उम्मीदें 2026: कृषि नीतियों को उपभोक्ता नहीं, किसान केंद्रित बनाने का साल
केंद्र सरकार भले ही किसानों की आय को नीति का केंद्र बताती हो, लेकिन मौद्रिक नीति, महंगाई नियंत्रण और सीमित एमएसपी खरीद ने खेती को लगातार दबाव में रखा है। रिकॉर्ड अनाज भंडार, कमजोर कीमतें और सब्सिडी आधारित बजट संरचना किसानों की आय बढ़ाने में बाधा बन रही है। 2026 में बजट और नए कृषि कानूनों के बीच यह सवाल अहम है कि क्या नीतियों का फोकस उपभोक्ता से हटकर सचमुच किसान की ओर मुड़ेगा।
केंद्र की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अपनी नीतियों के केंद्र में किसान, महिला, युवा और गरीब को रखने का दावा करती है। प्रधानमंत्री लगातार इस प्राथमिकता को दोहराते रहते हैं और इसी के सहारे 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने की बात भी करते हैं। लेकिन यह भी सच है कि कृषि क्षेत्र की तेज वृद्धि और किसानों की आय में गुणात्मक बढ़ोतरी के बिना यह सपना पूरा करना संभव नहीं है। ऐसे में सरकार को वर्ष 2026 की अपनी नीतियों में बदलाव लाने की जरूरत है और उपभोक्ता-केंद्रित रुख की बजाय किसानों के हितों को प्राथमिकता देनी होगी।
इसके पीछे सबसे बड़ी वजह मौद्रिक नीति और महंगाई लक्ष्यों को लेकर अधिक लचीला रुख अपनाने की आवश्यकता है। खाद्य महंगाई दर ऋणात्मक बनी हुई है और खुदरा महंगाई दर (सीपीआई) को चार फीसदी के दायरे में (दो फीसदी कम या ज्यादा) रखने को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा सरकार से किए गए वादे किसानों को आर्थिक रूप से कमजोर कर रहे हैं। इस सच्चाई को सरकार को स्वीकार करना होगा, क्योंकि इसके बिना नीतिगत रुख में बदलाव संभव नहीं है। सरकार लगातार यह कहती रही है कि अब नीति का केंद्र उत्पादन नहीं बल्कि किसानों की आय है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों के फैसलों में यह स्पष्ट नहीं दिखता। अधिकांश कृषि उत्पादों के दामों में आई गिरावट से साफ है कि किसानों की आमदनी प्रभावित हुई है।
किसानों की आय बढ़ने के दो ही प्रमुख रास्ते हैं: उत्पादन में बढ़ोतरी और लागत में कमी, या फिर उनके उत्पादों के दाम में वृद्धि। सरकार 23 फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में लगातार बढ़ोतरी कर रही है, लेकिन इन कीमतों पर खरीद चुनिंदा फसलों और कुछ राज्यों तक ही सीमित है। इसके चलते किसानों का झुकाव मुख्य रूप से खाद्यान्न फसलों की ओर बना हुआ है। नतीजतन, केंद्रीय पूल में गेहूं और चावल का रिकॉर्ड भंडार जमा हो गया है और सरकार अब इसमें कमी के रास्ते तलाश रही है। हालांकि, यहां से निर्यात भी पूरी तरह संभव नहीं है, क्योंकि डब्ल्यूटीओ की शर्तों के अनुसार सब्सिडी पर खरीदे गए सार्वजनिक भंडार से निर्यात की अनुमति नहीं है। इस जटिल चक्र के कारण सरकार किसानों को कृषि के विविधीकरण की ओर भी प्रभावी ढंग से प्रेरित नहीं कर पा रही है, जबकि यह लक्ष्य सब्सिडी के बजाय इंसेंटिव आधारित नीति से ही हासिल किया जा सकता है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कृषि बजट भी बड़े पैमाने पर लाभार्थी खातों में ही जा रहा है। इसका सबसे बड़ा हिस्सा प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि में खर्च होता है। इसके बाद ब्याज छूट, फसल बीमा सब्सिडी और कृषि अवसंरचना कोष जैसी योजनाएं आती हैं। इन सबके बाद जो राशि बचती है, वह वेतन और अन्य राजस्व खर्चों में चली जाती है, जिससे कृषि अवसंरचना विकास, पूंजी निवेश और शोध के लिए बहुत कम संसाधन उपलब्ध हो पाते हैं।
हालांकि, सरकार उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर लाभार्थी योजनाओं में एक्सक्लूजन की दिशा में भी आगे बढ़ रही है। इसके तहत प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, ब्याज छूट और अन्य योजनाओं से अपात्र लाभार्थियों को बाहर किया जा रहा है। इसकी अगली कड़ी उर्वरक सब्सिडी में कटौती के रूप में भी सामने आ सकती है।
ऐसे में जहां सभी की निगाहें सरकार द्वारा एक फरवरी को पेश किए जाने वाले बजट पर टिकी होंगी, वहीं यह देखना भी जरूरी है कि पिछले दो-तीन वर्षों में किए गए वादों को पूरा करने के मामले में सरकार आज कहां खड़ी है।
इसके साथ ही वर्ष 2026 में कृषि और किसानों से जुड़े कई कानूनों में बदलाव की भी संभावना है। इसकी पहली कड़ी बीज विधेयक 2025 है, जो पारित होने के बाद बीज अधिनियम 1966 का स्थान लेगा। यह कानून भारतीय कृषि के लिए एक बड़े कानूनी और नीतिगत बदलाव का संकेत देगा। इसी तरह के कानून कीटनाशकों और उर्वरकों से जुड़े क्षेत्रों में भी आ सकते हैं। हालांकि संभव है कि सरकार पहले बीज अधिनियम को लेकर हितधारकों की प्रतिक्रिया को परखने के बाद आगे का कदम बढ़ाए।
लेकिन इन तमाम प्रयासों के बावजूद, यदि सरकार कीमतों के मोर्चे पर उपभोक्ता के बजाय किसानों को प्राथमिकता नहीं देती, तो किसानों की मुश्किलें कम होना संभव नहीं है। जिस तरह कुछ फसलों का उत्पादन बढ़ रहा है और वैश्विक बाजार में खाद्य जिंसों की कीमतों में गिरावट के संकेत मिल रहे हैं, वे सरकार को नीतिगत स्तर पर ठोस बदलाव करने के लिए मजबूर कर सकते हैं। साथ ही, पिछले बजट में घोषित किए गए विभिन्न मिशनों की मौजूदा स्थिति की समीक्षा करना भी सरकार के लिए जरूरी हो गया है।

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