केंद्रीय बजट 2026–27 में कृषि क्षेत्र के लिए किए गए आवंटनों और नई घोषणाओं पर व्यापक चर्चा हुई है। किंतु बजट केवल व्यय का दस्तावेज़ नहीं होते; वे नीति की दिशा भी दर्शाते हैं। यह बजट भी ऐसे संकेत देता है जो भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा, मूल्य-श्रृंखला एकीकरण, लॉजिस्टिक दक्षता, विनियामक सुगमता और वैश्विक व्यापार के प्रति तैयारी को प्रभावित कर सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार का वातावरण तेजी से बदल रहा है। भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति व्यवधान और कड़े स्वच्छता एवं पादप स्वच्छता (SPS) मानक कृषि निर्यात के लिए नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहे हैं। ऐसे समय में केवल उत्पादन पर्याप्त नहीं; गुणवत्ता, मानकों का पालन और कुशल परिवहन भी उतने ही आवश्यक हैं।
उच्च-मूल्य कृषि और निर्यात अभिमुखता
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) और कृषिओन्नति योजना के बजट में संशोधित अनुमान 2025–26 की तुलना में क्रमशः 22.14 प्रतिशत और 64.71 प्रतिशत की वृद्धि की गई है। यह उत्पादकता, विविधीकरण और संरचनात्मक परिवर्तन पर बढ़ते जोर को दर्शाता है।
नारियल, काजू, कोको और चंदन जैसी उच्च-मूल्य फसलों के लिए रु.350 करोड़ का प्रावधान किया गया है। पूर्वोत्तर में अगरवुड तथा पहाड़ी क्षेत्रों में बादाम, अखरोट और पाइन नट जैसी मेवा फसलों को भी प्रोत्साहन दिया जा रहा है। इससे स्पष्ट है कि ध्यान अब थोक उत्पादन के बजाय मूल्य-श्रृंखला आधारित, बाज़ार-उन्मुख कृषि पर है।
नारियल मुख्यतः केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में उगाया जाता है और लाखों किसानों की आजीविका से जुड़ा है। वर्ष 2023–24 में नारियल उत्पादों का निर्यात रु.3,469.44 करोड़ रहा, जिसमें रु.187.48 करोड़ सूखे नारियल तथा रु.334.23 करोड़ ताज़ा नारियल से प्राप्त हुए। किंतु पारंपरिक उत्पादक क्षेत्रों में घटती उत्पादकता चिंता का विषय है। ऐसे में बागानों का पुनर्जीवन केवल कृषि सुधार का प्रश्न नहीं, बल्कि निर्यात की स्थिरता बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है।
काजू के मामले में एक स्पष्ट संरचनात्मक विरोधाभास दिखाई देता है। वर्ष 2024 में भारत वैश्विक काजू उत्पादन में चौथे स्थान पर था, लेकिन प्रमुख आयातकों में बारहवें स्थान पर भी रहा। यह स्थिति घरेलू स्तर पर कच्चे काजू की उपलब्धता की सीमाओं और प्रसंस्करण क्षमता से जुड़ी प्रतिस्पर्धात्मक चुनौतियों को दर्शाती है। लगभग 8 प्रतिशत वार्षिक मांग वृद्धि के अनुमान से स्पष्ट है कि आपूर्ति श्रृंखला में सुधार के बिना आयात निर्भरता बनी रह सकती है।
कोको की खेती भी धीरे-धीरे विस्तार पा रही है, विशेषकर नारियल और सुपारी के साथ अंतरफसल के रूप में। इसके बावजूद कोको का आयात अभी भी बना हुआ है। इससे स्पष्ट है कि घरेलू उत्पादन और प्रसंस्करण की क्षमता मांग के अनुरूप अभी पर्याप्त नहीं है। ऐसे में कोको के लिए बढ़ा बजटीय समर्थन केवल उत्पादन विस्तार का प्रश्न नहीं, बल्कि मूल्य-श्रृंखला को सुदृढ़ करने की आवश्यकता की ओर भी संकेत करता है।
अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स: निर्यात की रीढ़
नाशवंत कृषि उत्पादों के लिए समय पर और कम लागत वाला परिवहन आवश्यक है। केंद्रीय बजट 2026–27 में समर्पित माल गलियारों (Dedicated Freight Corridors), अंतर्देशीय जलमार्गों और तटीय कार्गो परिवहन पर निरंतर बल इस दिशा में एक स्पष्ट नीति प्राथमिकता को दर्शाता है। वर्तमान में कृषि उपज का बड़ा हिस्सा सड़क मार्ग से लंबी दूरी तक पहुँचाया जाता है। जाम, देरी और ईंधन लागत इसे महंगा बनाते हैं और इससे फल, सब्ज़ी, पुष्पोत्पादन और समुद्री उत्पादों की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
भारत का अंतर्देशीय जलमार्ग नेटवर्क 20,000 किलोमीटर से अधिक विस्तृत है, किंतु कृषि परिवहन में इसका पूरा उपयोग नहीं हो रहा। यदि सड़क निर्भरता कम कर जलमार्ग और तटीय परिवहन को बढ़ावा दिया जाए तो लागत घट सकती है और आपूर्ति श्रृंखला अधिक स्थिर बन सकती है। उत्पादन क्षेत्रों, प्रसंस्करण इकाइयों और निर्यात बंदरगाहों के बीच बेहतर संपर्क से निर्यात प्रतिस्पर्धा सुदृढ़ होती है।
मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण: कच्चे निर्यात से आगे
मत्स्य क्षेत्र कृषि और संबद्ध गतिविधियों में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले क्षेत्रों में रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 के अनुसार FY16 से FY25 के बीच कृषि और संबद्ध क्षेत्रों की औसत वार्षिक वृद्धि दर 4.45 प्रतिशत रही, जिसमें मत्स्य पालन (एक्वाकल्चर सहित) की वृद्धि दर 8.8 प्रतिशत दर्ज की गई। समुद्री उत्पादों के प्रसंस्करण हेतु आवश्यक विशिष्ट आयातित सामग्री पर शुल्क-मुक्त आयात सीमा 1 प्रतिशत से बढ़ाकर 3 प्रतिशत की गई है। इससे उच्च स्तर के प्रसंस्करण को प्रोत्साहन मिल सकता है। आज वैश्विक बाज़ार में प्रतिस्पर्धा कच्चे निर्यात की तुलना में तैयार और प्रसंस्कृत उत्पादों पर अधिक निर्भर करती है।
आयुष और पारंपरिक औषधीय उत्पादों का निर्यात वर्ष 2024–25 में लगभग 129 हजार टन रहा, जिसका मूल्य 689 मिलियन अमेरिकी डॉलर था। इस क्षेत्र में स्थायी वृद्धि के लिए गुणवत्ता परीक्षण और प्रमाणन व्यवस्था सुदृढ़ होना आवश्यक है। फार्मेसियों और परीक्षण प्रयोगशालाओं के उन्नयन के प्रस्ताव इसी दिशा में हैं।
क्लस्टर स्तर पर स्व-सहायता उद्यमी (SHE) मार्ट स्थापित करने की योजना स्थानीय ब्रांडिंग, उत्पाद एकत्रीकरण और विपणन को बढ़ावा दे सकती है। ऐसे मंच छोटे उत्पादकों और स्वयं सहायता समूहों को संगठित ढंग से अपने प्रसंस्कृत उत्पाद प्रस्तुत करने का अवसर देंगे। यदि इन मार्टों को गुणवत्ता मानकों और पैकेजिंग सुधार से जोड़ा जाए, तो वे घरेलू ही नहीं, निर्यात बाज़ारों तक पहुँच बनाने में भी सहायक हो सकते हैं।
डिजिटल और नियामक सुधार
सीमा शुल्क विभाग द्वारा प्रस्तावित कस्टम्स इंटीग्रेटेड सिस्टम (CIS) — एक एकीकृत डिजिटल कार्गो क्लीयरेंस प्लेटफॉर्म — खाद्य, पादप और पशु उत्पादों की निकासी प्रक्रिया को अधिक सुव्यवस्थित बनाएगा। रोकी गई खेपों का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं श्रेणियों से संबंधित होता है। उन्नत स्कैनिंग तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित लक्षित निरीक्षण प्रणाली से जांच प्रक्रिया अधिक तीव्र, पारदर्शी और पूर्वानुमेय होगी। कृषि निर्यात के संदर्भ में, जहाँ देरी सीधे गुणवत्ता और शेल्फ लाइफ को प्रभावित करती है, तेज़ और पूर्वानुमेय क्लीयरेंस प्रणाली वैश्विक बाज़ारों में विश्वसनीयता बढ़ाती है।
डिजिटल सुधार केवल सीमा तक सीमित नहीं हैं। भारत-विस्तार (Bharat-VISTAAR) जैसे मंच किसानों तक वैज्ञानिक और मानकीकृत जानकारी पहुँचाने में सहायक हो सकते हैं। बेहतर जानकारी से उत्पादन गुणवत्ता में सुधार संभव है, जिससे निर्यात मानकों का पालन स्रोत स्तर पर ही अधिक प्रभावी हो सकता है।
इसी क्रम में, विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (EEZ) और उच्च समुद्र में संचालित भारतीय मछली पकड़ने वाले जहाजों की पकड़ पर सीमा शुल्क छूट परिचालन लागत कम करती है। यह कदम गहरे समुद्री मत्स्यन को प्रोत्साहित करने के साथ निर्यात प्रतिस्पर्धा को आधार स्तर से मजबूत बनाता है।
निर्यात क्षमता को स्थायी बनाने के लिए आवश्यक कदम
इन पहलों को टिकाऊ निर्यात लाभ में बदलने के लिए कुछ अतिरिक्त प्रयास आवश्यक होंगे। पहला, कृषि बाज़ार से जुड़ी जानकारी समय पर और स्पष्ट रूप से उपलब्ध होनी चाहिए, ताकि निर्यातक बदलते शुल्क, मानकों और बाज़ार प्रवृत्तियों का अनुमान पहले से लगा सकें।
दूसरा, गुणवत्ता और मानक अवसंरचना को मजबूत करना अनिवार्य है। प्रयोगशालाओं, परीक्षण प्रणालियों और प्रमाणन व्यवस्था की क्षमता बढ़ाए बिना उत्पादन वृद्धि व्यापार लाभ में परिवर्तित नहीं हो सकती।
तीसरा, कृषि निर्यात राज्यों से संचालित होते हैं। इसलिए राज्य-स्तरीय रणनीतियों का केंद्रीय व्यापार पहलों और वस्तु-विशेष मूल्य-श्रृंखलाओं के साथ बेहतर तालमेल आवश्यक है।
चौथा, डिजिटल प्रणालियों का उपयोग दस्तावेज़ीकरण और ट्रैकिंग को सरल बनाने में किया जाना चाहिए, ताकि निर्यात प्रक्रिया अधिक सुगम और पूर्वानुमेय बन सके।
निष्कर्ष
केंद्रीय बजट 2026–27 यह संकेत देता है कि कृषि नीति अब केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। अब ध्यान मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण, परिवहन दक्षता और निर्यात तैयारी पर भी है।
आने वाले समय में सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत केवल कितना उत्पादन करता है, यह नहीं; बल्कि यह भी कि वह अपने उत्पादों को वैश्विक बाज़ार तक कितनी दक्षता, गुणवत्ता और विश्वसनीयता के साथ पहुँचा पाता है।
(स्मिता सिरोही, आईसीएआर- नेशनल प्रोफेसर, एम एस स्वामीनाथन चेयर हैं। पवित्रा श्रीनिवासमूर्ति आईसीएआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी रिसर्च (एनआईएपी) नई दिल्ली में सीनियर साइंटिस्ट हैं)