इंडो-यूएस ट्रेड डील: अमेरिका के किन कृषि उत्पादों के लिए खुलेगा भारतीय बाजार?

भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के तहत भारत ने कुछ अमेरिकी कृषि उत्पादों पर शुल्क में कमी या छूट की सुविधा दी है, जबकि गेहूं, चावल और डेयरी जैसे प्रमुख उत्पाद बाहर रखे गए हैं। हालांकि, डीडीजीएस, सोयाबीन तेल, ताजे और प्रोसेस्ड फल और कपास का आयात बढ़ने से किसानों की आय और आत्मनिर्भरता पर प्रभाव पड़ने की आशंका है।

पिछले करीब एक सप्ताह के तेज घटनाक्रम के बीच आखिरकार 7 फरवरी की सुबह भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते का अंतरिम मसौदा जारी हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई करीब साल भर पहले की बैठक के बाद इस समझौते की घोषणा हुई। सरकार लगातार इस बात पर जोर देती रही है कि भारत का कृषि क्षेत्र इस समझौते से अछूता रहेगा, लेकिन आखिरकार यह अधूरा सत्य निकला। समझौते में साफ तौर से कहा गया है कि भारत, अमेरिका के कृषि उत्पादों के लिए अपना बाजार खोलेगा और उसमें सीमा शुल्क रियायत के साथ ही गैर-सीमा शुल्क प्रतिबंधों में भी छूट देगा। बदले में अमेरिका, भारत पर लगाये गये रेसिप्रोकल टैरिफ को घटाकर 18 फीसदी करेगा।

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अंतरिम समझौते में कृषि उत्पादों की एक सूची भी अमेरिका के व्हाइट हाउस ने आधी रात के बाद जारी मसौदे में शामिल की है। उसके बाद, सुबह भारत ने भी आधिकारिक रूप से उसे जारी कर दिया। इन कृषि उत्पादों में ड्राइड डिस्टीलरी ग्रेन सॉल्यूबल्स (डीडीजीएस), सोयाबीन तेल, ट्री नट (बादाम, अखरोट, पिस्ता), ताजा फल (सेब और बैरीज), प्रसंस्कृत फल, कॉटन, ज्वार ( रेड सोरगम) पशु चारे के लिए और अन्य उत्पाद शामिल हैं। इन उत्पादों पर सीमा शुल्क में कटौती की जाएगी, जिसमें शून्य आयात शुल्क और टैरिफ रेट कोटा (टीआरक्यू) जैसे प्रावधान शामिल होंगे ताकि भारत में इन उत्पादों के आयात को सुगम बनाया जा सके। इसके साथ वाइन और स्प्रिट और गैर-अल्कोहॉलिक बेवरेजेज शामिल होंगी। 

भारत सरकार ने कहा है और समझौते के मसौदे में भी यह साफ है कि गेहूं, चावल और मक्का जैसे अनाज, चीनी, डेयरी और पॉल्ट्री उत्पाद इस समझौते का हिस्सा नहीं हैं। वैसे भी भारत में जिस तरह से गेहूं, चावल और चीनी का उत्पादन बढ़ा है वह जरूरत से काफी अधिक है और भारत गैर-बासमती चावल का दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक होने के साथ ही कम कीमत पर निर्यात करने वाला देश है। गेहूं के बेहतर स्टॉक और उत्पादन को देखते हुए सरकार धीरे-धीरे उस पर लगी पाबंदियां हटा रही है। पिछले दिनों पांच लाख टन आटा और उसी तरह के उत्पाद निर्यात करने की अनुमति दी गई। दो दिन पहले गेहूं पर लागू स्टॉक सीमा को भी समाप्त कर दिया है। डेयरी और पॉल्ट्री को संरक्षण काफी महत्वपूर्ण है।

लेकिन अब बात दूसरे उत्पादों की करें। सरकार ने नये बजट में हाई वैल्यू कृषि उत्पादों और प्लांटेशन क्रॉप्स को बढ़ावा देने के कदम उठाये थे। उनमें कुछ उत्पाद ऐसे भी हैं जो भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का हिस्सा हैं। भारत, अमेरिका को करीब छह अरब डॉलर के कृषि उत्पादों का निर्यात करता  है। वहीं अमेरिका से करीब तीन अरब डॉलर के कृषि उत्पादों का हम आयात करते हैं। इस तरह हमारा अमेरिका के साथ कृषि व्यापार में करीब तीन अरब डॉलर का सरप्लस है। 

अब दूसरी तसवीर देखते हैं। साल 2025 में अमेरिका से कृषि उत्पादों के आयात में 30 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। इसमें ट्री नट्स बादाम और पिस्ता जैसे उत्पादों के आयात में 34 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और नवंबर, 2025 तक यह 1.3 अरब डॉलर पर पहुंच गया था। अब इन पर शुल्क समाप्त होने का मतलब है कि यह आयात बढ़ेगा। इसी तरह सेब और दूसरे ताजा फलों के आयात पर शुल्क कटौती और आयात को सुगम बनाने का प्रावधान इस मसौदे में है। जाहिर है, इनका आयात बढ़ने से हमारे सेब किसान सीधे प्रभावित होंगे।

एक बड़ा आयात डीडीजीएस का है। मक्का और दूसरे खाद्यान्नों से एथेनॉल उत्पादन के बाद सह-उत्पाद के रूप में डीडीजीएस निकलता है। इस प्रोटीन युक्त उत्पाद का उपयोग पशु चारे और पॉल्ट्री फीड में होता है। अमेरिका हर साल करीब 120 लाख टन डीडीजीएस का निर्यात करता है। इससे आप समझ सकते हैं कि यह आयात कितना बड़ा हो सकता है। हालांकि डेयरी और पॉल्ट्री उद्योग को इससे फायदा होगा लेकिन सोयाबीन किसान और सोया उद्योग इससे सीधे प्रभावित होगा। यह सोयामील का प्रतिद्वंद्वी उत्पाद है। 

पिछले दो साल में सोयाबीन किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिलने में हुई दिक्कत के पीछे डीडीजीएस एक वजह है, क्योंकि इससे सोयामील के दाम गिर गये। सोयाबीन में केवल 18 फीसदी तेल होता है बाकी सोयामील होता है। भारत में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में करीब 130 लाख हैक्टेयर में सोयाबीन की खेती होती है। इस समझौते का सबसे बड़ा झटका इन किसानों को लगेगा। 

सोयाबीन तेल को भी अमेरिका से आयात होने वाले कृषि उत्पादों में शामिल किया गया है। भारत अपनी जरूरत का 60 फीसदी से अधिक खाद्य तेल आयात करता है। इसमें सोयाबीन तेल की हिस्सेदारी पिछले तेल वर्ष (नवंबर, 2024 से अक्तूबर, 2025) में 48 लाख टन थी। सोयाबीन तेल पर 16.5 फीसदी सीमा शुल्क लागू है। फिलहाल इसका अधिकांश आयात अर्जेंटीना, ब्राजील और रूस से होता है। लेकिन अब अमेरिका को रियायती दरों में सोयाबीन तेल की सुविधा मिलेगी तो यह आयात बढ़ेगा। 

गौरतलब है कि भारत ने खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता के लिए मिशन एडिबल ऑयल एंड ऑयल पाम शुरू कर रखा है। ऐसे में आयात को बढ़ावा देने से आत्मनिर्भरता की कोशिश को झटका लगेगा। इसी तरह हमारा कपास उत्पादन अपने उच्चतम स्तर 398 लाख गांठ से घटकर 300 लाख गांठ पर आ गया है। ऐसे में अमेरिका से रियायती शुल्क पर कॉटन का आयात भारतीय कपास किसानों के हितों के प्रतिकूल होगा।

इन उत्पादों के अलावा सूची में कुछ और उत्पाद शामिल हो सकते हैं। समझौते का पूरा ब्यौरा, शुल्क दरों में छूट और टीआरक्यू जैसी विस्तृत जानकारी आने पर स्थिति पूरी तरह साफ होगी। लेकिन घरेलू उद्योग और मैन्यूफैक्चरिंग के लिए हितकर बताये जा रहे इस समझौते की एक अहम बात यह भी है कि अमेरिका भारत को हर साल 100 अरब डॉलर का निर्यात करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। दोनों देशों के बीच अभी 130 अरब डॉलर के करीब कारोबार होता है और अमेरिका के साथ हमारा करीब 40 अरब डॉलर का ट्रेड सरप्लस है। अमेरिका इसी ट्रेड सरप्लस को खत्म करना चाहता है। ऐसे में भारत और अमेरिका के बीच सालाना व्यापार 200 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। 

जियो पॉलिटिकल अनिश्चितता की स्थिति में किसी एक ट्रेड पार्टनर पर अधिक निर्भरता उचित रणनीति नहीं होती है। भारत अपना 20 फीसदी से अधिक निर्यात अमेरिका को करता है। दूसरी तरफ, चीन ने चरणबद्ध तरीके से अमेरिकी बाजार पर अपनी निर्भरता को काफी कम किया है। यही वजह है कि जब ट्रंप ने दुनिया भर के देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ लगाने का फैसला किया तो कुछ समय बाद उसे चीन के साथ समझौता करना पड़ा था।