वर्ष 2025 के अंतिम पखवाड़े में ओमान और न्यूजीलैंड के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) संपन्न हुए और जनवरी 2026 के अंत में यूरोपीय यूनियन (ईयू) के साथ एफटीए पर भी सहमति बनी। इसके साथ ही भारत ने ऐसा दौर देखा जो देश के ट्रेड वार्ताकारों के लिए अब तक का सबसे सक्रिय और व्यस्त समय रहा। हाल में संपन्न इन तीन एफटीए के अलावा, मौजूदा वित्त वर्ष में ब्रिटेन के साथ भी समझौते पर हस्ताक्षर किए गए और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (ईएफटीए) के साथ व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौते के कार्यान्वयन की शुरुआत हुई। इस अवधि में भारत के सबसे बड़े व्यापार साझेदार अमेरिका के साथ भी गहन द्विपक्षीय व्यापार वार्ताएं हुईं। इसके अलावा, दिसंबर 2025 की शुरुआत में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की नई दिल्ली यात्रा के अंत में लिया गया एक और अहम फैसला यह था कि भारत और यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन आपसी हित के क्षेत्रों को शामिल करते हुए एफटीए वार्ताएं शुरू करेंगे।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बाद द्विपक्षीय एफटीए का महत्व काफी बढ़ गया है, जिसके पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला, ट्रंप द्वारा अपने व्यापार नियम गढ़े जाने के बाद विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) और उसके साथ बहुपक्षीय व्यापार नियम गंभीर संकट में पड़ गए हैं। 1940 के दशक के उत्तरार्ध में विश्व समुदाय ने यह स्वीकार किया था कि वैश्विक व्यापार के लिए पूर्वानुमान योग्य नियम अनिवार्य हैं। इसी सोच के तहत नियम-आधारित व्यापार व्यवस्था की स्थापना की गई थी। बहुपक्षीय प्रणाली के अस्त-व्यस्त होने के साथ ही अब व्यापार नियम तय करने के लिए द्विपक्षीय व्यापार समझौते एकमात्र विकल्प के रूप में उभर कर सामने आए हैं। भारत भी उन अनेक देशों में शामिल है, जिन्होंने द्विपक्षीय व्यापार समझौतों पर बातचीत की है या कर रहे हैं।
भारत के लिए एफटीए में सक्रिय रूप से शामिल होने का दूसरा और संभवतः अधिक महत्वपूर्ण कारण, अपने निर्यात गंतव्यों में विविधता लाना है। पिछले एक दशक में भारतीय निर्यातक अमेरिका पर अधिक निर्भर होते गए हैं। वर्ष 2014-15 में भारत के कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी 14 प्रतिशत से भी कम थी, लेकिन 2025 की पहली छमाही तक यह बढ़कर लगभग 23 प्रतिशत हो गई। भारत के खिलाफ ट्रंप की टैरिफ युद्ध नीति के जल्द समाप्त होने की संभावना न होने के कारण, भारत के लिए अपने निर्यात गंतव्यों में विविधता लाना अब अनिवार्य हो गया है। चीन के विपरीत, जिसने वैश्विक एकीकरण के तहत व्यवस्थित रूप से हर क्षेत्र में बाजारों की तलाश की, भारत अब तक मुख्य रूप से बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर निर्भर रहा है। विशेषकर उन देशों पर जहां प्रवासी भारतीय आबादी अधिक है। ट्रंप का यह रवैया भारत के लिए एक चेतावनी होना चाहिए। इसलिए द्विपक्षीय एफटीए के माध्यम से वैश्विक बाजारों में भारत की मौजूदगी बढ़ाने की पहल को सही दिशा में उठाया गया कदम माना जाना चाहिए।
भारत-ओमान व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (सीईपीए) भारतीय बिजनेस को साझेदार देश में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। ओमान अपनी 87 प्रतिशत टैरिफ लाइन पर वर्तमान में लगाए जा रहे शुल्क समाप्त करेगा। चूंकि ओमान की 11 प्रतिशत टैरिफ लाइन पहले से ही शुल्क-मुक्त हैं, इसलिए भारतीय कारोबारियों को कुल 98 प्रतिशत टैरिफ लाइन पर शुल्क-मुक्त पहुंच प्राप्त होगी। सेवा क्षेत्र में ओमान ने कंप्यूटर संबंधी सेवाओं, व्यावसायिक और पेशेवर सेवाओं, ऑडियो विजुअल सेवाओं, अनुसंधान एवं विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं सहित कई क्षेत्रों को खोलने की प्रतिबद्धता जताई है, जिससे भारतीय सेवा प्रदाताओं को लाभ होगा। इस समझौते की एक प्रमुख विशेषता ‘मोड-4’ के तहत ओमान में भारतीयों के लिए अस्थायी रोजगार के अवसरों में उल्लेखनीय वृद्धि है।
ओमान के साथ समझौता खाड़ी क्षेत्र में यूएई के बाद भारत का दूसरा द्विपक्षीय व्यापार समझौता है। लेकिन वैश्विक वस्तु आयात और सेवा आयात में ओमान की सीमित हिस्सेदारी को देखते हुए यह भारत के निर्यात विविधीकरण के लक्ष्य में बड़ा योगदान नहीं दे पाएगा। हालांकि यह समझौता रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में भारत की मौजूदगी को मजबूत करता है। इस लिहाज से इसका महत्व कम नहीं है। खास बात यह है कि भारत का मध्यम अवधि का उद्देश्य खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के साथ एक व्यापक समझौता करना है और ओमान के साथ सीईपीए को इस लक्ष्य की दिशा में एक अहम कदम के रूप में देखा जाना चाहिए।
न्यूजीलैंड के साथ द्विपक्षीय समझौता
भारत-न्यूजीलैंड एफटीए की लंबी चली वार्ताओं में भारत के डेयरी बाजार को खोलना सबसे विवादास्पद मुद्दा रहा। हालांकि भारत ने डेयरी उत्पादों पर शुल्क कम करने से इनकार किया, फिर भी ऐसा लगता है कि भारत ने इस क्षेत्र से जुड़ी दो प्रतिबद्धताओं को स्वीकार करते हुए एफटीए को अंतिम रूप दिया है। पहली प्रतिबद्धता के तहत भारत ने न्यूजीलैंड के डेयरी उत्पादों के शुल्क-मुक्त आयात को आगे की मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात के लिए एक समर्पित फास्ट-ट्रैक तंत्र लागू करने पर सहमति जताई है। न्यूजीलैंड को उम्मीद है कि इससे भारत की सप्लाई चेन में, और भारत के बढ़ते एफटीए साझेदार देशों तक, उसके निर्यातकों के लिए नए अवसर पैदा होंगे। दूसरी प्रतिबद्धता यह है कि यदि भारत भविष्य में किसी अन्य देश के लिए अपना डेयरी बाजार खोलता है, तो वह न्यूजीलैंड के डेयरी उद्योग को भी समान रियायतें देगा। खास तौर पर यह दूसरी प्रतिबद्धता नया विवाद शुरू कर सकती है, क्योंकि अमेरिका और यूरोपीय यूनियन दोनों ही भारत के साथ अपने एफटीए के तहत डेयरी उत्पादों पर शुल्क कम करने की मांग करते रहे हैं।
दूसरी तरफ, भारत के सभी निर्यात को शुल्क-मुक्त पहुंच देने की न्यूजीलैंड की प्रतिबद्धता से महत्वपूर्ण अवसर खुलते हैं। हालांकि भारत का यह एफटीए साझेदार देश औसतन बहुत कम शुल्क (2024 में 1.9 प्रतिशत) लागू करता है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में (खासकर भारतीय निर्यात वाले क्षेत्रों में) इसके शुल्क काफी अधिक हैं। इनमें गारमेंट्स पर 45 प्रतिशत का अधिकतम शुल्क तथा इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों, रसायनों और चमड़ा उत्पादों पर 10 प्रतिशत का शुल्क शामिल हैं।
भारत और न्यूजीलैंड के बीच सेवा व्यापार में भी विस्तार होने की संभावना है, क्योंकि दोनों देशों ने अपने-अपने सेवा क्षेत्रों को खोलने को लेकर व्यापक प्रतिबद्धताएं जताई हैं। न्यूजीलैंड ने कौशल वाले पेशे में कार्यरत भारतीयों को हर वर्ष 1,667 तीन-वर्षीय अस्थायी रोजगार प्रवेश वीजा देने पर सहमति जताई है। हालांकि किसी भी समय इसकी अधिकतम सीमा 5,000 होगी। यह संख्या न्यूजीलैंड द्वारा प्रतिवर्ष जारी किए जाने वाले कुल स्किल्ड वीजा के औसत से कम है।
भारत-ईयू एफटीए
भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते को अब तक भारत का सबसे व्यापक द्विपक्षीय समझौता माना जा रहा है। चाहे वह शामिल क्षेत्रों की व्यापकता हो या बाजार खोलने की सीमा। यूरोपीय आयोग की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डर लेयेन ने इसे ‘सभी सौदों की जननी’ कहा है। इस समझौते के तहत यूरोपीय यूनियन अपनी 97 प्रतिशत टैरिफ लाइन में भारतीय निर्यात को तरजीही पहुंच देगा, जो आयात मूल्य के लिहाज से 99.5 प्रतिशत को कवर करता है। इससे भारत को वस्त्र, चमड़ा और फुटवियर, खेल सामान तथा आभूषण जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों के निर्यात में वृद्धि का लाभ मिलने की संभावना है। इसके अलावा चाय, कॉफी, मसाले, ताजी सब्जियां और फल तथा प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद जैसे कई कृषि उत्पादों को भी तरजीही बाजार पहुंच मिलेगी।
दूसरी ओर, भारत ने भी शुल्क समाप्त करने की महत्वपूर्ण प्रतिबद्धता जताई है। कुल मिलाकर भारत अपनी 92 प्रतिशत टैरिफ लाइन को खोलने की पेशकश कर रहा है, जो ईयू के 97.5 प्रतिशत निर्यात को कवर करती हैं। भारत के बाजार खुलने से ईयू के ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, रसायन, लोहा-इस्पात और मशीनरी उद्योगों को सबसे अधिक लाभ मिलने की संभावना है। भारत ने इस एफटीए से अनाज और डेयरी उत्पादों को बाहर रखा है, लेकिन उसने जैतून तेल, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और भेड़ के मांस जैसे कई कृषि उत्पादों पर शुल्क समाप्त करने पर सहमति दी है। इसके अलावा वाइन और स्पिरिट्स पर भी शुल्क में उल्लेखनीय कटौती की जाएगी। इसके परिणामस्वरूप भारत के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग पर यूरोपीय यूनियन के समकक्ष उद्योगों से प्रतिस्पर्धा का दबाव होगा।
हालांकि यूरोपीय यूनियन को निर्यात बढ़ने से कई भारतीय उद्योगों को लाभ मिलने का अनुमान है, लेकिन वे इन लाभों को तभी साकार कर पाएंगे जब वे व्यापक नियामक बाधाओं को पार कर सकें। खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण और श्रम सहित कई क्षेत्रों में ईयू के मानक बहुत कड़े हैं। इसलिए इस एफटीए से अनुमानित लाभों को पूरी तरह हासिल करने के लिए सरकार और उद्योग जगत को आपसी तालमेल के साथ काम करना होगा।
(लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर हैं)