के जीवीए में पहली दो तिमाही में क्रमशः  3.7 फीसदी और 3.5 फीसदी की वृद्धि हुई है। लेकिन करंट प्राइसेज में पहली तिमाही में जीवीए 3.2 फीसदी रही जो स्थिर कीमतों पर जीवीए से कम है। दूसरी तिमाही में यह केवल 1.8 फीसदी रह गई है। यानी उत्पादन के अनुपात में वैल्यू नहीं बढ़ी है। इसका अर्थ है, किसानों ने जो उत्पादन किया उसके अनुपात में उनकी आय नहीं बढ़ी है। यानी गिरती कीमतों के कारण दो तिमाही से कृषि क्षेत्र डिफ्लेशन की स्थिति में है। 

वहीं अगर अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों को देखें तो स्थिति उलट है। वहां उत्पादन के मुकाबले वैल्यू अधिक बढ़ी है। स्थिर कीमतों पर मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र पहली तिमाही में 7.7 फीसदी वृद्धि दर पर था जबकि पहली तिमाही में करंट प्राइस पर इसकी वृद्धि दर 10.10 फीसदी थी। यानी उसकी आय अधिक रही। उसी तरह दूसरी तिमाही में स्थिर कीमतों पर जीवीए 9.1 फीसदी रहा जबकि करंट प्राइसेज पर 11.7 फीसदी था। टर्सरी सेक्टर में दोनों तिमाही में स्थिर कीमतों के मुकाबले ताजा कीमतों पर जीवीए वृद्धि दर अधिक है। रियल एस्टेट और फाइनेंशियल सर्विसेज के लिए पहली तिमाही में यह आंकड़े 9.5 फीसदी और 11 फीसदी रहे जबकि दूसरी तिमाही में यह आंकड़े 10.2 फीसदी और 11.5 फीसदी हैं।

तकनीकी रूप से जटिल दिखने वाले यह आंकड़े कृषि क्षेत्र की कमजोर तसवीर को काफी हद तक साफ करते हैं। जीडीपी में कृषि और सहयोगी क्षेत्र की हिस्सेदारी 14 फीसदी के बराबर है जो मैन्यूफैक्चरिंग का भी स्तर है। अर्थव्यवस्था की बढ़ोतरी में सर्विस सेक्टर का योगदान सबसे अधिक है। पीरियोडिकल लेबर फोर्स सर्वे के मुताबिक देश की कामकाजी आबादी का 46 फीसदी हिस्सा कृषि क्षेत्र पर निर्भर करता है। ऐसे में वहां आय का कम बढ़ना एक मजबूत अर्थव्यवस्था का संकेत नहीं है। हालांकि देश के कुछ बड़े इकोनॉमिस्ट मानते हैं कि अगले कुछ बरसों में कृषि पर आधारित परिवारों की आय का आधे से ज्यादा हिस्सा गैर-कृषि कार्यों से आएगा। नाबार्ड के एक सर्वे के मुताबिक इसकी हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है और यह 40 फीसदी से अधिक हो गया है।

दूसरी तिमाही में कृषि और सहयोगी क्षेत्र की 3.5 फीसदी वृद्धि दर के बावजूद फसल उत्पादन के मोर्चे पर स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। जीडीपी के आंकड़ों से एक दिन पहले जारी खरीफ सीजन के उत्पादन के पहले अग्रिम अनुमान में इसकी झलक दिखती है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी इन आंकड़ों जारी करते हुए एक बयान में कहा कि कई क्षेत्रों में फसल अधिक बारिश व प्राकृतिक आपदा के चलते प्रभावित हुई है। उनका यह बयान इस बात का संकेत भी हो सकता है कि दूसरे आरंभिक अनुमानों में इन आंकड़ों को नीचे की ओर रिवाइज किया जा सकता है। 

पहले अग्रिम अनुमानों के मुताबिक खरीफ सीजन (2025-26) में चावल का उत्पादन पिछले साल के 1227.72 लाख टन से बढ़कर 1245.04 लाख टन रहने का अनुमान लगाया गया है। मक्का में भी बेहतर उत्पादन वृद्धि हुई है और खरीफ में इस साल इसका उत्पादन पिछले साल के 248 लाख टन से बढ़कर 283.03 लाख टन रहने का अनुमान जारी किया गया है। लेकिन इन दोनों को छोड़कर अन्य फसलों का उत्पादन या तो गिरा है या फिर उसमें बहुत मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मसलन, दालों का उत्पादन पिछले साल के 77.33 लाख टन से घटकर 74.13 लाख टन रह गया है। तूर, उड़द और मूंग का उत्पादन घटा है। इसी तरह तिलहन उत्पादन 280.23 लाख टन से गिरकर इस साल 275.63 लाख टन रह गया। मूंगफली का उत्पादन 104.12 लाख टन से बढ़कर इस साल खरीफ में 110.93 लाख टन रहने का अनुमान है। लेकिन खरीफ की दूसरी बड़ी तिलहन फसल सोयाबीन का उत्पादन करीब 10 लाख टन गिर गया है और यह पिछले साल के 152.68 लाख टन से घटकर 142.66 लाख टन रहने का अनुमान है। खास बात यह है कि खाद्य तेल और दालों में हमारी आयात पर निर्भरता है जबकि घरेलू उत्पादन गिर रहा है और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) भी नहीं मिल पा रहा है।

खरीफ की मुख्य व्यावसायिक फसल कपास का उत्पादन पिछले साल के 297.24 लाख गांठ से घटकर 292.15 लाख गांठ रहने का अनुमान है। कपास किसानों को भी एमएसपी से करीब 1000 रुपये प्रति क्विंटल कम पर फसल बेचने की खबरें देश के अधिकांश कपास उत्पादक हिस्सों से आई हैं। सरकार ने दिसंबर 2025 तक कपास के शुल्क मुक्त आयात का अनुमति दे रखी है। जूट का उत्पादन गिरा है और गन्ना उत्पादन मामूली रूप से बढ़कर पिछले साल के 4546.11 लाख टन से बढ़कर 4756.14 लाख टन रहने का अनुमान जारी किया गया है।

यह आंकड़े कृषि क्षेत्र की जीडीपी में सामान्य बढ़ोतरी की पुष्टि तो करते हैं लेकिन कुल स्थिति बहुत उत्साहजनक नहीं है। वहीं जिस तरह से फसलों के दाम गिरे हैं उसका सीधा असर जीवीए में दिख रहा है। सरकार और रिजर्व बैंक को महंगाई कम करने में कामयाबी मिल रही है क्योंकि खाद्य उत्पादों की कीमतों में लगातार गिरावट आ रही है, लेकिन इसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर किस तरह पड़ रहा है वह जीवीए के आंकड़े साफ कर रहे हैं।

यह आंकड़े कृषि क्षेत्र के मुश्किल दौर में जाने का भी संकेत हैं क्योंकि चालू खरीफ मार्केटिंग सीजन में कुछ राज्यों में धान खरीद की पुख्ता व्यवस्था को छोड़ दें तो अधिकांश फसलों के लिए किसानों को एमएसपी भी नहीं मिल पा रहा है। यानी कृषि क्षेत्र एक स्ट्रक्चरल संकट में है जिसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।